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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०५
उभयोदय है । एक अन्य बात इन राशियों के विषय में अन्यत्र कही
गयी है वह भी यहाँ बताते हैं । पृष्ठोदय राशि में क्रूर ग्रह हो तो
अत्यन्त अशुभ और शुभ ग्रह हो तो कम अशुभ । शीर्षोदय राशि में
शुभ-ग्रह हो तो पूर्ण शुभ, क्रूर-ग्रह हो तो कम अशुभ । उभयोदय में
मिश्रत फल ॥ ३३ ॥
यद्भावगो गोचरतो विलग्नात्-
दशेश्वरः स्वोच्चसुहृद्गृहस्थः ।
तद्भावपुष्टिं कुरुते तदानीं
बलान्वितश्चेज्जननेऽपि तस्य ॥३४॥
यह देखिये कि जिस ग्रह की महादशा जा रही है वह महादशा
के समय, लग्न से किस भाव में जा रहा है । इस श्लोक में यह नयी
बात बतायी गयी है कि एक ही महादशानाथ--जब उसकी महादशा
जा रही हो--तब गोचरवश भिन्न-भिन्न स्थानों में रहता हुआ भिन्न-
भिन्न फल करता है ।
महादशा स्वामी यदि जन्म कुण्डली में भी बलवान् हो तो जब
उसकी महादशा के समय गोचरवश अपनी उच्च । स्वराशि, या मित्र
राशि में रहता हुआ लग्न से जिस भाव में भ्रमण करता है उस भाव
का पुष्टिकारक होता है । मान लीजिये किसी की कुण्डली में राहु
बड़ा बलवान् है । और राहु की महादशा है तो जब गोचरवश जन्म
लग्न से ११वें आवेगा तब धन लाभ करावेगा, जब जन्म लग्न से
दशम में आवेगा तब पदोन्नति कारक होगा । जब नवम में आवेगा तब
भाग्योदय करेगा--इस प्रकार महादशानाथ के गोचरवश, फल में
तारतम्य कर विचार करना चाहिये ॥ ३४ ॥

४०६ फलदीपिका
बलोनितो जन्मनि पाकनाथो
मौढ्यं स्वनीचं रिपुमन्दिरं वा।
प्राप्तश्च यद्भावमुपैति चारात्-
तद्भावनाशं कुरुते तदानीम् ॥३५॥
ऊपर श्लोक में यह बताया गया है कि यदि दशानाथ जन्म-कुण्डली
में बलवान् हो और गोचर में भी बलवान् हो तो क्या शुभ फल
देता है। अब यह बताते हैं कि यदि दशानाथ जन्म-कुण्डली में भी
निर्बल हो और गोचर में भी निर्बल हो तो क्या अशुभ फल करता
है
जिस ग्रह की महादशा जा रही है वह यदि जन्म-कुण्डली में
बलहीन हो और गोचर के समय अपनी नीच राशि या अपनी शत्रु
राशि में जा रहा हो या जब वह सूर्य के पास होने से अस्त हो
उस समय वह गोचरवश लग्न से जिस भाव में होता है उस
भाव सम्बन्धी अशुभफल करता है ।
मान लीजिये कन्या लग्न है ।
शनि अष्टम में । नीच राशि में होने
से यह निर्बल है । और मान लीजिये
शनि की महादशा है तथा शनि
गोचरवश सिंह राशि में जा रहा है।
सूर्य शनि का शत्रु है । इस कारण
जब शनि सिंह राशि में जायगा तब
लग्न से बारहवें घर में होने के
कारण, १२वें भाव-सम्बन्धी अशुभ फल दिखायेगा ॥ ३५ ॥
मूल श्लोक में कई जगह पाकप्रभु या पाकनाथ यह शब्द आया
है इस कारण जो सिद्धांत दशानाथ पर लागू होंगे वह अन्तर्दशानाथ
पर भी लागू होंगे ।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०७
दशेशस्य तुङ्गे सुहृद्भे दशेशात्
त्रिषट्कर्मलाभत्रिकोणास्तभेषु ।
यदा चारगत्या समायाति चन्द्रः
शुभं संविधत्तेऽन्यथा चेदरिष्टम् ॥३६॥
अब यह बताते हैं कि दशानाथ से किन-किन स्थानों पर जब
चन्द्रमा गोचरवश आता है तब शुभ फल करता है । (क) दशानाथ
की उच्च राशि, (ख) दशानाथ के मित्रों की राशि, (ग) दशानाथ
से तृतीय, पाँचवे, छठे सातवे, नवें, दसवें, और ग्यारहवें । चन्द्रमा
एक राशि में केवल सवा दो दिन रहता है । मान लीजिये आपको
यह विचारना है कि दशानाथ के दृष्टिकोण से आज का चन्द्रमा कुछ
शुभफल दिखायेगा क्या ? तो यह देख लीजिये कि क्या चन्द्रमा गोचर,
वश उपर्युक्त किन्हीं राशियों में है । यदि गोचर वश चन्द्रमा अन्य
राशि में हो तो उस काल में महादशानाथ का शुभ फल प्राप्त नहीं
होगा ॥ ३६ ॥
पाकप्रभुर्गोचरतः स्वनीचं
मौढ्यं यदायाति विपक्षभं वा ।
कष्टं विदध्यात्स्वगृहं स्वतुङ्गं
वक्रं गतः सौख्यफलं तदानीम् ॥३७॥
जिस ग्रह की दशा या अन्तर्दशा जा रही हो वह गोचरवश
यदि अपनी नीच राशि में या शत्रु राशि में जा रहा हो या सूर्य
के समीप होने के कारण अस्त हो जावे तो ऐसी स्थिति में वह ग्रह
कष्ट देगा । प्रायः यही बात ऊपर के ३५वें श्लोक में भी बतायी
गयी है । अन्तर केवल यह है कि ऊपर ३५वें श्लोक में यह कहा
है कि यदि "वह दशानाथ जन्म के समय भी बलहीन हो" किन्तु

