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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

१६६ फलदीपिका
लग्न तथा चन्द्रमा को पूर्ण दृष्टि से देखता है। उपर्युक्त श्लोक के
अनुसार चार ग्रह तो लग्न को पूर्ण दृष्टि से नहीं देखते किन्तु जितनी
सी मात्रा में यह योग घटित होता है—उससे कहीं अधिक उच्च पदवी
उन्होंने प्राप्त की। सूर्य तथा बृहस्पति का उच्चराशि में होना भी राज
योग में सहायक हुआ। इनका जन्म ७ मई सन् १८६१ को प्रातः ४
बजकर २ मिनट पर हुआ था।
[लग्न कुण्डली: भाव १ (मीन/१२): चं. | भाव २ (मेष/१): सू., शु., बु. | भाव ३ (वृष/२) | भाव ४ (मिथुन/३): मं., के. | भाव ५ (कर्क/४): बृ. | भाव ६ (सिंह/५) | भाव ७ (कन्या/६) | भाव ८ (तुला/७) | भाव ९ (वृश्चिक/८): श. | भाव १० (धनु/९): रा. | भाव ११ (मकर/१०) | भाव १२ (कुम्भ/११)]
[नवांश कुण्डली: भाव १ (मीन/१२): चं. | भाव २ (मेष/१) | भाव ३ (वृष/२): के. | भाव ४ (मिथुन/३): बु. | भाव ५ (कर्क/४): श. | भाव ६ (सिंह/५) | भाव ७ (कन्या/६) | भाव ८ (तुला/७): मं., शु. | भाव ९ (वृश्चिक/८): रा. | भाव १० (धनु/९) | भाव ११ (मकर/१०) | भाव १२ (कुम्भ/११): बृ.]
नवांश में बुध और शुक्र स्वनवांश में हैं।
विलग्नेशः केन्द्रे यदि तपसि वर्गोत्तमगतः
स्वतुङ्गे स्वक्षेत्रे वा गुरुपतिरपि स्याद्यदि तथा ।
गजस्कन्धे कार्तस्वरकृतविमानेऽतिसुषमे ।
सुखासीनं भूपं जनयति लसच्चामरयुगम् ॥१६॥
यदि लग्नेश १-४-७-९-१० इन भावों में से किसी में वर्गोत्तम हो
कर पड़ा हो और नवें स्थान का स्वामी अपनी स्वराशि या उच्च-
राशि में वर्गोत्तम होकर केन्द्र या नवम में हो तो अत्यन्त वैभवशाली राजा
होता है, जो हाथी के कन्धे पर रखे हुए सोने के सुन्दर विमान में चलता
है और जिसमें दोनों ओर चंवर हिलते रहते हैं । ॥१६॥

or ्र? In the image, under ग, there is a distinct loop curling to the left: ृ. But wait, is there a repha? Yes, र्गृ. Wait, could it be भृगुर्ग्रहेन्द्रै-? If a font has र्ग्र, the ्र is a diagonal stroke, not a loop. Here it has a loop. However, whether it's भृगुर्गृहेन्द्रै- or भृगुर्ग्रहेन्द्रै-, let's look closely at गृहेन्द्रै. In line 16, look at नीचार्योर्गृहमपहाय vs नीचार्योर्गुहमपहाय.

  • Wait! In line 16, look at नीचार्योर्गृहमपहाय:
    Does the letter after र्यो have a repha?
    Look at the top horizontal bar: there is a repha hook above the bar: र्!
    Wait, what's on र्यो? Just the matra ो. No dot! The speck is just noise or the top of ो.
    Under the bar: ग.
    Below ग: there is a ृ loop!
    Wait, why does नीचार्योर्गृ look so similar to भृगुर्गृ?
    Because both have र्गृ!
    In line 14: भृगुर्गृहेन्द्रै- ->

१६८ फलदीपिका
या नीच राशि नहीं होनी चाहिये) तो ऐसा व्यक्ति राजा
होता है । ॥८॥
भौमश्चेदजहरिचापलग्नसंस्थः
पृथ्वीशं कलयति मित्रखेटदृष्टः ।
कर्मेशो नवमगतश्च भाग्यनाथो
मध्यस्थो भवति नृपो जनैः प्रशस्तः ॥९॥
(क) यदि मंगल, मेष, सिंह या धनु राशि में स्थित होकर लग्न
में हो और उसको मित्र ग्रह देखता हो तो मनुष्य राजा होता है ।
(ख) यदि दशम स्थान का स्वामी नवम भाव में स्थित हो और
नवम भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति राजा होता है
और सब उसकी प्रशंसा करते हैं। तात्पर्य यह है कि यह योग प्रबल-
राजयोग कारक है । ॥९॥
चापार्द्धे भगवान् सहस्रकिरणस्तत्रैव ताराधिपो
लग्ने भानुसुतेऽतिवीर्यसहितः स्वोच्चे च भूनन्दनः ।
यद्येवं भवति क्षितेरधिपतिः संश्रुत्य दूरं भयात्
त्रस्ता एव नमन्ति तस्य रिपवो दग्धाः प्रतापाग्निना ॥१०॥
यदि धनु राशि के आधे में (पन्द्रह अंश तक) सूर्य हो और वहीं
चन्द्रमा हो और लग्न में शनि* हो तथा अति बलवान् मंगल उच्च

