फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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(ङ) शुक्र जिस नक्षत्र में हो उससे उलटा गिनने से पाँचवां
नक्षत्र ।
(च) बुध जिसमें हो उससे उलटा गिनने से सातवां नक्षत्र ।
(छ) राहु जिसमें हो उससे उलटा गिनने से नवाँ नक्षत्र ।,और
(ज) चन्द्रमा जिसमें हो उससे उलटा गिनने से बाईसवां नक्षत्र
पृष्ठलत्ता कहलाती हैं ।
जैसे, उलटा गिनने से अभिप्राय यह है कि अश्विनी में शुक्र हो
तो शतभिषा में शुक्र की लत्ता हुई ।
यदि जन्म नक्षत्र पर लत्ता पड़े तो व्यथा होती है ॥४४॥
यदि सूर्य की लत्ता हो तो सब प्रकार की अर्थ हानि । राहु या
केतु की लत्ता हो तो दुःख । बृहस्पति की लत्ता में मरण, बन्धु नाश
और भय । शुक्र की लत्ता में कलह । बुध की लत्ता में स्थान हानि-
अनर्थ । चन्द्र की लत्ता में महाहानि । यह भिन्न-भिन्न ग्रहों के लत्ता
फल बताये गये हैं ॥४५-४६॥
ऊपर जो लत्ता के अशुभ फल बताये गये हैं वह—एक ही ग्रह की
लत्ता पड़े तो साधारण अशुभ फल कारक होता है । किंतु यदि दो या
अधिक अशुभ ग्रहों की लत्ता एक साथ पड़ें तो अशुभता की बहुत
वृद्धि हो जायगी और जितनी अधिक ग्रहों की लत्ता एक साथ जन्म
नक्षत्र पर पड़े उतना ही अधिक अशुभ फल कहना चाहिए ॥४७॥
सर्वतोभद्र चक्र विचार
अब गोचर देखने का एक नया प्रकार बताया जाता है:-
अब नीचे सर्वतोभद्र चक्र दिया जाता है ।
इस सर्वतोभद्र चक्र में (i) स्वर (ii) नक्षत्र (iii ) नामाक्षर
(iv) राशि (v) तिथि तथा (vi) ग्रहों का विन्यास किया गया है।
क्रम इस प्रकार है ।