यह बात ३७वें श्लोक में नहीं कही गयी । इससे परिणाम यह
निकला कि जिस ग्रह की महादशा हो वह जब गोचरवश अस्त होता है
या अनिष्ट राशि को प्राप्त होता है तो कष्टकारक होता है । अब
दूसरी बात लीजिये । जिस ग्रह की दशा या अन्तर्दशा हो वह जब
गोचरवश अपनी स्वराशि या अपनी उच्चराशि को प्राप्त होता है
या वक्र हो जाता है तो उस समय अच्छा फल देता है ।
पाकेशस्य शुभप्रदस्य भवनं तुङ्गं प्रपन्ने यदा
सूर्ये तत्फलसिद्धिमेति गुरुणाऽप्येवं फलं चिन्तयेत् ।
नीचं कष्टफलप्रदस्य च दशानाथस्य वैरिस्थलं
प्राप्ते भास्वति गोचरेण लभते तस्यैव कष्टं फलम् ॥३६॥
यदि कोई ग्रह शुभफल देने वाला है और उसकी दशा व अन्त-
र्दशा चल रही है तो उसका शुभ फल किस समय होगा ? शुभफल
तब होगा जब उस दशानाथ या अन्तर्दशानाथ की उच्चराशि में
गोचरवश सूर्य जावे । या उस दशानाथ या अन्तर्दशानाथ की उच्चराशि
में गोचरवश बृहस्पति जावे । मान लीजिये किसी जन्म-कुण्डली में शुक्र
शुभ-प्रद है और उसकी महादशा या अन्तर्दशा चल रही है । शुक्र
की उच्च राशि मीन है । ऐसी स्थिति में जब गोचरवश सूर्य मीन
में आवेगा या जब वृहस्पति गोचरवश मीन राशि में आवेगा तब शुभ
फल होगा । अब दूसरी बात लीजिये । कोई ग्रह जन्म-कुण्डली में कष्ट-
प्रद है और उसकी दशा या अन्तर्दशा चल रही है तो विशेष कष्ट
फल कब होगा ? जब उस ग्रह की नीच राशि में या उस ग्रह की
शत्रु राशि में गोचरवश सूर्य आवे तब विशेष कष्ट होगा ॥ ३८ ॥
येन ग्रहेण सहितो भुजगाधिनाथ-
स्तत्खेटजातगुणदोषफलानि कुर्यात् ।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०९
सर्पान्वितः स तु खगः शुभदोऽपि कष्टं
दुःखं दशान्त्यसमये कुरुते विशेषात् ॥३६॥
राहु जैसे ग्रह के साथ बैठता है उसके गुणदोष ग्रहण करके उसी
ग्रह का सा प्रभाव दिखाता है । साथ की कुण्डली में राहु शुक्र के
[कुण्डली: लग्न ४; २ भाव ५; ३ भाव ६; ४ भाव ७ में रा. शु.; ५ भाव ८; ६ भाव ९;] साथ है । इस लिये शुक्र के जो भी गुण
[७ भाव १०; ८ भाव ११; ९ भाव १२; १० भाव १; ११ भाव २; १२ भाव ३] या दोष हैं वह राहु भी करेगा ।
यह श्लोक के प्रथम दो चरणों में
कहा गया है । आगे चलकर
कहते हैं कि जो ग्रह राहु के साथ
बैठता है वह ग्रह चाहे शुभ हो
किन्तु कष्टकारक होता है खास .
कर—अपनी दशा के अन्त के समय
में । उदाहरण कुण्डली में शुक्र राहु
के साथ है इसलिये शुभ होने पर भी शुक्र कष्टकारक होगा ।
कहने का तात्पर्य यह है कि राहु सर्प है यह अपना विष अपने
साथ में रहने वाले ग्रह को दे देता है ॥ ३९ ॥
द्वावर्थकामाविह मारकाख्यौ
तदीश्वरस्तत्र गतो बलाढ्यः ।
हन्ति स्वपाके निधनेश्वरो वा
व्ययेश्वरो वाऽप्यतिदुर्बलश्चेत् ॥४०॥
द्वितीय और सप्तम भाव को मारक स्थान कहते हैं । यदि इनके
स्वामी या अन्य ग्रह बलवान् होकर इन स्थानों में पड़े हुए हों तो
वह अपनी दशा में मृत्यु करते हैं । यदि अष्टमेश या व्ययेश भी अति
दुर्बल हों तो उसकी भी दशा में मृत्यु हो सकती है ॥ ४० ॥