  • मन्मेश्वर महाराज ने यहां नहीं लिखा है किन्तु अन्य आचार्यों
    के मत से तुला धनु मकर कुम्भ और मीन इन पांच राशियों में लग्नस्थ
    शनिश्चर को प्रशस्त माना गया है ।

सातवाँ अध्याय : राजयोग १६९
राशि में हो तो जातक बड़ा पराक्रमी राजा होता है उसके भय से उसके
शत्रु उसे दूर से ही नमस्कार करते हैं ॥१०॥
सुधामृणालोपमविम्बशोभितः शशी नवांशे नलिनीप्रियस्य
यदि क्षितीशो बहुहस्तिपूर्णः शुभाश्च केन्द्रेषु न पापयुक्ताः ॥११॥
यदि अमृत या मृणाल के समान सफेद पूर्ण विम्ब वाला (पूर्णिमा
के आस पास का) चन्द्र सिंह नवांश में हो और शुभ ग्रह (पाप ग्रहों
से संयुत नहीं होने चाहिये) केन्द्र में हों तो ऐसा जातक राजा होता है
और उसके बहुत से हाथी होते हैं ॥११॥
नीचारिवर्गरहितैर्विहगैस्त्रिभिस्तु
स्वांशोपगैर्बलयुतैः शुभदृष्टिजुष्टैः ।
गोक्षीरशङ्खधवलोमृगलाञ्छनश्च
स्याद्यस्य जन्मनि स भूमिपतिर्जितारिः ॥१२॥
यदि चन्द्रमा गाय के दूध या शंख के समान उज्ज्वल कान्ति वाला
हो (पक्ष बली हो) और तीन और ग्रह (चन्द्रमा मिलाकर चार)
बलवान् होकर अपने-अपने अंशो में हो। नीच राशि या नीच वर्ग में
न हों, शत्रु राशि या शत्रु वर्ग में न हों और उनको शुभ ग्रह देखते
हों तो ऐसा व्यक्ति भूमिपति होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त
करता है। ॥१२॥*
कुमुदगहनबन्धुं श्रेष्ठमंशं प्रपन्नं
यदि बलसमुपेतः पश्यति व्योमचारी ।
उदयभवनसंस्थः पापसंज्ञो न चैवं
भवति मनुजनाथः सार्वभौमः सुदेहः ॥१३॥

  • कुछ लोगों के मत से चन्द्रमा लग्न में होना चाहिये ।

१७० फलदीपिका
यदि लग्न में कोई पाप ग्रह न हो, और चन्द्रमा श्रेष्ठ* अंश में हो
और चन्द्रमा को बलवान् ग्रह देखता हो तो जातक सुन्दर शरीर वाला,
सर्व भूमि पर अधिकार वाला राजा होता है ॥१३॥
जीवो बुधो भृगुसुतोऽथ निशाकरो वा
धर्मे विशुद्धतनवः स्फूटरश्मिजालाः ।
मित्रैर्निरीक्षितयुता यदि सूतिकाले
कुर्वन्ति देवसदृशं नृपतिं महान्तम् ॥१४॥
बृहस्पति, बुध, शुक्र या चन्द्रमा--अस्त न हों और विशुद्ध शरीर
वाले होकर नवम भाव में बैठे हों (मूल श्लोक में धर्मे शब्द आया
है। नवम भाव से धर्म का विचार किया जाता है इसलिये धर्म स्थान
का अर्थ हुआ लग्न से नवम स्थान) और मित्र ग्रहों से युत या
वीक्षित हों तो जातक महान् राजा होता है। और उसकी प्रजा उसे
देवता के सदृश मानती है। मूल श्लोक में विशुद्धतनु शब्द आया है
इसका शब्दार्थ हुआ विशुद्ध शरीर वाला। ग्रह को विशुद्ध शरीर वाला
कब और कैसे समझा जाय ? जब वह पाप ग्रह या शत्रु की राशि
या नवांश में न हो और पाप ग्रहों से युत या वीक्षित न हो, उच्च
राशि, नवांश आदि में स्थित ग्रह—उस पर शुभ दृष्टि होने से
विशुद्धतनु कहेंगे। जिस ग्रह पिंड में दोष न हो वह विशुद्ध हुआ।
जिन कारणों से ग्रह निकृष्ट समझा जाय, वे उसके दोष समझे
जाते हैं ॥१४॥

  • श्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने श्रेष्ठ अंश का अर्थ किया है—उत्तम
    वर्ग। कोई ग्रह तीन अधि मित्र वर्गों में हो तो उसे उत्तम वर्ग कहते
    हैं। परन्तु मान्य ज्योतिषियों का सम्प्रदाय यह है कि स्व राशि,
    स्वद्रेष्काण, स्वनवांश होने पर ही उत्तम वर्ग होता है।

