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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

३२८ फलदीपिका
की मृत्यु होगी । मृत्यु के समय लग्न कौन सा होगा ? जातक
की जन्मकुण्डली में लग्न, चन्द्रमा और मान्दि स्पष्टों को जोड़िये ।
जो योग आवे उस राशि का स्वामी कहाँ बैठा है यह देखिये । जिस
राशि में बैठा है वही राशि मृत्यु के समय लग्न होगी । ॥१२॥
गुलिकं रविसूनुं च गुणित्वा नवसंख्यया ।
उभयोरैक्यराश्यंशगृहगे रविजे मृतिः ॥१३॥
मान्दि स्पष्ट को नौ (९) से गुणा कीजिये तथा शनि स्पष्ट को
९ से गुणा कीजिये । दोनों का योग कीजिये । यह योग जिस राशि
और जिस नवांश पर आवे उस पर जब गोचरवश शनि आता है तो
जातक की मृत्यु हो सकती है ।
स्फुटे विलग्ननाथस्य 'विशोध्य यमकण्टकम् ।
तद्राशिनवभागस्थे जीवे मृत्युर्न संशयः ॥१४॥
लग्नेश-स्पष्ट में से यमकंटक घटाइये और यह देखिये कि कौन
सी राशि और कौनसा नवांश आता है । जब बृहस्पति गोचरवश इस
नवांश पर आता है तो जातक की निस्सन्देह मृत्यु होगी । ॥१४॥
षष्ठावसानरन्ध्रेशस्फुटैक्यभवनं गते ।
तत्त्रिकोणोपगे वाऽपि मन्दे मृत्युभयं नृणाम् ॥१५॥
षष्ठेश, अष्टमेश, और द्वादशेश इन तीनों ग्रहों की राशि, अंश
कला जोड़िये । अर्थात् इन तीनों के ग्रह स्पष्ट जोड़िये । जोड़ने से जो
राशि आवे उस राशि में या उससे नवम पंचम जब शनि आवे तो
जातक की मृत्यु हो सकती है । ॥१५॥

सत्रहवां अध्याय : निर्याणप्रकरण ३२९
उद्यद्द्रैष्काणपतिराशिगते सुरेड्ये
तस्य त्रिकोणमपि गच्छति वा विनाशम् ।
रन्ध्रत्रिभागपतिमन्दिरगेऽथ मन्दे
प्राप्ते त्रिकोणमथवास्य वदन्ति मृत्युम् ॥१६॥
यह देखिये कि जन्म लग्न में जो द्रेष्काण है उसका स्वामी कहाँ
है । जब बृहस्पति इस द्रेष्काण पति के ऊपर से गुजरे या उससे नवम-
पंचम गोचरवश जावे तो जातक को मृत्युभय होता है । यह बृहस्पति
के गोचर वश फल बताया गया है । अब इसी श्लोक में शनि के
गोचरवश कब मृत्युभय होगा यह बताते हैं: यह देखिये कि अष्टम
भाव मध्य पर कौन सा द्रेष्काण है । और यह द्रेष्काण पति कहाँ
पर है । जब शनि इस द्रेष्काण-पति की राशियों में से गुजरता है
या उससे नवम पंचम जाता है तो जातक को मृत्युभय होता
है।* ॥१६॥
विलग्नजन्माष्टमराशिनाथयोः
खरत्रिभागेश्वरयोस्तयोरपि ।
शशाङ्कमान्योरपि दुर्बलांशक-
त्रिकोणगे सूर्यसुते मृतिर्भवेत् ॥१७॥

  • मूल श्लोक में शब्द आया है रन्ध्रत्रिभागपति मन्दिरगेऽथ
    इसके दो अर्थ हो सकते हैं अष्टम भाव में जो द्रेष्काण है उसका
    स्वामी जिस राशि में है उसमें से जब शनि गुज़रे तो मृत्यु समय
    या जब उससे नवमपंचम जावे तो जातक को मृत्युभय हो
    सकता है ।