४१० फलदीपिका
केन्द्रेशस्य सतोऽसतोऽशुभशुभौ कुर्याद्दशा कोणपाः
सर्वे शोभनदास्त्रिवैरिवभवपा यद्यप्यनर्थप्रदाः ।
रन्ध्रेशोऽपि विलग्नपो यदि शुभं कुर्याद्रविर्वा शशी
यद्येवं शुभदः पराशरमतं तत्तद्दशायां फलम् ॥४१॥
यदि केन्द्र का मालिक सौम्य-ग्रह है तो वह अशुभ फल देता
है और यदि केन्द्र का स्वामी अशुभ ग्रह हो तो शुभ फल देता है।
त्रिकोण (लग्न से नवें, पाँचवे घर के स्वामी) के स्वामी हमेशा शुभ
फल ही देते हैं । लग्न को केन्द्र स्थान भी मानते हैं कोण स्थान
भी । इसलिये लग्नेश सदैव शुभ ही होता है । ३, ६, ११ के स्वामी
चाहे शुभ हों अनर्थ करने वाले ही होते हैं । अष्टमेश यदि लग्नेश
भी हो (यह तभी होता है जब जन्म लग्न मेष या तुला हो) तो
शुभ होता है। अष्टमेश यदि सूर्य या चन्द्रमा हो तो भी शुभ फल करते
हैं । यह तभी होता है जब धनु या मकर लग्न हो । इससे परि-
णाम यह निकला कि मेष, तुला, धनु और मकर इन चार लग्नों के
अतिरिक्त यदि कोई लग्न हो तो अष्टमेश अशुभ फल ही करता है ।
ऐसा पराशर का मत है ! ग्रह अपनी-अपनी दशा में अपना फल
करते हैं ॥ ४१ ॥
कोणाधीशः केन्द्रगः केन्द्रपो वा
कोणस्थश्चेद् द्वौ च योगप्रदौ स्तः ।
द्वावप्येतौ भुक्तिकाले दशाया-
मन्योन्यं तौ योगदौ सोपकारौ ॥४२॥
केन्द्र, त्रिकोण आदि के स्वामियों के शुभ या अशुभ फल देने का
विचार हमने सुगम ज्योतिष प्रवेशिका में विस्तृत रूप से दिया है ।
इसके लिये देखिये सुगमज्योतिष प्रवेशिका । इसी प्रकार तृतीयेश
षष्ठेश, एकादशेश पापी हैं या नहीं इसका भी पूर्ण विवरण उसी
पुस्तक में देखिये ।

बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४११
(i) कोण का स्वामी यदि केन्द्र में हो या (ii) केन्द्र का स्वामी,
त्रिकोण में हो—ये दोनों ही योग देने वाले होते हैं। यदि इनमें
से एक की दशा हो और दूसरे की अन्तर्दशा हो तो उस समय शुभफल
होता है। इस प्रकार यह दोनों एक-दूसरे को योग प्रदान करते हैं
और उपकार करते हैं ॥ ४२ ॥
न दिशेयुर्ग्रहाः सर्वे स्वदशासु स्वभुक्तिषु ।
शुभाशुभफलं नॄणामात्मभावानुरूपतः ॥४३॥
ऊपर श्लोक ४१ में कहा गया है कि "तत्तद्दशायां फलम्" अपनी-
अपनी दशा में फल देते हैं तो क्या जिस ग्रह की महादशा होती है
वह अपनी महादशा में अपनी अन्तर्दशा में ही पूर्ण फल प्रदान कर
देता है ? नहीं । वही इस श्लोक में बताया है। सूर्य आदि सब ग्रह-
अपनी महादशा और उसमें अपनी ही अन्तर्दशा में--एवं अपने-
अपने भावों के अनुसार--मनुष्यों को शुभाशुभ फल प्रदान नहीं करते
हैं। तब कब करते हैं ? यह आगे के श्लोक में बताया गया है ॥४३॥
आत्मसम्बन्धिनो ये च ये ये निजसधर्मिणः ।
तेषामन्तर्दशास्वेव दिशन्ति स्वदशाफलम् ॥४४॥
अपनी महादशा में जब अपने सम्बन्धी या सधर्मी ग्रहों की
अन्तर्दशा आती है तब प्रत्येक ग्रह अपना शुभ या अशुभ फल देता
है। सम्बन्धी किसे कहते हैं ? देखिये अध्याय १५ का ३०वाँ श्लोक ।
सधर्मी किसे कहते हैं ? (क) अपने सदृश जो योग कारक अन्य ग्रह
हैं वे सधर्मी हैं (ख) शुभ ग्रहों के अन्य शुभ ग्रह सधर्मी हैं (ग)
पाप ग्रहों के अन्य पाप ग्रह सधर्मी हैं ॥४४॥