सातवाँ अध्याय : राजयोग १७१
शुक्रेज्यौ सवितुः शिशुस्तिमियुगे स्वोच्चे च पूर्णः शशी
दृष्टस्तीव्रविलोचनेन दिनकृन्मेषोदयेऽसौ नृपः ।
सेनायाश्चलनेन रेणुपटलैर्यस्य प्रविष्टे रवा-
वस्तभ्रान्तिसमाकुला कमलिनी संकोचमागच्छति ॥१५॥
शुक्र, बृहस्पति और शनि मीन राशि में हों, चन्द्रमा पूर्ण हो (पूर्णिमा
का) और अपनी उच्च राशि में हो, सूर्य को मंगल देखता हो और
मेष लग्न हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत बड़ा राजा होता है। जिसकी
सेना के चलने के कारण इतनी धूल उड़ती है कि दिन में भी संध्या
की भ्रान्ति होने से कमलिनी संकोच को प्राप्त हो जाती है। ॥१५॥
नीचारिस्थैर्भवभवनगैः षष्ठदुश्चिक्यगैर्वा ।
सौम्यैः स्वोच्चं परममुपगतैर्निर्मलैः केन्द्रगैर्वा ।
आज्ञां याते शिशिरकिरणे कर्कटस्थे निशाया-
मेकच्छत्रं त्रिभुवनमिदं यस्य स क्षत्रियेश

१७२ फलदीपिका
यदि पूर्णिमा का चन्द्र वर्गोत्तमांश में हो तो केवल एक इसी योग
से मनुष्य महा प्रतापशाली राजा होता है, जिसकी सेना के घोड़ों के
खुरों से उड़ी हुई धूलि सूर्य को ऐसा म्लान कर देती है कि सूर्य प्रातः
कालीन चन्द्र सा नज़र आता है।
केन्द्रगौ यदि च जीवशशाङ्कौ
यस्य जन्मनि च भार्गवदृष्टौ ।
भूपतिर्भवति सोऽतुलकीर्ति
र्नीचगो यदि न कश्चिदिह स्यात् ॥१८॥
यदि जन्म के समय बृहस्पति और चन्द्रमा केन्द्र में हों और उनको
शुक्र देखता हो और कोई ग्रह नीच राशि में न हो तो मनुष्य अतुलकीर्ति
वाला राजा होता है । ॥१८॥
जलचरराशिनवांशक इन्दुस्तनुभवने शुभदस्वकवर्गे ।
अशुभकरः खलु कण्टकहीनो भवति नृपो बहुवारणनाथः॥१९॥
यदि चन्द्रमा जलचर राशि और नवांश में स्थित होकर लग्न
में अपने वर्ग में या शुभ ग्रह के वर्ग में हो और कोई पाप ग्रह केन्द्र
में न हो तो मनुष्य राजा होता है और बहुत हाथी उसके पास होते
हैं । ॥१९॥
शुक्लो जीवनिरीक्षितो वितनुते भूपोद्भवं भूपति
देवेड्यो मृगभं विहाय तनुगो मत्तेभयुक्तं नृपम् ।
केन्द्रे जन्मपतिर्बलाधिकयुतः कुर्याद्धरित्रीपतिं
दृष्टे वाक्पतिना बुधे दधति पृथ्वीशाश्च तच्छासनम् ॥२०॥

सातवाँ अध्याय : राजयोग १७३
इस श्लोक में चार योग बताए हैं । चारों पृथक्-पृथक् हैं(क) यदि
जातक राजवंश में उत्पन्न हुआ हो और शुक्र को बृहस्पति देखता हो
तो मनुष्य राजा होता है। (ख) यदि मकर राशि के अलावा अन्य
किसी राशि में स्थित होकर बृहस्पति लग्नं में हो तो यह उत्तम
राजयोग है। (ग) यदि लग्नेश* बलवान् होकर केन्द्र में हो तो
यह अकेला प्रबल योग है (घ) जिसकी जन्म कुण्डली में बुध को
बृहस्पति देखता है उसकी सलाह को महाराजा भी मानते हैं । ॥२०॥
एकोप्युच्चक्षेत्रगो मित्रदृष्टः
कुर्याद्भूपं मित्रयोगाद्धनाढ्यम् ।
स्वांशे सूर्ये स्वक्षं गश्चन्द्रमा-
श्चेद्देशाधीशं साश्वनागं विधत्ते ॥२१॥
(क) यदि एक भी ग्रह उच्च राशि में हो और उसको मित्र ग्रह
देखते हों तो ऐसा व्यक्ति राजा होता है। यदि ऐसा उच्च ग्रह मित्र
ग्रह से युक्त हो तो मनुष्य धनवान होता है।
(ख) यदि सूर्य अपने नवांश में हो और चन्द्रमा कर्क राशि में
हो तो भी उत्तम राजयोग है। यद्यपि मूल श्लोक में सूर्य का अपने
अंश में होना और चन्द्रमा का अपनी राशि में होना ये दो ही बात
कही गई हैं किन्तु सूर्य की राशि भी बलवान् होनी चाहिये और
चन्द्रमा का नवांश भी बलवान् होना चाहिये । ऐसा हम अपने विचार
से समझते हैं। सूर्य और चन्द्रमा इन दो ग्रहों के बलवान् होने से
सारी कुण्डली सुधर जाती है ॥ २१ ॥
*मूल श्लोक में शब्द आया है जन्मपति, इसका बहुत से अर्थ करते
हैं जन्म लग्नेश और बहुत से अर्थ करते हैं जन्म राशि का स्वामी ।

