फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 603, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें६०२ फलदीपिका
(iii) ऊपर जो संस्कृत के श्लोक में मान्दि निकालने का तरीका
बताया गया है उसको हम दूसरे प्रकार से समझाते हैं।
मान्दि और गुलिक एक ही बात है। दिनमान के आठ भाग
कीजिये। सात भागों के स्वामी सातों वारों के स्वामी होते हैं।
आठवें भाग का स्वामी कोई नहीं होता। शनि के भाग का जो
काल है उसे मान्दि या गुलिक कहते हैं। 'मन्द' शनि का नाम है।
मन्द कहते हैं धीरे को। शनैश्चर का अर्थ भी है धीरे चलने वाला।
मन्द (शनि) का काल या शनि वाला आठवाँ भाग मान्दि (मन्द का
बेटा) कहलाता है। मान लीजिये आपको रविवार को मान्दि निकालना
है तो दिनमान के आठ भाग कीजिये। सातवाँ भाग जिस घड़ी-पल
पर समाप्त होता है वह मान्दि स्पष्ट होगा। क्यों? प्रथम भाग रवि
का, दूसरा मोम का, तीसरा मंगल का, इस क्रम से सातवाँ भाग शनि
का आया। यदि आप को बुधवार को मान्दि निकालना है तो भी दिन-
मान के आठ भाग कीजिये। पहला बुध का, दूसरा बृहस्पति का,
तीसरा शुक्र का और चौथा शनि का हिस्सा होगा--मान लीजिये ३२
घड़ी दिनमान है तो ठीक १६ घड़ी के अन्त पर शनि का भाग
समाप्त होगा और १६ घड़ी के इष्ट पर जो लग्न आवे उस लग्न-स्पष्ट
के तुल्य मान्दि स्पष्ट होगा।
दिन के समय तो जो वार होता है उसी से गणना प्रारम्भ करते
हैं किंतु रात्रि के समय दूसरा क्रम है। रात्रिमान के आठ भाग
कीजिये और यह देखिये कि शनि का भाग किस घड़ी पर समाप्त
होता है। उसी समय मान्दि समाप्त हो जाती है। रात्रि के समय मान्दि
निकालने का प्रकार यह है कि जो वारेश हो उससे पाँचवें से गिनना
प्रारम्भ करते हैं। मान लीजिये रविवार की रात्रि को मान्दि निकालना
है। रात्रि के आठ भाग कीजिये। सूर्यास्त के बाद प्रथम भाग बृहस्पति
का (पहले बता चुके हैं कि वारेश से पाँचवें वार में गिनना चाहिये--
सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, इस प्रकार सूर्य से पाँचवाँ बृहस्पति