४१२ फलदीपिका
केन्द्रत्रिकोणनेतारौ दोषयुक्तावपि स्वयम् ।
सम्बन्धमात्राद्बलिनौ भवेतां योगकारको ॥४५॥
केन्द्र और त्रिकोण के स्वामी—चाहे स्वयं दोष युक्त भी क्यों न
हों—परस्पर सम्बन्ध से बली होने पर योग कारक होते हैं । दोष से
क्या तात्पर्य है ? उदाहरण के लिये मेष लग्न में शनि दशमेश होने
से केन्द्र पति हुआ किन्तु एकादश का भी स्वामी है और एकादश का
स्वामी होना अच्छा नहीं, इस कारण दोष युक्त केन्द्र पति हुआ ।
इसी प्रकार सिंह लग्न में बृहस्पति पंचम के साथ-साथ अष्टम का
भी स्वामी हुआ । इस कारण दोषयुक्त त्रिकोण पति हुआ ।
इस श्लोक में यही बताया गया है कि चाहे दोष युक्त ही क्यों
न हों—केन्द्रेश और त्रिकोणेश का सम्बन्ध होने से ही उनमें बल आ
जाता है और वे योग कारक हो जाते हैं ॥४५॥
त्रिकोणाधिपयोर्मध्ये सम्बन्धो येन केनचित् ।
केन्द्रनाथस्य बलिनो भवेद्यदि स योगकृत् ॥४६॥
दोनों त्रिकोण स्वामियों में—यदि किसी का भी सम्बन्ध बली
केन्द्रनाथ से हो तो वह सम्बन्ध राजयोग कारक होता है। यहाँ यह भी
बतलाना आवश्यक है कि ‘बली’ शब्द से क्या तात्पर्य है ? एक अर्थ
तो साधारण है ही—बली अर्थात् बलवान् । “बली केन्द्रनाथ” का
दूसरा पारिभाषिक अर्थ है—दशमेश—क्योंकि चारों केन्द्रेशों में वही
सबसे बली माना जाता है। यह दूसरा अर्थ लेने से निष्कर्ष यह
‘सम्बन्ध’ या ‘बन्ध’ शब्द का प्रयोग ज्योतिष में एक विशेष अर्थ
में होता है । इस शब्द की व्याख्या के लिये देखिये अध्याय १५ ।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१३
निकला कि पंचमेश या नवमेश-इन दोनों में से किसी का भी
सम्बन्ध यदि दशमेश से हो तो योगकारक होता है । किन्तु
अन्य लोग बली का अर्थ केवल बलवान् लेते हैं । इस मतानुसार
यदि कोई भी केन्द्रेश बलवान् है और किसी भी त्रिकोणेश से
सम्बन्ध भी करता है तो राज योगकारक हुआ ॥ ४६ ॥
केन्द्रत्रिकोणाधिपयोरेक्ये तौ योगकारकौ ।
अन्यत्रिकोणपतिना संबन्धो यदि किं पुनः ॥४७॥
यदि किसी केन्द्र के स्वामी का दोनों त्रिकोणों में से एक के
स्वामी के साथ ऐक्य हो (दोनों एक साथ हों) तो इस ऐक्य के
कारण यह दोनों (परस्पर सम्बन्ध करने वाले त्रिकोणेश और केन्द्रेश)
योग कारक हो जाते हैं। यदि केन्द्रनाथ एक त्रिकोणाधिपति से
सम्बन्ध करे और साथ ही साथ दूसरे त्रिकोणपति से भी सम्बन्ध कर ले
तो फिर कहना ही क्या है अर्थात् किसी एक केन्द्रनाथ का दोनों
त्रिकोणेश से सम्बन्ध होना बहुत बड़ा राजयोग है।
यहाँ यह भी बतला देना आवश्यक है कि यदि एक ही ग्रह केन्द्र
और कोण का स्वामी हो तो वह स्वयं योगकारक हो जाता है ।
जैसे कर्क और सिंह लग्न वाले के लिये मंगल; मकर और कुंभ वाले के
लिये शुक्र; वृष और तुला लग्न वाले के लिये शनि। ऐसा योगकारक
ग्रह अपनी अन्तर्दशा में भाग्योदय करता है ॥ ४७ ॥
*मूल में शब्द "ऐक्य" है। अर्थात् एक साथ हों किन्तु यदि
चारों प्रकार के सम्बन्ध में से एक भी प्रकार का सम्बन्ध हो तो
हमारे विचार से वह काफ़ी है ।

४१४ फलदीपिका
योगकारकसम्बन्धात्पापिनोऽपि ग्रहाः स्वतः ।
तत्तद्भुक्त्यनुसारेण दिशेयुर्योगिकं फलम् ॥४८॥
पहले बता चुके हैं कि केन्द्रपति और कोणपति का सम्बन्ध
होने से दोनों ही ग्रह (केन्द्रपति और कोणपति) राजयोगकारक
माने जाते हैं। ऐसे योगकारक ग्रह की महादशा में यदि किसी शुभ-
ग्रह की अन्तर्दशा हो—तो चाहे यह शुभ ग्रह महादशानाथ से सम्बन्ध
न भी करता हो तो भी शुभ-ग्रह की अन्तर्दशा भाग्योदय ही करेगी।
अब यह बताते हैं कि यदि कोई ग्रह नैसर्गिक पाप-ग्रह हो (मंगल,
शनि) तो भी—यदि वह योग कारक से सम्बन्ध करते हों तो क्या
फल होगा। योगकारक से सम्बन्ध करने वाले पाप ग्रहों की अन्तर्दशा
'हो तो उसमें योगफल मिलता है। विशेष विवरण के लिये देखिये
सुगम ज्योतिष प्रवेशिका पृष्ठ १२१ तथा १३६ ॥ ४८ ॥
•
स्वदशायां त्रिकोणेशो भुक्तौ केन्द्रपतेः शुभम् ।
दिशेत्सोऽपि तथा नो चेदसंबन्धेऽपि पापकृत् ॥४९॥
यदि केन्द्रपति सम्बन्धयुक्त हो तो अपनी दशा में, कोणपति की
अन्तर्दशा में शुभफल कारक होता ही है। इसी प्रकार त्रिकोणेश भी
अपनी दशा में और केन्द्रपति की अन्तर्दशा में शुभ फल दायक होता
है। यदि केन्द्रकोण पतियों का सम्बन्ध न हो तो उतना शुभ नहीं होगा।
यदि दोनों शुभ हों तो इन दोनों का चाहे सम्बन्ध हो या न हो एक की
महादशा दूसरे की अन्तर्दशा में प्रायः शुभ फल ही होगा। हमारे विचार
से यदि केन्द्रेश और त्रिकोणेश में सम्बन्ध न हो और एक की महादशा
में दूसरे की अन्तर्दशा हो तो दोनों ग्रहों के विषय में यह भी विचारना
चाहिये कि वे केन्द्र और त्रिकोण के स्वामी होने के अतिरिक्त अन्य