३३० फलदीपिका
यह देखिये कि निम्नलिखित दो-दो में से कौन सबसे अधिक
दुर्बल है: (i) लग्न से अष्टम राशि का स्वामी और जन्म-राशि
से अष्टम राशि का स्वामी (ii) जन्म लग्न से २२वें द्रेष्काण का
स्वामी और चन्द्रलग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी (iii) चन्द्रमा और
(iv) मान्दि। इन मे जो सबसे दुर्बल हो वह जिस नवांश में है
उस नवांश से जब शनि गोचरवश या इससे नवम या पंचम जाता
है तो जातक को मृत्युभय होता है । ॥१७॥
लग्नाधिपस्थितनवांशकराशितुल्यं
रन्ध्राधिपस्य गृहमापतिते घटेशे ।
तस्मिन्वदेन्मरणयोगमनेकशास्त्र-
संक्षुण्णखिन्नमतिभिः परिकीर्तितं तत् ॥१८॥
यह देखिये कि लग्नेश किस नवांश में है। इस नवांश की राशि
को कहिये "क"। अष्टमेश किस राशि में है—जिसमें हो उसे कहिये
"ख"। मेष से जितनी दूर "क" राशि है, "ख" से उतनी ही दूर
राशि पर जब गोचरवश शनि जाता है तब जातक की मृत्यु हो
सकती है। ऐसा उन विद्वानों का मत है जिन्होंने अनेक शास्त्रों का
अध्ययन किया है । ॥१८॥
शशाङ्कसंयुक्तदृगाणपूर्वतः
खरत्रिभागेशगृहं गतेऽपि वा ।
त्रिकोणगे वा मरणं शरीरिणां
शशिन्यथ स्यात्तनुरन्ध्ररिःफगे ॥१६॥
अब यह बताते हैं कि मृत्यु के समय चन्द्रमा कहाँ होगा । इस
श्लोक में यह बताया गया है कि निम्नलिखित किन्हीं स्थानों में
चन्द्रमा मृत्यु के समय हो सकता है ।

सत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३३१
(i) जन्म कालीन जिस द्रेष्काण में चन्द्रमा हो उसमें जब
गोचर वश चन्द्रमा आवे
(ii) जन्म में चन्द्रमा जिस स्थान पर है वहाँ से गिनने पर जो
बाइसवाँ द्रेष्काण हो उस २२वें द्रेष्काण के स्वामी की राशि।
(iii) ऊपर (i) तथा (ii) में जो स्थान बताये गये हैं उनसे
नवम या पंचम (iv) लग्न में (v) लग्न से अष्टम या (vi) लग्न
से द्वादश ।॥१९॥
निधनेश्वरगतराशौ भानाविन्दौ तु भानुगतराशौ ।
निधनाधिपसंयुक्ते नक्षत्रे निर्दिशेन्मरणम् ॥२०॥
यदि जन्म लग्न से अष्टम का स्वामी जहाँ बैठा है उस राशि
में सूर्य गोचरवश जा रहा हो और चन्द्रमा (क) जिस राशि में
जन्म कुण्डली में सूर्य बैठा हो उस राशि में जा रहा हो (ख) या
जन्म लग्न से अष्टमेश जन्मकुण्डली में जिस नक्षत्र में हो उस
नक्षत्र में चन्द्रमा गोचरवश हो तो जातक की मृत्यु हो सकती है।*
॥२०॥
यो राशिर्गु लिकोपेतः तत्त्रिकोणगते शनौ ।
मरणं निशिजातानां दिविजानां तदस्तके ॥२१॥

  • जब दशा-अन्तर्दशा मारक ग्रह की हो तब शनि गोचरवश
    कब मारक होगा और गुरु गोचरवश कब मारक होगा, यह सब
    निकाल लेने पर सूर्य और चन्द्रमा के अनिष्ट गोचर का विचार
    करना चाहिये अन्यथा सूर्य तो एक वर्ष में और चन्द्रमा एक मास
    में सब राशि भ्रमण कर लेता है।

३३२ फलदीपिका
यदि जातक का जन्म रात्रि का हो तो यह देखिये कि गुलिक
किस राशि में है। उस राशि से जब त्रिकोण में गोचरवश शनि आवे
तो जातक की मृत्यु हो सकती है और यदि दिन का जन्म हो तो गुलिक
जिस राशि में है उससे सप्तम राशि में जब गोचरवश शनि आवे तो
मृत्युप्रद हो सकता है ।।२१।।
गुरुराहुस्फुटैक्यस्य राशिं यातो गुरुर्यदा ।
तदा तु निधनं विद्यात्तत्त्रिकोणगतोऽथवा ॥२२॥
बृहस्पति स्पष्ट और राहु स्पष्ट को जोड़ लीजिये। जो राशि आवे
उसमें गोचरवश जब बृहस्पति जावे या उस राशि से नवम या पंचम
गुरु गोचर में हो तो मृत्युप्रद हो सकता है ।।२२।।
अष्टमस्य त्रिभागांशपतिस्थितगृहं शनौ ।
तदीशनवभागाक्षं गते वा मरणं भवेत् ॥२३॥
(१) लग्न से गिनने पर अष्टम भाव मध्य पर जो द्रेष्काण
हो उस द्रेष्काण का स्वामी जन्मकुण्डली में जहाँ बैठा है उस राशि
में गोचरवश जब शनि आवे तो जातक की मृत्यु हो सकती है ।
(२) जन्म लग्न से अष्टमेश जिस नवांश में हो उस नवांश राशि
में भी जब शनि गोचरवश भ्रमण करे तो मृत्यु कर सकता है।
।।२३।।
जन्मकाले शनौ यस्य जन्माष्टमपतेरपि ।
राशेरंशकराशेर्वा त्रिकोणस्थे शनौ मृतिः ॥२४॥
(१) जन्म कुण्डली में शनि जिस राशि और अंश में है उस
राशि या उस अंश में या उससे नवमपंचम जब गोचरवश शनि

