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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 652

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५१
रवेर्द्वादशनक्षत्रं भूसुतस्य तृतीयकम् ।
गुरोः षट्‌तारकं चैव शनेरष्टमतारकम् ॥४२॥
एतेषां च पुरोलत्ता पृष्ठलत्ताः प्रकीर्त्तिताः ।
शुक्रस्य पञ्चमं तारं चन्द्रजस्य तु सप्तमम् ॥४३॥
राहोस्तु नवमं चैव द्वाविंशं भं हिमद्युतेः ।
ग्रहस्थितर्क्षाद्गणयेल्लत्तायां जन्मभे व्यथा ॥४४॥
रवेः सर्वार्थहानिः स्यात्तमसोर्दुःखमुच्यते ।
मरणं जीवलत्तायां बन्धुनाशो भयावहः ॥४५॥
शुक्रस्य कलहो भ्रंश अनर्थः शशिजस्य तु ।
चन्द्रस्य तु महाहानिर्लत्तामात्रफलं भवेत् ॥४६॥
सर्वत्र लत्तासाङ्कर्ये द्विगुणत्रिगुणादिकम् ।
वदेद्दोषफलं नॄणां ग्रहाल्लत्ताधिकक्रमात् ॥४७॥
जिस समय का गोचर फल विचार करना हो, उस समय
(क) सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे १२वाँ नक्षत्र ।
(ख) मंगल जिस नक्षत्र में हो उससे तृतीय नक्षत्र ।
(ग) बृहस्पति जिस नक्षत्र में हो उससे छठा नक्षत्र ।
(घ) शनि जिस नक्षत्र में हो उससे आठवां नक्षत्र ।
यह सब पुरोलत्ता कहलाती हैं । इनमें आगे की ओर गिनते हैं ।
जैसे अश्विनी में सूर्य हो तो उत्तरा फाल्गुनी में पुरोलत्ता होती है ।