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१५
किन घरों के स्वामी हैं ? कहाँ बैठे हैं ? एक दूसरे से छठे, आठवें, बारहवें
तो नहीं हैं ? बलवान् है या दुर्बल ? और तब जो निष्कर्ष आवे
वह मानना चाहिये यदि केन्द्रेश और त्रिकोणेश का सम्बन्ध नहीं है
और केन्द्रेश अशुभ है तो पाप फल देगा ॥ ४९ ॥
केन्द्राधिपत्यदोषस्तु बलवान् गुरुशुक्रयोः ।
मारकत्वेऽपि च तयोर्मारकस्थानसंस्थितिः ॥५०॥
पहले बता चुके हैं कि यदि केन्द्र का स्वामी शुभग्रह हो तो
अच्छा नहीं । अब यह कहते हैं कि बृहस्पति और शुक्र यदि केन्द्र के
स्वामी हों तो बहुत अधिक दोष हैं। यदि साथ ही साथ अर्थात् इन
दोनों में से कोई केन्द्र का स्वामी तो हो ही—मारक स्थान अर्थात्
द्वितीय या सप्तम में बैठा हो तो प्रबलमारक होता है ॥ ५० ॥
बुधस्तदनु चंद्रोऽपि भवेत्तदनु तद्विधः ।
पापाश्चेत्केन्द्रपतयः शुभदाश्चोत्तरोत्तरम् ॥५१॥
जैसे गुरु और शुक्र का केन्द्रेश होना और मारक स्थान में बैठना
दोषयुक्त माना गया है वैसे ही बुध और चन्द्रमा को भी समझना
चाहिये । अर्थात् बुध यदि केन्द्र का स्वामी हो तो शुभ नहीं होता
और यदि केन्द्र का स्वामी होकर मारक स्थान में बैठा हो तो और
भी खराब समझना चाहिये । इसी प्रकार चन्द्रमा का केन्द्रेश होना
अच्छा नहीं और यदि चन्द्रमा केन्द्रेश होकर मारक स्थान में बैठ जाये
तो और भी खराब है। किन्तु यदि पाप ग्रह केन्द्र के स्वामी हों तो वह
शुभफल देने वाले होते हैं । सूर्य यदि केन्द्रेश हो तो उत्तम फल देगा ।
मंगल यदि केन्द्रेश हो तो और भी उत्तम फल देगा । और यदि शनि
केन्द्रेश हो तो और भी अच्छा ॥ ५१ ॥

४१६ फलदीपिका
यदि केन्द्रे त्रिकोणे वा निवसेतां तमोग्रहौ ।
नाथेनान्यतरस्यैव संबन्धाद्योगकारकौ ॥५२॥
यदि राहु या केतु केन्द्र में बैठा हो और त्रिकोणेश से सम्बन्ध
करता हो तो योग कारक होता है । अथवा यदि राहु या केतु त्रिकोण
में बैठा हो और केन्द्रेश से सम्बन्ध करता हो तो भी राजयोग कारक
होता है ॥ ५२ ॥
तमोग्रहौ शुभारूढौऽसंबद्धौ येन केनचित् ।
अन्तर्दशानुरूपेण भवेतां योगकारकौ ॥५३॥
यदि राहु या केतु शुभग्रह की राशि और अच्छे स्थान में बैठे हों
और किसी ग्रह से सम्बन्ध न करते हो तो अपनी अन्तर्दशा में शुभ
फल देते हैं । यदि राहु या केतु का किसी से सम्बन्ध नहीं है और
शुभ स्थान में है (केन्द्र या त्रिकोण में) तो इनकी महादशा में जब
योग कारक ग्रह की अन्तर्दशा आवेगी तब शुभ फल होगा ॥ ५३ ॥
आरम्भो राजयोगस्य भवेन्मारकभुक्तिषु ।
प्रथयन्ति तमारभ्य क्रमशः पापभुक्तयः ॥५४॥
यदि किसी मारक ग्रह की अन्तर्दशा में राजयोग का आरम्भ
हो तो उस दशाकाल में केवल राजपद की प्रसिद्धि हो जाती है—
राजोचित ऐश्वर्य किंवा भोग आदि की प्राप्ति नहीं होती ॥ ५४ ॥
रन्ध्रस्थरन्ध्रेशकरन्ध्रनाथ-
रन्ध्रत्रिभागाधिपमान्दिभेशाः ।

बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१७
दुःखप्रदास्तेष्वपि दुर्बलो यः
स नाशकारी स्वदशापहारे ॥५५॥
नीचे लिखे हुए ग्रह बहुत दुःख देने वाले होते हैं—(१) जो ग्रह
आठवें घर में बैठा हो (२) जो ग्रह आठवें घर को देखता हो (३)
अष्टमेश (४) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी (५) जिस राशि में
मान्दि हो, उसका स्वामी । कहने का तात्पर्य यह है कि उपर्युक्त ग्रह
अपनी दशा, अन्तर्दशा में बहुत कष्ट देते हैं और इन ग्रहों में जो
सबसे दुर्बल हो उसकी दशा या अन्तर्दशा में मृत्यु होती है ॥५५॥
भ्रष्टस्य तुङ्गादवरोहिसंज्ञा
मध्या भवेत्सा सुहृदुच्चभागे ।
आरोहिणी निम्नपरिच्युतस्य
नीचारिभांशेष्वधमा भवेत्सा ॥५६॥
पहले बताया जा चुका है कि किसी राशि के किस अंश पर
कौनसा ग्रह परम उच्च होता है और किस राशि के किस अंश
पर परम नीच होता है । उदाहरण के लिये मेष राशि के दस
अंश पर सूर्य परम उच्च होता है और तुला राशि के दस अंश
पर सूर्य परम नीच होता है । तो तुला के दस अंश से निकल
कर जब तक मेष के दस अंश पर सूर्य नहीं पहुँचेगा तब तक उसे
आरोही अर्थात् चढ़ता हुआ कहेंगे । अपने उच्च (ऊँचे) भाव की ओर
जा रहा है इसलिये चढ़ता हुआ कहा और मेष के १० अंश को
श्लोक ५४ की विस्तृत व्याख्या के लिये देखिये सुगम ज्योतिष
प्रवेशिका । फलदीपिका के श्लोक के द्वितीय चरण में “कारक भुक्ति षु”
यह लिखा था किन्तु लघुपाराशरी में इसी श्लोक में “मारक भुक्तिष”
यह पाठ है जो अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है । वही पाठ हमने
इसमें शुद्ध कर दिया है ।

४१८ फलदीपिका
पार कर जब तक तुला के दस अंश तक सूर्य न पहुँचे तब तक
उसे अवरोही अर्थात् उतरता हुआ कहते हैं । अपनी नीच राशि
की ओर जा रहा है इसलिये उतरता हुआ कहा । यदि किसी अवरोही
ग्रह की दशा हो तो उत्तम नहीं; यदि किसी आरोही ग्रह की
दशा हो तो उत्तम है । किन्तु चाहे अवरोही ही हो, दशा यदि
ग्रह अपने मित्र के नवांश में या उच्च नवांश में हो तो उतनी
ख़राब नहीं होती बल्कि यह कहना चाहिये कि साधारणतया अच्छी
हो जाती है । लेकिन इसके विपरीत चाहे कोई ग्रह आरोही ही
क्यों न हो, यदि वह नीच राशि या शत्रु राशि या नीच नवांश या
शत्रु नवांश में हो तो अधम होती है, उसकी दशा खराब जाती है ।
नीचे क, ख, ग इन तीन गुणों में सब में ग्रह अच्छा हो तो बहुत
अच्छा फल । सब में तीनों क, ख, ग में खराब हो तो खराब
फल । क, ख, ग में किसी में अच्छी स्थिति, किसी में ख़राब स्थिति
तो तारतम्य के अनुसार मिश्रित फल ।
क (i) आरोही अच्छा
(ii) अवरोही खराब
ख (i) उच्च राशि
अधिमित्र राशि अच्छा
मित्र राशि
(ii) नीच राशि
अधिशत्रु राशि खराब
शत्रु राशि
ग (i) उच्च नवांश
वर्गोत्तम नवांश उत्तम
अधिमित्र या
मित्र नवांश
(ii) नीच नवांश
अधिशत्रु या खराब
शत्रु नवांश

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१९
“बृहत् जातक” के अष्टम अध्याय में इसे बहुत अच्छी तरह
समझाया गया है। (क) यदि कोई ग्रह बहुत बलवान् हो या परमोच्च
हो तो उसकी दशा सम्पूर्ण धन और आरोग्य को देने वाली होती
है। (ख) यदि कोई ग्रह अपनी उच्च राशि में है और किंचित् बल
युक्त भी है तो उसकी दशा पूर्णा कहलाती है। इसकी दशा--अन्त-
र्दशा में धन वृद्धि होती है। (ग) यदि कोई ग्रह निर्बल हो तो उसकी
दशा रिक्ता कहलाती है। रिक्ता दशा में स्वास्थ्य और धन की कमी
रहती है और रोग तथा दरिद्रता की बहुतायत रहती है। (घ) यदि
कोई ग्रह नीच नवांश या शत्रु नवांश में हो तो अनिष्ट फला कहलाती
है। इसमें शारीरिक और धन विषयक कष्ट होता है। (ङ) यदि
कोई ग्रह अवरोही हो किन्तु मित्र या अधिमित्र नवांश में हो तो मध्या
कहलाती है। इसमें किंचित् वृद्धि होती है ॥ ५६ ॥
शस्तगृहे शस्तांशे नीचे रिपुभेऽस्तसंस्थिते वाऽपि ।
तस्य दशा मिश्रफला दशापरार्धे फलप्रदा ज्ञेया ॥५७॥
चाहे कोई ग्रह नीच राशि, शत्रु राशि में ही क्यों न हो-चाहे
कोई ग्रह अस्त ही क्यों न हो यदि वह उत्तम भाव और उत्तम नवांश
में हो तो उसकी दशा को मिश्र फला अर्थात् मिला-जुला फल देने
वाली कहेंगे। वराहमिहिर के मत से उस ग्रह की दशा को मिश्र-
फला कहते हैं जो ग्रह अपनी उत्तम राशि में हो (उच्च राशि या
अपनी राशि में हो) किन्तु नीच नवांश या शत्रु नवांश में हो तो
उस ग्रह की दशा मिली-जुली होती है। कभी आरोग्य, कभी धन,
कभी व्याधि, कभी दरिद्रता। मन्त्रेश्वर महाराज के मत से मिश्रफला
का शुभ प्रभाव उत्तरार्द्ध में होता है ॥ ५७ ॥
तत्तद्भावात् व्ययस्थस्य तद्भावव्ययपस्य च ।
वीर्यहीनस्य खेटस्य पाके मृत्युमवाप्नुयात् ॥५८॥

