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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 684 में से

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पृष्ठ 113

११२ फलदीपिका
इस कुण्डली में रुचक, मालव तथा शश योग हैं। जन्मलग्न से केन्द्र
में स्वराशि का मंगल है इसलिये रुचक योग हुआ। जन्मलग्न से चतुर्थ
(केन्द्र में) स्वराशि का शुक्र हुआ
अतः मालव योग हुआ। और जन्म
लग्न से सप्तम (केन्द्र) में स्वराशि का
शनि होने से शश योग हुआ। यदि कन्या
में बुध हो तो मिथुन में चन्द्रमा है,
उससे केन्द्र में उच्च बुध होने के कारण
भद्र योग हो जावेगा। यदि मीन में
बृहस्पति हो तो चन्द्रमा से दशम में
स्वराशि का बृहस्पति हो जाने से चन्द्र लग्न से हंस योग भी बन जावेगा।
प्रायः ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रंथों में यह पंच महापुरुष योग बताये
गये हैं। परन्तु मानसागरी नामक पुस्तक में इस महापुरुष योग का
भंग कैसे हो जाता है यह भी लिखा है। मानसागरी कर्त्ता लिखते हैं कि
यद्यपि मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र या शनि के केन्द्र में, अपनी उच्च या
राशि में स्थित होने से महापुरुष योग बताया गया है किन्तु यदि जो ग्रह
महापुरुष योग बना रहा है वह सूर्य या चन्द्रमा के साथ हो तो-ऐसे
महापुरुष योग के प्रभाव से जातक 'राजा' (या राजतुल्य) नहीं होता
है परन्तु उसकी दशा में (या अन्तर्दशा में) केवल सत्फल (शुभ फल)
होता है।
विधोस्तु सुनफानफाधुरुधुराः स्वरैः फोभय-
स्थितैर्विरविभिर्ग्रहैरितरथा तु केमद्रुमः।
हिमत्विषि चतुष्टये ग्रहयुतेऽथ केमद्रुमो
न हीति कथितोऽथवा हिमकराद्ग्रहैः केन्द्रगैः ॥५॥
स्वयमधिगतवित्तः पार्थिवस्तत्समो वा
भवति हि सुनफायां धीधनख्यातिमांश्च।