सत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३३३
जावे तो मृत्यु कर सकता है। (२) जन्मकुण्डली में चन्द्रमा जिस
राशि में है उस राशि काँ स्वामी जिस राशि या अंश में हो या
उसमे नवम या पचम जब गोचरवश शनि हो तो मृत्युप्रद हो सकता
है। (३) जन्म लग्न से अष्टमेश जिस राशि या अंश में हो उसमें
या उससे नवम पंचम यदि गोचर वश शनि हो तो मृत्यु कर सकता
है। ॥२४॥
निशीन्दुराशौ चेज्जन्म मान्दिभेंऽशे शनौ मृतिः ।
दिवार्कभे चेत्तद्द्यूनत्रिकोणे वा शनौ मृतिः ॥२५॥
(१) यदि रात्रि का जन्म हो तो मृत्यु तब होगी जब
शनि गोचरवश उस राशि और अंश में जा रहा हो जिस में चन्द्रमा
या मान्दि हो (२) यदि दिन में जन्म है तो मृत्यु उस समय होगी
जब जिस राशि और अंश में सूर्य हो उसमें अथवा उससे ५वें, ७वें
या ९वें जब गोचरवश शनि जावे । ॥२५॥
रन्ध्रेश्वराद्यावति भे मान्दिस्तावति भे ततः ।
शनिश्चेन्मरणं ब्रूयादिति सद्गुरुभाषितम् ॥२६॥
जन्मकुण्डली में यह देखिये कि अष्टमेश से मान्दि कितने राशि
और कितने अंश दूर है। जब मान्दि से इतनी ही राशि और इतनी
ही अंश की दूरी पर शनि गोचरवश आवे तब जातक की मृत्यु होगी,
यह सद्गुरुओ का कथन है । ॥२६॥
जन्मकालीनभृगुजात्कामशत्रुव्यये रवौ ।
मरणं निश्चितं ब्रूयादिति सद्गुरुभाषितम् ॥२७॥

३३४ फलदीपिका
यह देखिये कि जन्मकुण्डली में शुक्र किस राशि में है । इस राशि
से जब गोचरवश ६ठे, ७वें या १२वें सूर्य हो तब मृत्यु होगी । ऐसा
तो प्रति वर्ष तीन बार होता है इसलिये जैसा पहले बता चुके हैं जब
अन्य बातों से पूर्ण मारक का योग आता है तभी यह विचार करना
चाहिये कि मृत्यु कब होगी । ॥२७॥
तिष्ठन्त्यष्टमरिःफषष्ठपतयो रन्ध्रत्रिभागेश्वरो
मान्दिर्यद्भवनेषु तेष्वपि गृहेष्वार्कीज्यसूर्येन्दवः ।
सर्वे चारवशात्प्रयान्ति हि यदा मृत्युस्तदा स्यान्नृणां
तेषामंशवशाद्वदन्तु निधनं तत्तत्त्रिकोणेऽपि वा ॥२८॥
यह देखिये कि निम्नलिखित कुण्डली में किन राशियों में हैं:—
(१) अष्टमेश (२) व्ययेश (३) षष्ठेश (४) अष्टम भाव मध्य
जिस द्रेष्काण में है उसका स्वामी (५) मान्दि। जब गोचर वश शनि,
बृहस्पति, सूर्य और चन्द्र उपर्युक्त राशियों में जा रहे हो तो जातक
की मृत्यु हो सकती है अथवा उपर्युक्त जिन नवांशों में हो उन
नवांशों में या उनसे नवम पंचम जब शनि, गुरु, सूर्य, चन्द्र गोचर-
वश जावें तो मृत्यु हो सकती है । ॥२८॥

अठारहवां अध्याय
द्विग्रहयोग
दो-दो ग्रहों के योग का फल
दो दो ग्रहों के योग का जन्म कुण्डली में क्या फल होता है यह
इस अध्याय में बताया गया है।
तिग्मांशुर्जनयत्युषेशसहितो यन्त्राश्मकारं नरं
भौमेनाघरतं बुधेन निपुणं धीकीर्तिसौख्यान्वितम् ।
क्रूरं वाक्पतिनान्यकार्यनिरतं शुक्रेण रङ्गायुधै-
र्लब्धस्वं रविजेन धातुकुशलं भाण्डप्रकारेपु वा ॥१॥
कूटस्त्र्यासवकुंभपण्यमशिवं मातुः सवक्रः शशी
सज्ञः प्रथितवाक्यमर्थनिपुणं सौभाग्यकीर्त्यान्वितम् ।
विक्रान्तं कुलमुख्यमस्थिरमतिं वित्तेश्वरं साङ्गिरा
वस्त्राणां ससितः क्रियादिकुशलं सार्किः पुनर्भू सुतम् ॥२॥
मूलादिस्नेहकूटैर्व्यवहरति वणिग्बाहुयोद्धा ससौम्ये
पुर्यध्यक्षः सजीवे भवति नरपतिः प्राप्तवित्तो द्विजो वा ।
गोपो मल्लोऽथ दक्षः परयुवतिरतो द्यूतकृत्सासुरेज्ये
दुःखार्तोऽसत्यसन्धः ससवितृतनये भूमिजे निन्दितश्च ॥३॥
सौम्ये रङ्गचरो बृहस्पतियुते गीतप्रियो नृत्यविद्
वाग्मी भूपगणपः सितेन मृदुना मायापटुर्लम्पटः ।