४२० फलदीपिका
यदि कोई ग्रह वीर्यहीन अर्थात् बलहीन हो तो उसकी दशा-
अन्तर्दशा में मृत्यु होगी। किसकी ? जिस भाव से निर्बल ग्रह द्वादश
में बैठा है उस भाव से जिसका विचार किया जाता है उसकी या,
जिस भाव का दुर्बल ग्रह व्ययेश है, उस भाव से जिसका विचार
किया जाता है उसकी। एक उदाहरण द्वारा यह स्पष्ट किया जाता है।
मान लीजिये कोई दुर्बल ग्रह द्वितीय का मालिक होकर नवम में बैठा
है तो इसकी दशा-अन्तर्दशा में जातक के भाई की या पिता की मृत्यु
हो सकती है। क्यों ? वह द्वितीयेश है। अर्थात् तीसरे घर का
व्ययेश है। तीसरे घर से १२वाँ लग्न दूसरा घर हुआ इसलिए
द्वितीयेश तृतीय स्थान का व्ययेश हुआ और ऊपर बताया जा चुका
है कि जिस भाव का व्ययेश दुर्बल हो उस भाव का नाश होता है।
तृतीय से भाई का विचार किया जाता है इसलिए बलहीन
द्वितीयेश की दशा में भाई को कष्ट कहना । दूसरी बात जो इस
श्लोक में बतायी है वह यह कि जिस भाव के व्यय स्थान में दुर्बल
ग्रह बैठे उस भाव को भी कष्ट पहुँचाता है। ऊपर के उदाहरण में
दशम से यदि पिता का विचार किया जाय तो नवम में दुर्बल ग्रह
बैठा हुआ, दशम के व्यय में होने के कारण पिता को कष्ट पहुँचावेगा।
नतीजा यह निकला कि दुर्बल ग्रह जिस भाव का व्ययेश हो उसका
भी नाश करे और जिस भाव के व्यय में बैठे उसका भी नाश
करे ॥ ५८ ॥
अब यह बताते हैं कि दशानाथ के गोचर से उसकी दशा के
प्रभाव में क्या अन्तर होता है।
दशापतिर्लग्नगतो यदि स्यात्
त्रिषट्दशैकादशगश्च लग्नात् ।
तत्सप्तवर्गेऽप्यथ तत्सुहृद्वा
लग्ने शुभो वा शुभदा दशा स्यात् ॥५६॥

बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२१
जिस ग्रह की दशा हो वह गोचरवश लग्न में या लग्न से
तीसरे, छठे, दसवें या ग्यारहवें यदि आवे तो उसकी दशा शुभ जाती
है । या यदि दशानाथ लग्न से सप्तम में आता है तो भी दशा शुभ
जाती है । यदि दशानाथ का मित्र गोचरवश लग्न में आवे या कोई
शुभ ग्रह गोचरवश लग्न में जा रहा हो तो भी दशा अच्छी जाती
है ॥ ५९ ॥
यावन्ति वर्षाणि दशा च सा स्यात्-
चारक्रमात्तत्र दशापतिः सः ।
यत्र स्थितस्तद्भवनाद्विधोस्तु
स्थितेः प्रकल्प्यं सदसत्फलं हि ॥६०॥
यह देखिये कि जिस ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा जा रही है
वह इस समय गोचरवश जन्मकालीन चन्द्रमा से किस स्थान पर है ।
जिस समय दशानाथ जन्मकालीन चन्द्रमा से उत्तम स्थानों पर
रहेगा उस समय अच्छा प्रभाव दिखावेगा और जिस समय गोचरवश
जन्म राशि से अनिष्ट स्थानों पर रहेगा उस समय अनिष्ट फल
दिखावेगा ॥६०॥
दशाधिनाथस्य सुहृद्गृहस्थ-
स्तदुच्चगो वाऽथ दशाधिनाथात् ।
स्मरत्रिकोणोपचयोपगश्च
ददाति चन्द्रः खलु सत्फलानि ॥६१॥
चन्द्रमा जब गोचरवश नीचे लिखे किसी स्थान पर होता है तो
शुभ फल दिखाता है । (क) दशानाथ के मित्र के घर में (ख)

