फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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जाय तो व्यतीपात निकल आता है। व्यतीपात में ६ राशि जोड़ने से
परिधि की स्थिति मालूम हो जाती है। परिधि को ही परिवेष भी कहते
हैं। यदि परिवेष को बारह राशियों में से घटाया जाय तो इंद्रचाप
निकल आता है। इंद्रचाप में १६ अंश, ४० कला जोड़ने से उपकेतु
की स्थिति मालूम हो जाती है। उपकेतु में एक राशि जोड़ने से सूर्य
स्पष्ट आ जाता है।
मान लीजिये किसी का सूर्य वृश्चिक राशि के २६ अंश पर है, तो
(i) सूर्य = ७-२६
जोड़िये + ४-१३-२०
१२-९-२० = ०-९-२० = धूम
(ii) बारह राशि में से = १२- ०- ०
घटाइये धूम - ०-९-२०
= ११-२०-४० = व्यतीपात
(iii) व्यतीपात = ११-२०-४०
६ राशि जोड़िये + ६- ०- ०
१७-२०-४० = ५-२०-४० = परिवेष
(iv) बारह राशि में से = १२- ०- ०
घटाइये परिवेष - ५-२०-४०
= ६- ९-२० = इंद्रचाप
(v) *इंद्रचाप में = ६- ९-२०
जोड़िये + १६-४०
६-२६- ० = केतु या उपकेतु
*यह केतु—राहु केतु वाला केतु नहीं है किन्तु केतु नामक उप-
ग्रह है।