३३६ फलदीपिका
सद्विद्यो धनदारवान् बहुगुणः शुक्रेण युक्ते गुरौ
ज्ञेयः श्मश्रुकरोऽसितेन घटकृज्जातोऽन्नकारोऽपि वा ॥४॥
असितसितसमागमेऽल्पचक्षु-
र्युवतिसमाश्रयसम्प्रवृद्धवित्तः ।
भवति च लिखिपुस्तकचित्रवेत्ता
कथितफलैः परतो विकल्पनीयाः ॥५॥
(i) यदि जन्म के समय सूर्य और चन्द्रमा एक राशि में हों तो
जातक यंत्र और पत्थर के काम में कुशल होता है; सूर्य और मंगल
एक साथ हों तो पाप करता है; सूर्य और बुध एक राशि में हों तो
निपुण, बुद्धिमान्, कीर्तिवान् और सुखी हो । सूर्य बृहस्पति एक राशि
में हों तो क्रूर हो और अन्य लोगों के कार्य में लगा रहे; सूर्य और
शुक्र एक साथ हों तो रंग अर्थात् नाचना, गाना, सिनेमा, नाटक आदि
से या शस्त्रों द्वारा धनोपार्जन करे; सूर्य शनि एक साथ हों तो धातु
(लोहा इत्यादि) के कामों में अथवा बर्तनों के कार्य में कुशल हो ॥१॥
(ii) यदि चन्द्र-मंगल एक साथ हों तो आसव, घड़े दुकानदारी
भरत के बर्तन (जो दो धातुओं को मिलाकर बनाया जाता है) आदि
का कार्य करे । मातृ सुख के लिये यह योग अच्छा नहीं है । यदि माता
जीवित रहेगी तो सम्भवतः बालक उसका आज्ञाकारी न हो । यदि
चन्द्र-बुध साथ हों तो जातक मीठे और नम्र वचन बोलने वाला,
अर्थ निपुण (धन के कार्य में निपुण अथवा किसी वाक्य या गणित का
अर्थ लगाने में निपुण) सौभाग्यवान् और कीर्तिवान् हो । यदि चन्द्रमा
और बृहस्पति एक साथ हों तो विक्रमशाली, अपने कुल में मुख्य और
बहुत धनी हो किन्तु ऐसा व्यक्ति अस्थिर मति होता है अर्थात् मुस्तकिल
मिजाज नहीं होता । यदि चन्द्रमा और शुक्र एक साथ हों तो वस्त्र-
क्रिया (कपड़े के कारबार) में कुशल हो । यदि चन्द्रमा और शनि

अठारहवां अध्याय : द्विग्रहयोग ३३७
एक साथ हों तो ऐसी स्त्री का पुत्र हो जिसने द्वितीय बार विवाह किया
हो । हमारे विचार से यह योग हिन्दू समाज की उन जातियों पर घटित
नहीं होगा जिनमें पुनर्विवाह की प्रथा नहीं है । ॥ २ ॥
(iii) यदि मंगल और बुध एक-साथ हों तो मूल (जड़ वाले
पदार्थ—जड़ी बूटी, पौधे, वृक्ष, वृक्ष की छाल आदि), तेल, घी, चिकने
पदार्थ, दवा आदि के व्यापार से लाभ होता हैं और जातक बाहु से
युद्ध करने वाला भी होता है। यदि मंगल और बृहस्पति एक साथ हों
तो किसी नगरी का अध्यक्ष हो या राजा हो या धनवान् ब्राह्मण हो ।
यदि मंगल और शुक्र एक साथ हों तो गोप (गौओं का मालिक), पहलवान,
दूसरे की स्त्रियों में रत, जुआ खेलने वाला और चतुर होता है।
यदि मंगल और शनि साथ हों तो दुःखी निन्दित, झूठी प्रतिज्ञा वाला
अर्थात् झूठ बोलने वाला होता है। ॥३॥
(iv) यदि किसी जन्मकुण्डली में बुध और बृहस्पति एक साथ हो
तो जातक नाटक में काम करने वाला (स्टेज पर) गाने का शौकीन और
नृत्यकला जानने वाला होता है। यदि बुध और शुक्र साथ हों तो
जातक वाग्मी (अच्छा बोलने वाला) ज़मीन का स्वामी, गण (चुनी
हुई संस्थाओं) का अध्यक्ष होता है। यदि बुध और शनि एक
साथ हो तो मायापटु (बहुत चालाक) और लम्पट हो ।
(v) यदि बृहस्पति और शुक्र एक साथ हों तो जातक उत्तम
विद्या वाला, धनवान्, स्त्रियों से युक्त और बहुत गुणों से सम्पन्न होता
है। यदि बृहस्पति और शनि एक साथ हों तो जातक नाई का,
कुम्हार का या भोजन बनाने वाले का कार्य करे ऐसा मन्त्रेश्वर
महाराज का मत है। हमारे विचार से बृहस्पति ज्ञान का प्रतीक है
और शनि वैराग्य का इस कारण बृहस्पति व शनि एक साथ हों तो
जातक अन्तर्मुखी वृत्ति वाला होता है। ॥ ४ ॥
(vi) यदि शुक्र और शनि एक-साथ हों तो जातक की दृष्टि
में कुछ कमी हो । ऐसे व्यक्ति की सम्पत्ति, वृद्धि किसी युवती का