१७४ फलदीपिका
मीने पूर्णज्योतिषि मित्रग्रहदृष्टे चन्द्रे
लोकानन्दकरः स्यान्नृपमुख्यः ।
पूर्णज्योतिः स्वोच्चगतश्चेत्तुहिनांशु-
स्त्यागाधिक्यं सज्जनशस्तं जगदीशम् ॥
(क) यदि चन्द्रमा पूर्ण प्रकाशमान होकर मीन राशि में हो और
इसको मित्र ग्रह देखता हो तो उत्तम राज योग है ।
(ख) यदि चन्द्रमा पूर्ण हो और अपनी उच्चराशि में हो तो ऐसा
व्यक्ति बहुत उदार होता है और उसकी सज्जन लोग बहुत प्रशंसा
करते हैं; वह एक उत्तम राज योग है । ॥२२॥
चन्द्रेऽधिमित्रांशगते सुदृष्टे शुक्रेण लक्ष्मीसहितो नृपः स्यात्
तथा स्थिते वासवमन्त्रिदृष्टे पूर्णां धरित्रीं परिपालयेत्सः ॥२३॥
(क) यदि चन्द्रमा अपने अधिमित्र के अंश में हो और उस पर
शुक्र की दृष्टि हो तो लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ उत्तम राज योग
होता है ।
(ख) ऊपर (क) में जो योग बताया गया है उसके साथ-साथ
यदि चन्द्रमा पर बृहस्पति की भी दृष्टि हो तो राजा हो।* ॥२३॥
*वराहमिहिर के मत से यदि दिन में जन्म हो और अपने या
अधिमित्र अंश में स्थित चन्द्रमा पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो राजयोग
होता है और यदि रात्रि में जन्म हो और अपने या अधिमित्र अंश में
स्थित चन्द्रमा पर शुक्र की दृष्टि हो तो विशेष वैभव होता है।

सातवाँ अध्याय : राजयोग १७५
पापास्त्रिशत्रुभवगा यदि जन्मनाथा-
ल्लग्नाद्धने कुजबुधौ हिबुकेऽर्कशुक्रौ ।
कर्मायलग्नसहिताः कुजमन्दजीवा-
स्तज्ज्ञा वदन्ति चतुरस्त्विह राजयोगान् ॥२४॥
(क) इस श्लोक में चार राज योग बताये गये हैं। यदि जन्म
नाथ से ३, ६ और ११वें स्थान में पाप ग्रह हों।
(ख) मंगल और बुध लग्न से दूसरे स्थान में हों
(ग) सूर्य और शुक्र लग्न से चौथे हों ।
(घ) मंगल, बृहस्पति और शनि क्रमशः दशम में, लग्न में और
एकादश में हों तो यह उत्तम राजयोग होते हैं । मूल श्लोक के प्रथम
चरण में जन्मनाथ शब्द आया है अर्थात् जन्म नाथ से । बहुत से लोग
इसका अर्थ लग्नेश करते हैं और बहुत से लोगों के मतानुसार
जन्मनाथ का अर्थ होता है—जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि
में हो उसका स्वामी । हमारे विचार से द्वितीय अर्थ विशेष
उपयुक्त हैं ।
इस श्लोक का तृतीय चरण है “कर्मायलग्न सहिताः कुजमन्दजीवाः”
इसका अर्थ हुआ दशम, एकादश और लग्न में मंगल, शनि, बृहस्पति
हों। यद्यपि मूल श्लोक में क्रमशः यह शब्द नहीं है। परन्तु हमारे
विचार से मंगल दशम में दिग्बली होता है। बृहस्पति लग्न में दिग्बली
होता है और शनि लाभ स्थान में प्रशस्त माना जाता है । इस कारण
१०, ११ और १ में क्रमशः मंगल, शनि और बृहस्पति हों यह अर्थ
विशेष उत्तम होगा । ॥२४॥
लाभेशधर्मेशधनेश्वराणामेकोऽपि चन्द्रग्रहकेन्द्रवर्ती ।
स्वपुत्रलाभाधिपतिर्गुरुश्चेदखण्डसाम्राज्यपतित्वमेति ॥२५॥

१७६ फलदीपिका
यदि (क) द्वितीय, नवम और एकादश इन तीनों के स्वामियों
में से एक भी ग्रह चन्द्रमा से केन्द्र में हो और (ख) द्वितीय, पञ्चम
और एकादश इनमें से किसी का मालिक बृहस्पति हो—यह दोनों बातें
घटित होती हों तो उत्तम राजयोग होता है। ॥२५॥
नीचभंग राजयोग
नीचस्थितो जन्मनि यो ग्रहः स्यात्तद्राशिनाथोऽपि तदुच्चनाथः ।
स चन्द्रलग्नाद्यदि केन्द्रवर्ती राजा भवेद्धार्मिकचक्रवर्ती ॥२६॥
जन्म कुण्डली में किसी ग्रह का नीच राशि में स्थित होना ख़राब
योग माना गया है। किन्तु कभी-कभी ग्रह नीच राशि में स्थित
होकर भी बहुत उत्तम प्रभाव दिखाते हैं अर्थात् उनके नीच होने का
जो दोष है वह भंग हो जाता है--और वह फ़ायदेमन्द साबित होते
हैं। ऐसा कब होता है ? यह नीचे के पांच श्लोकों में बताया
गया है।
यदि किसी के जन्म के समय कोई ग्रह नीच राशि में
पड़ा हो और (क) इस नीच राशि का स्वामी चन्द्रमा से केन्द्र में हो
और (ख) जो ग्रह नीच है और उसका उच्चनाथ भी चन्द्रमा से केन्द्र
में हो तो नीच भंग हो जाता है बल्कि उत्तम राज योग बनाता है।
यह समस्त एक योग है। उच्चनाथ शब्द का क्या अर्थ ? इसके अर्थ
में मतभेद है; मान लीजिये शनि मेष राशि का नीच का है। इसका
उच्चनाथ कौन हुआ ? एक मत तो यह कि शनि तुला राशि का
उच्च का होता है और तुला का स्वामी शुक्र होता है इस कारण
उच्चनाथ शुक्र हुआ। दूसरा मत यह है कि शनि मेष राशि में है
और मेष में सूर्य उच्च का होता है इस कारण उच्चनाथ सूर्य हुआ।
हमारे विचार से पहला अर्थ विशेष उपयुक्त है। सूर्य का उच्चनाथ
मंगल, चन्द्रमा का उच्चनाथ शुक्र, बुध का उच्चनाथ बुध, बृहस्पति

