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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 181 में से

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पृष्ठ 53

३० ] प्रवन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
[ ३३ ] हे रत्नाकर, हे गुणपुञ्ज मुञ्ज ! चित्तमें इस प्रकार विषाद न करो । क्यों कि जिस प्रकार
विधाता ढोल बजाता है उसी तरह मनुष्यको नाचना पड़ता है ।
फिर किसी और दयार्द्रचित्त सज्जनने कहा-
[ ३४ ] हे मुञ्ज ! इस प्रकार खेद न करो । क्यों कि भाग्यक्षय होनेपर वह रावण भी नष्ट हो गया,
जिसका गढ तो लंका था और जिस गढ़की खाई खुद समुद्र था और उस गढ़का मालिक खुद
रावण दस माथेवाला था ।
इसी प्रकार-
३९. हाथी गये, रथ गये, घोड़े गये, पायक और भृत्य भी चले गये । महत्ता (महामात्य) रुद्रादित्य
भी स्वर्गमें बैठा आमन्त्रण कर रहा है !
बादमें, एक अवसरपर, किसी गृहस्थके घरपर वह भिक्षाके लिये ले जाया गया। उसकी स्त्री उस
समय छोटे पाडेको छास पिला रही थी । उसने उसको भिक्षाके लिये खड़ा देख कर गर्वसे कन्धा ऊँचा किया
और भीख देनेका इन्कार किया । इसपर मुञ्ज बोला-
४०. हे भोली मुग्धे ! इन छोटेसे पाडों (भैंसके बच्चों) को देख कर ऐसा गर्व न कर । मुञ्जके तो
चौदह सौ और छहत्तर हाथी थे, पर वे भी चले गये ।
उसने इस प्रकार उत्तर दिया-
[ ३५ ] जिसके घर चार बैल हैं, दो गायें हैं और मीठा बोलने वाली ऐसी [मैं] स्त्री हूँ, उस कुटुंबी
(कणबी=किसान) को अपने घरपर हाथी बाँधनेकी क्या जरूरत है ?
एक दूसरी बार जब कि मुञ्जको इस प्रकार इधर उधर घुमाया जा रहा था, तब, राजा किसी
बावडी पर बैठा हुआ उसे देख कर हँसने लगा । इस पर वह बोला- ,
[ ३६ ] ऐ धनके अन्धे मूढ़ ! मुझे विपत्तिग्रस्त देखकर हँसता क्या है ?-लक्ष्मी कभी कहीं स्थिर-
होती देखी है ? तू क्या इस जलयन्त्र-चक्र (अरहंट) की घटियोंको नहीं देखता जो क्रमसे खाली
होती हैं, भरती हैं और फिर खाली होती हैं !
इसी तरह पीछे लगकर चिढ़ानेवाले आदमियोंको देखकर उसने कहा-
[ ३७ ] मैं उन पर वारी जाता हूँ जो गोदावरी नदीके ऊपर ही अटक गये (मर गये), जिन्होंने
न इन दुर्जनोंकी ऋद्धि देखी और न इस विह्वल मुञ्जको देखा ।
फिर अपनी मन्दबुद्धिताका स्मरण करता हुआ इस प्रकार बोला-
[ ३८ ] दासीको कभी प्रेम नहीं होता यह निश्चित जानना चाहिए । देखो, दासीने राजा मुञ्जेश्वरको
घर घर भीख माँगता करवाया ।
[ ३९] और जो लोग अपना बड़प्पन छोड़कर वेश्या और दासियोंमें रचते हैं वे मुञ्जराजा के समान
बहुत ही अनादर सहन करते हैं ।
[ ४० ] हे * मर्कट (बंदर) ! इसलिये तुम अफसोस न करो कि मै इस स्त्रीके द्वारा खंडित किया
जा रहा हूँ । राम, रावण, और मुञ्ज आदि कैसे कैसे लोग स्त्रियोंसे खंडित नहीं हुए ?

  • मदारी लोग बंदर और बंदरियाका जब खेल करते हैं तब, बंदरिया रूठकर बंदरका अपमान करती है और बंदरसे
    पानी भरवाना चक्की चलवाना आदि काम करवाती है। बंदर अपमानित होकर मुँह फेर बैठ जाता है और हाथसे अपने
    सिरको पीटता है। इस अवसरपर किसीकी यह उक्ति है ।