३३८ फलदीपिका
आश्रय लेने से होती है। ऐसा व्यक्ति लिखने में, चित्रकारी में,
पुस्तक आदि के कार्य में दक्ष होता है। ऊपर दो-दो ग्रहों के एक
साथ होने का फल बताया गया है। यदि दो से अधिक ग्रह एक साथ
हों तो ऊपर कहे हुये फलों का तारतम्य कर फलादेश करना
चाहिये । ॥५॥
भूपो विद्वान् भूपतिर्भूतुल्य-
श्चन्द्रे मेषे मोषको निर्धनश्च ।
निस्स्वः स्तेनो लोकमान्यो महीशः
स्वाढ्यः प्रेष्यश्चापि दृष्टे कुजाद्यैः ॥६॥
युग्मस्थेऽयोजीविभूपज्ञदृष्टा-
श्चन्द्रे दृष्टे तन्तुवायोऽधनी च ।
स्वर्क्षे योधप्राज्ञसूरिक्षितीशा
लोहाजीवो नेत्ररोगी क्रमेण ॥७॥
राजा ज्योतिर्विद्धनाढ्यो नरेन्द्रः
सिंहे चन्द्रे नापितः पार्थिवेन्द्रः ।
दक्षो भूपः सैन्यपः कन्यकायां
निष्णातः स्याद्भूमिनाथश्च भूपः ॥८॥
शठो नृपस्तौलिनी रुक्मकार
श्चन्द्रे वणिक् स्यात्पिशुनः खलश्च ।
कीटे नृपो युग्मपिता महीशः
स्याद्वस्त्रजीवी विकृताङ्गवित्तः ॥९॥

अठारहवां अध्याय : द्विग्रहयोग ३३९
धूर्तो हयाङ्गे स्वजनं जनेशं
नरौघमाश्रित्य शठः सदम्भः ।
भूपो नरेशः क्षितिपो विपश्चि-
द्धनी दरिद्रो मकरे हिमांशौ ॥१०॥
कुम्भेऽन्यदारनिरतः क्षितिपो नरेन्द्रो
वेश्यापतिर्नृपवरो हिमगौ नृमान्यः ।
अन्त्येऽघकृत्पटुमतिर्नृपतिश्च विद्वान्
दोषैकहग्दुरितकृच्च कुजादिदृष्टे ॥११॥
(i) यदि चन्द्रमा मेष में हो और उस पर सूर्य, मंगल, बुध,
बृहस्पति, शुक्र या शनि की दृष्टि हो तो क्रमशः निम्नलिखित फलें
होते हैं (१) गरीब (२) राजा हो (३) विद्वान् (४) राजा
(५) राजा के समान (६) चोर ।
(ii) यदि चन्द्रमा वृषभ में हो और सूर्य, मंगल, बुध, बृहस्पति
शुक्र या शनि से देखा जाय तो क्रमशः निम्नलिखित फल होता है ।
(१) नौकर (२) धनहीन (३) चोर (४) लोकमान्य (५) राजा
और (६) धनी । ॥६॥
(iii) मदि चन्द्रमा मिथुन का हो और सूर्य, मंगल बुध, बृहस्पति,
शुक्र, शनि से दृष्ट हो तो क्रमशः निम्नलिखित फल होता है
(१) निर्धन (२) लोहे का काम करने वाला (३) राजा
(४) विद्वान् (५) साहसी (६) तानेबाने या कपड़े का काम करने
वाला ।
(iv) यदि चन्द्रमा कर्क में हो और सूर्य, मंगल, बुध, बृहस्पति,
शक्र, शनि की उस पर दृष्टि हो तो क्रमशः निम्नलिखित फल होता
है । (१) नेत्र-रोगी (२) योद्धा (३) विद्वान् (४) बुद्धिमान्