सातवाँ अध्याय : राजयोग १७७
का उच्चनाथ चन्द्रमा, शुक्र का उच्चनाथ बृहस्पति और शनि का
उच्चनाथ शुक्र जैसा ऊपर समझाया गया है।
ऊपर नीचभंग होने के लिये (क) और (ख) दो शर्तें बताई गई
हैं। जब दोनों ही पूरी होंगी तब ही नीच भंग होगा। अब नीच भंग
का एक अन्य योग बताते हैं। ॥२६॥
एक टीकाकार इस श्लोक का अय करते हैं कि (i) जो ग्रह
नीच राशि में हो उसका स्वामी लग्न से केन्द्र में हों या (ii) जो
नीच राशि में ग्रह है उसका स्वामी चन्द्रमा से केन्द्र में हो (iii)
या जो ग्रह नीच राशि में है उसका उच्चनाथ लग्न से केन्द्र में हो या
(iv) जो ग्रह नीच राशि में है उसका उच्चनाथ चन्द्रमा से केन्द्र में
हो—इन चारों परिस्थितियों में नीच भंग हो जावेगा। परन्तु हम इस
अर्थ से सहमत नहीं हैं क्योंकि मूल संस्कृत श्लोक में 'अपि' शब्द
आया है जिस का अर्थ है कि जो ग्रह नीच राशि में है उसका स्वामी
और उसका उच्चनाथ भी-अर्थात् दोनों, केवल एक नहीं।
इसी प्रकार मूल श्लोक में लिखा है 'चन्द्रलग्नात्' जिसका श्री सुब्रह्मण्य
शास्त्री ने अर्थ किया है 'चन्द्रमा से या लग्न से' परन्तु यदि दोनों से
अभिप्राय होता तो मूल संस्कृत में 'चन्द्रलग्नात्' यह पञ्चमी का एक
वचन नहीं आता। चन्द्र लग्नात् का अर्थ है चन्द्रलग्न से अर्थात् चन्द्रमा
जिस राशि में है उससे। यदि इस श्लोक में दी गई चार शर्तों को
अलग-अलग चार योग मान लेंगे तब तो प्रायः सभी नीच ग्रहों का
भंग हो जावेगा क्योंकि जो ग्रह नीच राशि का है उसका स्वामी यदि
लग्न से केन्द्र में हो (चार घर इसके अन्तर्गत आ गये) या चन्द्रमा
से केन्द्र में हो (चार घर इस परिभाषा में आ गये) या उच्चनाथ लग्न
से केन्द्र में हो (चार घर इसमें आ गये) या चन्द्र से केन्द्र में हो
(चार घर इसमें आ गये) इस प्रकार १६ निर्दिष्ट स्थानों में से कहीं
न कहीं आ जावेगा ही। परन्तु आगे २९वें श्लोक में यही कहा है।

१७८ फलदीपिका
एक टीकाकार यह भी अर्थ करते हैं कि यदि कोई ग्रह नीच राशि
में हो और उस नीच राशि का स्वामी या उस नीच ग्रह का उच्चनाथ
उस नीच ग्रह से केन्द्र में हो तो नीच भंग राजयोग होता है।
यद्येको नीचगतस्तद्राश्यधिपस्तदुच्चपः केन्द्रे ।
यस्य स तु चक्रवर्ती समस्तभूपालवन्द्यांघ्रिः ॥२७॥
यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो तो (क) उस नीच राशि का
स्वामी और जो ग्रह नीच का है उसका उच्चनाथ यदि दोनों परस्पर
केन्द्र में हों तो नीच भंग राजयोग होता है। यहां भी उच्चनाथ के
दो अर्थ हो सकते हैं परन्तु हम यही अर्थ लेंगे कि नीच ग्रह जिस
राशि में उच्च होता है उस राशि का स्वामी उच्चप या उच्चनाथ
कहलावेगा ॥२७॥
यस्मिन्त्राशौ वर्तते खेचरस्तद्राशीशेन प्रेक्षितश्चेत्स खेटः ।
क्षोणीपालं कीर्तिमन्तं विदध्यात् सुस्थानश्चेत्किंपुनः पार्थिवेन्द्रः ॥
एक अन्य नीच भग राजयोग बताते हैं। जिस राशि में नीच ग्रह
हो उस राशि का स्वामी यदि नीच ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखता हो
तो नीच भंग राज योग होता है। यदि यह नीच ग्रह ६-८-१२
दुःस्थान में हो तो इतना अच्छा राजयोग नहीं होगा किन्तु यदि सुस्थान
में हो तो बहुत उत्तम नीचभंग राजयोग बनता है ॥२८॥
*श्लोक २७ का एक अन्य अर्थ भी हो सकता है। वह यह है कि
यदि कोई ग्रह नीच हो तो उस नीच राशि के स्वामी का जो उच्चनाथ
है वह उच्चनाथ यदि केन्द्र में हो तो नीच भंग राजयोग होता है,
उदाहरण के लिये किसी की कुण्डली में सूर्य नीच राशि का है,
तुलाराशि नाथ शुक्र है। शुक्र उच्च होता है मीन में। मीन का स्वामी
हुआ बृहस्पति, यह बृहस्पति यदि केन्द्र में हो तो नीच भंग राज योग
हुआ।