४२२ फलदीपिका
दशनाथ जिस राशि में होता है उस राशि में । (ग) दशनाथ
जिस राशि में है उससे ३, ५, ६, ७, ९, १०, ११वें घर में ॥६१॥
उक्तेषु राशिषु गतस्य विधोः स राशिः ।
स्याज्जन्मकालभवमूर्तिधनादिभावः ।
तत्तद्विवृद्धिकृदसौ कथितो नराणां
तद्भावहानिकृदथेतरराशिसंस्थः ॥६२॥
ऊपर के श्लोक में यह बताया गया है कि चन्द्रमा किन-किन
स्थानों पर शुभ होता है। अन्य स्थानों पर अशुभ समझना चाहिये ।
शुभ स्थान जिस भाव में पड़े, वह यदि लग्न, धन लाभ आदि में
हो तो उसकी वृद्धि होगी। उपर्युक्त प्रकार से चन्द्रमा जिस भाव
में अशुभ हो वह अशुभ स्थान जन्मकुण्डली के जिस भाव में पड़े
उस भाव की हानि होगी। मान लीजिये मेष लग्न है और दशनाथ
बृहस्पति है जो धनु राशि में बैठा है तो बृहस्पति की उच्च राशि
कर्क है इस कारण कर्क का चन्द्रमा शुभ होगा। ६१वें श्लोक
में जो शुभ स्थान गिनाये हैं उनमें मकर नहीं है इस कारण
मकर अशुभ स्थान हुआ । इसलिये कर्क राशि अर्थात् लग्न से चौथे
भाव को चन्द्रमा बढ़ावेगा और मकर राशि अर्थात् लग्न से दशम
भाव को चन्द्रमा कष्ट पहुँचावेगा ॥ ६२ ॥
सारावलीमुडुदशां च वराहहोरा-
मालोक्य जातकफलं प्रवदेन्नराणाम् ।
प्रश्नोदयग्रहवशादथ वा स्वजन्म-
राश्यादिना वदतु नास्त्यनयोर्विशेषः ॥६३॥
सारावली (यह कल्याण वर्मा विरचित फलित ज्योतिष का संस्कृत
ग्रन्थ है), उडुदशा (उडदाय प्रदीप, उडुदशा या नक्षत्रदशा सम्बन्धी

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२३
फलित ज्योतिष का ग्रन्थ है) तथा वराहमिहिर रचित होराशास्त्र के
आधार पर जातक की कुण्डली का फलादेश करना चाहिये । अथवा
प्रश्न कुण्डली बना कर उससे फलादेश करे या जातक की जन्म
राशि से विचार करें । इनमें कोई विशेष अन्तर नहीं आता । मन्त्रेश्वर
महाराज के विचारानुसार जन्म कुण्डली के आधार पर जैसे सुचारु
रूप से फलादेश किया जा सकता है वैसे ही जन्म राशि तथा प्रश्न-
कुण्डली पर से भी—उतना ही अच्छा विचार किया जा सकता है ।
भावार्थ रत्नाकर के कुछ योग निचे दिये हैं :—
धन योग विचार
१. यदि दूसरे घर का स्वामी पाँचवें हो और पाँचवे घर का
स्वामी दूसरे, अथवा दूसरे घर का स्वामी ग्यारहवें हो और ग्यारहवें
का स्वामी दूसरे अथवा पाँचवें घर का स्वामी पाँचवें और नवें का
स्वामी नवें घर में हो तो विशेष धन योग होता है ।
२. यदि द्वितीय और लाभ के स्वामियों के साथ अन्य भवन
का स्वामी भी बैठा हो तो उतना धन योग नहीं होता —जितना
केवल धनेश लाभेश के योग से होगा । यहाँ यह भी तारतम्य कर
लेना चाहिये कि वह अन्य स्थान का स्वामी—जो धनेश, लाभेश के
साथ बैठा है—कौन है ।
लग्नेश होगा तो शुभ ही होगा। चतुर्थेश यदि साथ में बैठ जाता
है तो उत्तम है किन्तु यदि छठे, बारहवें या आठवें का स्वामी साथ
में बैठ जावेगा तो धनेश लाभेश की एकत्र स्थिति के योग को
भ्रष्ट करेगा ।
साथ ही यह भी विचार करना चाहिये कि पंचमेश, या नवमेश

४२४ फलदीपिका
यदि धनेश लाभेश- दोनों जहाँ बैठे हों वहाँ हों तो धन योग को वृद्धि
करेंगे-कमी नहीं करेंगे।
३. यदि दूसरे और ग्यारहवें घर के स्वामी पाँचवें या नवें
घर के स्वामी से सम्बन्ध करें तो विशेष धन योग होता है किन्तु
यदि दुःस्थानों के स्वामी (६. ८-१२ दुःस्थान माने जाते हैं) धनेश
लाभेश तथा त्रिकोणेश से सम्बन्ध करें तो वह योग नष्ट होता है।
४. यदि दूसरे और ग्यारहवें घर के मालिक बारहव घर के
मालिक के साथ बैठे हों या उससे सम्बन्ध करते हों तो धन योग
नष्ट होता है।
५. यदि धनकारक बृहस्पति का धनाधीश (दूसरे घर के स्वामी)
से सम्बन्ध हो अथवा बृहस्पति का बुध से भी सम्बन्ध हो तो धन
योग होता है।
६. यदि लग्नेश लग्न में, धनेश धन में और लाभेश लाभ में
बैठा हो तो विशेष धन योग होता है।
७. दूसरे और ग्यारहवें घर के मालिक दोनों लग्न में बैठे हों
तो भी धन योग है।
८. यदि उन-उन भावों में उन-उन भावों के कारक बैठे हों तो
जिस भाव में कारक बैठा हो उस भाव का फल थोड़ा होता है। *
सर्वेषु भावस्थानेषु तत्तद्भावादिकारकः ।
विद्यते तस्यभावस्य फलम् स्वल्पमुदीरितम् ॥
९. यदि चन्द्रमा सातवें का मालिक हो कर दूसरे घर में बैठा
हो और चन्द्रमा के साथ अन्य कोई ग्रह न बैठा होतो नष्ट धन गया
हुआ वापस आ जाता है

  • किस भाव का कौन ग्रह कारक है—या कौन से ग्रह कारक
    यह फलदीपिका के अध्याय १५ श्लोक १७ में बताया गया है।