३४० फलदीपिका
(५) राजा और (६) लोहे के पदार्थ से आजीविका कमाने
वाला। ॥७॥
(v) यदि चन्द्रमा सिंह में हो और भिन्न-भिन्न ग्रहों से दृष्ट
हो तो निम्नलिखित फल होता है (१) सू० से राजा (२) म० से
राजा (३) बु० से ज्योतिष शास्त्र जानने वाला (४) बृ० से
धनाढ्य (५) शु० से राजा और (६) श० से नाई होता है । जो
नाई नहीं होते वे नाई सदृश काम करने वाले होते हैं ।
(vi) यदि चन्द्रमा कन्या राशि में हो और सूर्य आदि ६
ग्रहों से दृष्ट हो तो निम्नलिखित फल होता है । (१) सू० से
राजा (२) मं० से चतुर (३) बु० से राजा (४) बृ० से
सेनापति (५) शु० से चतुर (६) श० से भूमिनाथ (ज़मीन का
स्वामी) । ॥८॥
(vii) यदि चन्द्रमा तुला में हो और सूर्य आदि ग्रहों में से
किसी से दृष्ट हो तो क्रमशः निम्नलिखित फल होता है (१) सू० से
खल (दुष्ट) (२) मं० से शठ (शैतान) (३) बु० से राजा
(४) बृ० से सोने का काम करने वाला (५) शु० से व्यापारी
(६) श० से चूगल खोर ।
(viii) यदि चन्द्रमा वृश्चिक में हो तो उस पर भिन्न-भिन्न
ग्रहो की दृष्टि का निम्नलिखित फल होता है (१) सूर्य से दृष्ट
हो तो निर्धन (२) मंगल से राजा (३) बुध से दृष्ट हो तो जुड़वे
बच्चों का पिता या माता (४) वृहस्पति से दृष्ट हो तो राजा (५)
शुक्र से दृष्ट हो तो वस्त्र से आजीविका कमाने वाला (६) शनि से
हो तो विकृत अंग वाला । ॥९॥
(ix) यदि जन्म के समय चन्द्रमा धनु में हो और किसी ग्रह से
दृष्ट हो तो विविध ग्रहों की दृष्टि के अनुसार निम्नलिखित फल होता
है। (१) सू० से दृष्ट हो तो दम्भ युक्त (२) मंगल से धूर्त (३)
ब० से हो तो बहुत से आदमियों का स्वामी (४) वृहस्पति से दृष्ट

अठारहवां अध्याय : द्विग्रहयोग ३४१
हो तो राजा या बहुत से आदमियों पर हुकूमत करने वाला (५) शुक्र
से दृष्ट हो तो बहुत से आदमियों को आश्रय देने वाला और (६)
शनि से दृष्ट हो तो शठ हो ।
(x) यदि जन्म के समय चन्द्रमा मकर में हो और चन्द्रमा किसी
ग्रह से दृष्ट हो तो निम्नलिखित फल होता है। (१) सू० से दरिद्र
(२) मं० से भूप (३) बु० से नरेश (४) बृ० से भूपति (५)
शु० से बुद्धिमान् या विद्वान् और (६) शनि से धनी होता है । ॥१०॥
(xi) यदि चन्द्रमा कुम्भ राशि में हो और किसी ग्रह से दृष्ट हो
तो विविध ग्रहों से दृष्ट होने का निम्नलिखित फल हैं। (१) सू०
से लोकमान्य (२) मं० से अन्य व्यक्तियों की स्त्री में रत (३) बुध
से भूमि का स्वामी (४) बृ० से नरेन्द्र (५) शु० से वेश्याओं का
प्यारा (६) श० से राजाओं में श्रेष्ठ ।
(xii) चन्द्रमा के मीन में होने से और किसी ग्रह से दृष्ट होने से
निम्नलिखित फल होता है (१) सू० से दुष्ट कर्म करने वाला (२)
मं० से पापी (३) बु० से बुद्धिमान् (४) बृ० से राजा (५) शु०
से विद्वान् (६) श० से केवल दोषों पर दृष्टि रखने वाला । ॥११॥
चन्द्रमा के विभिन्न नवांशों में होने का और उस पर
विविध ग्रहों की दृष्टि का फल
आरक्षको वधरुचिः कुशलश्च युद्धे
भूपोऽर्थवान्कलहकृत्क्षितिजांशसंस्थे ।
मूर्खोऽन्यदारनिरतः सुकविः सितांशे
सत्काव्यकृत्सुखपरोऽन्यकलत्रगश्च ॥१२॥
बौधे हि रङ्गचरचोरकवीन्द्रमन्त्र-
गेयज्ञशिल्पनिपुणः शशिनि स्थितेऽंशे ।