सातवां अध्याय : राजयोग १७९
नीचे तिष्ठति यस्तदाश्रितगृहाधीशो विलग्नाद्यदा
चन्द्राद्वा यदि नीचगस्य विहगस्योच्चर्क्षनाथोऽथवा ।
केन्द्रे तिष्ठति चेत्प्रपूर्णविभवः स्याच्चक्रवर्ती नृपो
धर्मिष्ठोऽन्यमहीशवन्दितपदस्तेजोयशोभाग्यवान् ॥२९॥
यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो तो (क) इस नीच राशि का
स्वामी अथवा (ख) नीच ग्रह का उच्चनाथ इन दोनों में से एक भी
जन्म लग्न या चन्द्र लग्न से केन्द्र में हो तो नीचभंग राजयोग होता
है । ॥ २९ ॥
नीचे यस्तस्य नीचोच्चभेशौ द्वावेक एव वा
केन्द्रस्थश्चेच्चक्रवर्ती भूपः स्याद्भूपवन्दितः ॥३०॥
यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो और उस नीच राशि का स्वामी
और नीच ग्रह जिस राशि में उच्च होता है उसका स्वामी वह—
एक या दोनों लग्न से केन्द्र में हों तो नीचभंग राज योग होता है ।
नोट : —श्लोक २६ से ३० तक नीच भंग राजयोग दिए गये
हैं इनमें कइयों में पुनरावृत्ति है ।

आठवाँ अध्याय
भावाश्रय फल
इस अध्याय में सूर्य आदि ग्रहों के भाव फल बताये गये हैं।
लग्नेऽर्केऽल्पकचः क्रियालसतमः क्रोधी प्रचण्डोन्नतो
मानी लोचनरूक्षकः कृशतनुः शूरोऽक्षमो निर्घृणः।
स्फोटाक्षः शशिभे क्रिये सतिमिरः सिंहे निशान्धः पुमान्
दारिद्र्योपहतो विनष्टतनयो जातस्तुलायां भवेत् ॥१॥
विगतविद्याविनयवित्तं स्खलितवाचं धनगतः
सबलशौर्यश्रियमुदारं स्वजनशत्रुं सहजगः ।
जनयतीमं सुहृदि सूर्यो विसुखबन्धुक्षितिसुहृद्
भवनमुक्तं नृपतिसेवा जनकसंपद्व्ययकरम् ॥२॥
सुखधनायुस्तनयहीनं सुमतिमात्मन्यटविगं
प्रथितमुर्वीपतिमरिस्थः सुगुणसंपद्विजयगम् ।
नृपविरुद्धं कुतनुमस्तेऽध्वगमदारं ह्यवमतं
हतधनायुः सुहृदमर्को विगतदृष्टिं निधनगः ॥३॥
विजनकोऽर्के ससुतबन्धुस्तपसि देवद्विजमनाः
ससुतयानस्तुतिमतिश्रोबलयशाः खे क्षितिपतिः ।
भवगतेऽर्के बहुधनायुर्विगतशोको जनपतिः
पितुरमित्रं विकलनेत्रो विधनपुत्रो व्ययगते ॥४॥

आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १८१
यदि जन्म के समय सूर्य लग्न में हो तो जातक बहुत थोड़े केश
वाला, कार्य करने में आलसी, क्रोधी, प्रचण्ड, लम्बा, मानी (घमण्डी)
शूर, क्रूर, क्षमा न करने वाला होगा । उसके नेत्र रूखे होंगे । यदि जन्म
लग्न कर्क हो और उसमें सूर्य हो तो मनुष्य स्फोटाक्ष होता है—यदि
मेष में स्थित सूर्य लग्न में हो तो भी उसे नेत्र रोग होता है (तिमिर
रोग) यदि सिंह राशि का सूर्य लग्न में हो तो उसे रात्रि में नहीं
दीखता । यदि तुला राशि का सूर्य लग्न में हो तो बहुत अनिष्ट फल
होते हैं । मनुष्य दरिद्री रहता है और उसके पुत्र नष्ट हो जाते
हैं । ॥१॥
यदि सूर्य द्वितीय में हो तो मनुष्य विद्या, विनय, और धन से
हीन होता है; उसकी वाणी में भी दोष होता है । हकलाना या
इसी प्रकार का दोष हो । यदि सूर्य तृतीय में हो तो मनुष्य बलवान्
शूरवीर,, धनी और उदार होता है, किन्तु अपने (सम्बन्धी) लोगों
से शत्रुता रखता है । यदि चौथे स्थान में सूर्य हो तो सुख हीन, बन्धु-
हीन, मित्रहीन और भूमिहीन हो । मकान हीन भी हो । चतुर्थ से इन
सब बातों का विचार किया जाता है और क्रूर ग्रह के बैठने का यह
फल है । ऐसा व्यक्ति अपने पिता से पाई हुई जायदाद या सम्पत्ति
को व्यय कर देता है । और राजा (सरकार) की सेवा करता है ॥ २ ॥
अगर सूर्य पंचम में हो तो सुख हीन, धन हीन, आयु हीन और
सुत हीन हो । यह हमारा बहुत बार का देखा हुआ अनुभव है कि
पंचम भाव का सूर्य जेष्ठ पुत्र का नाश करता है । किन्तु जातक बुद्धिमान्
होता है और जंगल में घूमने का शौकीन होता है । यदि षष्ठ स्थान में
सूर्य हो तो मनुष्य राजा के समान श्रेष्ठ वैभव वाला, प्रसिद्ध, धनी,

