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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 604, कुल 684 में से

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पृष्ठ 604

पच्चीसवाँ अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६०३
होने के कारण बृहस्पति से प्रारम्भ किया।) हुआ, दूसरा शुक्र का,
तीसरा शनि का। मान लीजिये रात्रिमान ३२ घड़ी है तो प्रत्येक
भाग ४-४ घड़ी का हुआ और ४ × ३ = १२ घड़ी पर शनि का भाग
समाप्त हुआ। सूर्यास्त के १२ घड़ी बाद किस लग्न का कौन-सा अंश
उदित होता है ? यही मान्दि स्पष्ट होगा।
यमघंटक, अर्द्ध प्रहार और काल
अब यम कंटक, अर्द्ध प्रहार और काल निकालना बताते हैं ।
यमकंटक अर्द्धप्रहार काल
रविवार १८ घड़ी बाद १४ घड़ी बाद २ घड़ी बाद
सोमवार १४ ,, १० ,, २६ ,,
मंगलवार १० ,, ६, ,, २२ ,,
बुधवार ६ ,, २ ,, १८ ,,
बृहस्पतिवार २ ,, २६ ,, १४ ,,
शुक्रवार २६ ,, २२ ,, १० ,,
शनिवार २२ ,, १८ ,, ६ ,,
ऊपर जो घड़ियां दी गयी हैं वह यह मान कर कि दिनमान तीस
घड़ी है। यदि दिनमान कम या ज्यादा हो तो ऊपर के समय में भी
अनुपात से अन्तर कर लेना चाहिए । ॥३, ४॥
धूम, व्यतीपात, परिवेश (परिधि) इन्द्रचाप, उपकेतु
सूर्यस्पष्ट में ४ राशि १३ अंश और २० कला जोड़ने से धूम-
स्पष्ट निकल आता है। यदि १२ राशियों में से धूम-स्पष्ट कम किया