३४२ फलदीपिका
स्वांशेऽल्पगात्रधनलुब्धतपस्विमुख्यः
स्त्रीप्रेष्यकृत्यनिरतश्च निरीक्ष्यमाणे ॥१३॥
सक्रोधो नरपतिसंमतो निधींशः
सिंहांशे प्रभुरसुतोऽर्तिहिंस्रकर्मा ।
जीवांशे प्रथितबलो रणोपदेष्टा
हास्यज्ञः सचिवनिकामवृद्धशीलः ॥१४॥
अल्पापत्यो दुःखितः सत्यपि स्वे
मानासक्तः कर्मणि स्वेऽनुरक्तः ।
दुष्टस्त्रीष्टः कोपनश्चार्किभागे
चन्द्रे भानौ तद्वदिन्द्रादिदृष्टे ॥१५॥
(i) यदि जन्म के समय चन्द्रमा मंगल के नवांश में हो (मेष
या वृश्चिक नवांश) और सूर्य आदि किसी ग्रह से देखा जाता हो
तो निम्नलिखित फल होता है । (१) सूर्य से रक्षा करने वाला (२) मं०
से वध में रुचि रखने वाला (३) बु० से युद्ध में कुशल (४) बृ०
से राजा (५) शु० से धनवान् (६) श० से कलह करने वाला ।
(ii) यदि चन्द्रमा वृषभ या तुला नवांश में हो और किन्हीं
ग्रहों से दृष्ट हो तो निम्नलिखित फल होता है (१) सू० से मूर्ख
(२) मं० से दूसरे की स्त्रियों में रत (३) बु० से उत्तम कवि
(४)

अठारहवां अध्याय : द्विग्रहयोग ३४३
पर काम करने वाला अर्थात् नाटक-सिनेमा आदि के कार्यों से
सम्बन्धित (२) मं० से चोर (३) बु० से कवि (४) बृ० से मंत्री
(५) शु० से गान-विद्या जानने वाला (६) श० से शिल्प
निपुण ।
(iv) यदि चन्द्रमा कर्क नवांश में हो और किसी ग्रह से दृष्ट
हो तो निम्नलिखित फल होता है । (१) सू० से छोटे शरीर वाला
(२) मं० से लोभी (३) बु० से तपस्वी (४) बृ० से मुख्य अर्थात्
श्रेष्ठ पद को प्राप्त (५) शु० से किसी स्त्री की मातहती में काम
करने वाला (६) श० से अपने कार्य में लगा हुआ । ॥१३॥
(v) यदि चन्द्रमा सिंह नवांश में हो तो विविध ग्रहों से दृष्ट
होने का फल यह है । (१) सू० से क्रोधी (२) मं० से राजा का
कृपापात्र (३) बु० से खज़ाने का स्वामी अर्थात् धनी (४) बृ० से
उच्चपदाधिकारी (५) शु० से पुत्रहीन (६) श० से क्रूर कर्म करने वाला
हिंसक ।
(vi) यदि चन्द्रमा धनु या मीन नवांश में हो तो विविध ग्रहों
से दृष्ट होने का फल निम्नलिखित होता है (१) सू० से जिसके
बल की बहुत ख्याति हो (२) रणोपदेष्टा अर्थात् रण के लिये
या सैनिकों को आदेश देने वाला (३) बु० से हास्य रस कुशल
(४) बृ० से मंत्री (५) शु० से कामवासना रहित (६) श० से
वृद्धों की तरह स्वभाव वाला । ॥१४॥
(vii) यदि चन्द्रमा मकर या कुंभ नवांश में हो तो विविध ग्रहों
से दृष्ट होने का निम्नलिखित फल होता है (१) सू० से थोड़ी
सन्तान (२) मं० से दुःखी (३) बु० से अभिमानी (क) बृ० से
अपने कर्म में अनुरक्त (५) शु० से दुष्ट स्त्री का प्यारा (६) श०
से क्रोधी ।
नोट—जैसे चन्द्रमा के विविध नवांशों में होने से और विविध

३४४ फलदीपिका
ग्रहों के दृष्ट होने से उपर्युक्त फल बताया गया है वैसा ही फल
तब भी समझना चाहिये जब सूर्य किसी नवांश में हो और किसी
ग्रह से दृष्ट हो । उदाहरण के लिये सूर्य धनु नवांश में हो और
चन्द्रमा से दृष्ट हो तो वही फल समझिये जो चन्द्रमा के धनु नवांश
में होकर सूर्य से दृष्ट होने पर होता है। या दूसरा उदाहरण
लीजिये चन्द्रमा के तुला नवांश में होकर शनि से दृष्ट होने का
फल बताया गया हैं वही सूर्य के तुला नवांश में होकर शनि दृष्ट
होने का होगा। ।।१५।।
सूर्यादितोऽत्रांशफलं प्रदिष्टं
ज्ञेयं नवांशस्य फलं तदेव ।
राशीक्षणे यत्फलमुक्तमिन्दो-
स्तद्द्वादशांशस्य फलं हि वाच्यम् ।।१६।।
ऊपर श्लोक १२ से १५ तक जो फल बताया गया है वह चन्द्रमा
के विविध नवांशों में स्थित होने का और विविध ग्रहों से दृष्ट होने
का फल है। और श्लोक ६ से ११ तक जो फलादेश बताया गया है
वह चन्द्रमा के विविध राशि में स्थित सोकर विविध ग्रहों से दृष्ट होने
का फल है। अब एक नई बात कहते हैं। मान लीजिये चन्द्रमा मेष
राशि में है और बृहस्पति से दृष्ट है । इसका जो फल है वह तब भी
होगा जब चन्द्रमा मेष द्वादशांश में हो और बृहस्पति से दृष्ट हो ।
अर्थात् राशि में स्थित होकर दृष्ट होने का जो फल वही द्वादशांश
में स्थित होकर दृष्ट होने का फल होता है। इस कारण चन्द्रमा
किस द्वादशांश में है और किस ग्रह से दृष्ट है यह देख कर इलोक ६
से ११ के आधार पर चन्द्र द्वादशांश का फल भी कहना
चाहिये । ।।१६।।