  • स्फोट का अर्थ होता हैं कोई व्रण, घाव, फोड़ा या नेत्रों का
    फूलना कोई फूला आदि । कहने का तात्पर्य यह है कि लग्न में मेष,
    कर्क, और सिंह का सूर्य नेत्र रोग देता है ।

१८२ फलदीपिका
विजयी और गुणवान् होता है । यदि सूर्य सप्तम में हो तो कुतन
(ख़राब शरीर वाला—शरीर में कोई विकार हो) ऐसा व्यक्ति राज
विरुद्ध कार्य करता है अर्थात् सरकार का विरोध करता है । ऐसा
मनुष्य व्यर्थ घूमता है और अपमान को प्राप्त होता है । सप्तम में
सूर्य स्त्री सुख को भी नष्ट करता है । यदि अष्टम में सूर्य हो तो धन
नष्ट हो, आयु नष्ट हो (अल्पायु हो) उसके मित्र नष्ट हों (मित्र न
रहें) और विगत दृष्टि हो अर्थात् नेत्रों की ज्योति मन्द पड़ जावे ।
हमने सैकड़ों कुण्डलियों में देखा है अष्टम का सूर्य दक्षिण* नेत्र को
बहुत बिगाड़ता है ॥ ३ ॥
यदि सूर्य नवम भाव में हो तो पिता से हीन हो अर्थात् कम उम्र
में ही पिता का सुख न रहे । दक्षिण भारत में नवम भाव से पिता का
विचार किया जाता है । इस कारण सूर्य का नवम भाव स्थित होने
का पितृ कष्ट फल लिखा है । नवम में सूर्य सन्तान सुख और बन्धु
सुख देता है । ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण और देवताओं का आदर करता
है । यदि दशम में सूर्य हो तो जातक को सन्तान सुख, सवारियों का सुख
हो । ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान्, लक्ष्मीवान्, बलवान् और यशस्वी होता है ।
लोग उसकी प्रशंसा करते हैं और वह राजा के समान वैभवशाली
होता है । यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो मनुष्य धनी और दीर्घायु
हो; ऐसे व्यक्ति को शोक नहीं होता अर्थात् वह सुखी रहता है । और
बहुत से आदमियों के ऊपर हुकूमत करता है । यदि बारहवें घर में
सूर्य हो तो अपने पिता से शत्रुता करे । ऐसा जातक नेत्र रोग से युक्त
होता है । हमारे विचार से बाएँ नेत्र में विशेष कमजोरी होनी
चाहिए । ऐसा जातक धनहीन , पुत्रहीन भी होता है ॥ ४ ॥
सिते चन्द्रे लग्ने दृढतनुरदभ्रायुरभयो
बलिष्ठो लक्ष्मीवान् भवति विपरीतं क्षयगते ।

  • दक्षिण = दाहिना

आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १८३
धनाढ्योऽन्तर्वाणिविषयसुखवान् वाचि विकलः
सहोत्थे सभ्रातृप्रमदबलशौर्योऽतिकृपणः ॥५॥
सुखी भोगी त्यागी सुहृदि ससुहृद्वाहनयशाः
सुपुत्रो मेधावी मृदुगतिरमात्यः सुतगते ।
क्षतेऽल्पायुश्चन्द्रेऽमतिरुदररोगी परिभवी
स्मरे दृष्टेः सौम्यो वरयुवतिकान्तोऽतिसुभगः ॥६॥
मृतौ रोग्यल्पायुस्तपसि शुभधर्मात्मसुतवान्
जयी सिद्धारम्भो नभसि शुभकृत्सत्प्रियकरः ।
मनस्वी बह्वायुर्धनतनयभृत्यैः सह भवे
व्यये द्वेष्यो दुःखी शशिनि परिभूतोऽलसतमः ॥७॥
यदि शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा लग्न में हो तो मनुष्य निर्भय, दृढ़
शरीर वाला, बलिष्ठ, लक्ष्मीवान् और दीर्घायु होता है। किन्तु यदि
कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा हो तो इसका विपरीत फल समझना चाहिये*।
यदि चन्द्रमा धन स्थान में हो तो मनुष्य मृदु वचन बोलने वाला, विषय
सुखवान् (सांसारिक विषयों में सुख उठाने वाला) और धनाढ्य होता
है। किन्तु उसकी वाणी में कुछ विकलता होती हैं। यदि तृतीय भाव
में चन्द्रमा हो तो भाइयों का सुख हो; ऐसा व्यक्ति मदयुक्त, बली और
शूर किन्तु अत्यन्त कृपण होता है ॥ ५ ॥

  • शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होता है इस
    कारण इसका शुभ फल दिया है किन्तु यदि चन्द्रमा क्षय को प्राप्त हो
    तो इसका दुष्ट फल होता है।

१८४ फलदीपिका
यदि चतुर्थ भाव में चन्द्रमा हो तो जातक सुखी, भोगी, त्यागी,
अच्छे मित्रों वाला, सवारी के सुख को प्राप्त और यशस्वी होता हैं।
यदि पंचम में चन्द्रमा हो तो मृदु गति* वाला, मेधावी (बुद्धिमान्)
और अच्छे पुत्र वाला हो। ऐसा व्यक्ति राजा का मन्त्री होता है । यदि
छठे में चन्द्रमा हो तो मनुष्य अल्पायु, बुद्धि हीन और उदर रोगी
हो और परिभव (अपमान या हार) को प्राप्त हो । यदि सप्तम
स्थान में चन्द्रमा हो तो स्वयं सौम्य और सुन्दर हो और श्रेष्ठ पत्नी
का प्यारा हो (अर्थात् उसकी पत्नी भी बहुत सुन्दर हो और पति-पत्नी
में प्रेम भी हो)।
यदि अष्टम में चन्द्रमा हो तो जातक रोगी और अल्पायु होता है
चन्द्रमा नवम में हो तो जातक शुभ धर्मा (शुभ धार्मिक आचरण करने
वाला) होगा और उसके पुत्र भी होंगे। यदि दशम में चन्द्रमा हो तो
ऐसा जातक विजयी होता है; जिस काम में वह हाथ लगाता है
उसमें प्रारम्भ में ही सफलता हो जाती है। ऐसा व्यक्ति शुभ कर्म
करने वाला और सज्जनों के साथ उपकार करने वाला होता है । यदि
चन्द्रमा ग्यारहवें भाव में हो तो मनुष्य मनस्वी, दीर्घायु, धनवान्,
पुत्रवान्, होता है । और उसे नौकर का भी सुख प्राप्त होता है । व्यय
भावगत चन्द्रमा का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति आलसी, अपमानित,
दुःखी होता है और उससे अन्य द्वेष करते हैं।
क्षततनुरतिक्रूरोऽल्पायुस्तनौ घनसाहसी
वचसि विमुखो निर्विद्यार्थः कुजे कुजनाश्रितः ।
सुगुणधनवाञ्छूरोऽधृष्यः सुखी व्यनुजोऽनुजे
सुहृदि विसुहृन्मातृक्षोणीसुखालयवाहनः ॥८॥

  • गति से अभिप्राय पैदल चलने का है ।
    ** हमारे विचार से अन्य राजयोग होंगे तभी राज मन्त्री होगा ।

आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १८५
विसुखतनयोऽनर्थप्रायः सुते पिशुनोऽल्पधीः
प्रबलमदनः श्रीमान् ख्यातो रिपौ विजयी नृपः ।
अनुचितकरो रोगार्तोऽस्तेऽध्वगो मृतदारवान्
कुतनुरधनोऽल्पायुश्छिद्रे कुजे जननिन्दितः ॥९॥
नृपसुहृदपि द्वेष्योऽतातः शुभ जनघातको
नभसि नृपतिः क्रूरो दाता प्रधानजनस्तुतः ।
धनसुखयुतोऽशोकः शूरो भवे सुशीलः कुजे
नयनविकृतः क्रूरोऽदारो व्यये पिशुनोऽधमः ॥१०॥
अब मंगल का द्वादश भाव फल बताते हैं। यदि लग्न में मंगल
हो तो अति क्रूर और अति साहसी हो । किन्तु ऐसा व्यक्ति अल्पायु होता
है और उसके शरीर में चोट लगती है। यदि द्वितीय भाव में मंगल हो तो
या तो चेहरा अच्छा न हो या बोलने में प्रवीण न हो । विद्याहीन, धनहीन
हो और कुजन (कुत्सित) आदमियों की नौकरी में रहे । तृतीय में मंगल
हो तो गुणवान्, धनवान् सुखी और शूर हो; ऐसे आदमी को दूसरा न
दबा सके किन्तु तृतीय में मंगल वाले को छोटे भाइयों का सुख नहीं
होता । यदि चतुर्थ में मंगल हो तो मनुष्य मातृ हीन, मित्रहीन, सुख
हीन, वाहन हीन, और भूमि हीन हो । कहने का तात्पर्य यह है कि
चतुर्थ भाव से जिन-जिन बातों का विचार किया जाता है उन सबके सुख
में कमी करे ।
यदि पंचम में मंगल हो तो सन्तान का सुख न हो; उसके भाग्य में
बहुत से अनर्थ (खराबी की बातें) होते रहें । ऐसा व्यक्ति बहुत
बुद्धिमान् नहीं होता और चुगल खोर होता है । छठे में मंगल हो तो
मनुष्य लक्ष्मीवान्, विख्यात, शत्रुओं को जीतने वाला राजा के समान
ऐश्वर्य शाली होता है । छठे में मंगल होने से “प्रबलमदनः” विशेष कामी
हो । यदि सप्तम में मंगल हो तो अनुचित कर्म करने वाला, रोग से