अठारहवां अध्याय : द्विग्रहयोग ३४५
वर्गोत्तमस्वपरगेषु शुभं यदुक्तं
तत्पुष्टमध्यलघुताऽशुभमुत्क्रमेण ।
वीर्यान्वितोंऽशकपतिर्निरुणद्धि पूर्वं
राशीक्षणस्य फलमंशफलं ददाति ॥१७॥
यदि चन्द्रमा वर्गोत्तम में हो तो ऊपर जो शुभ फल बताया गया
है वह अधिक मात्रा में होगा। यदि अपने नवांश में हो तो वर्गोत्तम
की अपेक्षा शुभ फल कुछ कम होगा और यदि अन्य नवांश में हो तो
शुभ फल और भी थोड़ा होगा। और यदि कोई अशुभ फल बताया
गया है और चन्द्रमा वर्गोत्तम में है तो वर्गोत्तम में होने से अशुभ फल
कम होगा। स्व नवांश में हो तो अशुभ फल साधारण होगा और
शत्रु नवांश में है तो अशुभ फल बहुत अधिक होगा। कहने का तात्पर्य
यह है कि वर्गोत्तम में होना शुभता को बढ़ाता है, अशुभता को कम
करता है और शत्रु नवांश में होना शुभता को कम करता है
अशुभता को बढ़ाता है।
अब एक दूसरी बात और कहते हैं। चन्द्रमा के दो फल बताये
हैं (१) राशि में स्थित होकर दृष्ट होने का फल (२) नवांश में
स्थित होकर दृष्ट होने का फल। अब यह कहते हैं कि यदि चन्द्रमा
जिस नवांश में है उस नवांश का स्वामी बलवान् है तो नवांश का
फल ही विशेष रूप से फलित होगा। राशि का फल उतना नहीं होगा
अर्थात् नवांश के स्वामी के बली होने से नवांश को अधिक महत्त्व देना
चाहिये। ॥१७॥

उन्नीसवाँ अध्याय
दशाफल
भक्त्या येन नवग्रहा बहुविधैराराधितास्ते चिरं
सन्तुष्टाः फलबोधहेतुमदिशन्सानुग्रहं निर्णयम् ।
ख्यातां तेन पराशरेण कथितां संगृह्य होरागमात्
सारं भूरिपरीक्षयातिफलितां वक्ष्ये महाख्यां दशाम् ॥१॥
जिन पराशर मुनि ने नव-ग्रहों की बहुत प्रकार से आराधना की
और जिनकी भक्ति से सन्तुष्ट होकर नव-ग्रहों ने उन्हें दिव्य ज्ञान
प्रदान किया कि किस ग्रह की कैसी दशा जाती है उन पराशर के
वाक्यों के फलादेश सम्बन्धी सिद्धान्तों की बारंबार परीक्षा कर
और उनकी सत्यता का अनुभव कर मैं मन्त्रेश्वर महादशा के विषय में,
पराशर ने जो कुछ कहा है उसका सार बतलाता हूँ । ॥१॥
अग्न्यादितारपतयो रविचन्द्रभौम-
सर्पामिरेड्यशनिचन्द्रजकेतुशुक्राः ।
तेने नटः सनिजया चतुधान्यसौम्य-
स्थाने नखा निगदिताः शरदस्तु तेषाम् ॥२॥
किस नक्षत्र में जन्म होने से कितने वर्ष की दशा होती है और
बाद में किस ग्रह की कितने वर्ष की दशा आती है यह नीचे के चक्र
से स्पष्ट होगा ।

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३४७

नक्षत्रनक्षत्रनक्षत्रग्रहदशावर्ष
कृत्तिकाउ० फा०उ० षा०सूर्य६
रोहिणीहस्तश्रवणचन्द्र१०
मृगशिर्चित्राधनिष्ठामंगल७
आर्द्रास्वातीशतभिषाराहु१८
पुनर्वसुविशाखापू० भा०बृहस्पति१६
पुष्यअनुराधाउ० भा०शनि१९
आश्लेषाज्येष्ठारेवतीबुध१७
मघामूलअश्विनीकेतु७
पू० फा०पू० षा०भरणीशुक्र२०