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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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छठा अध्याय : योग १११
(सुन्दर, सौम्य) हो। ऐसा व्यक्ति उत्तम भोजन करने वाला हो और
सज्जन लोग उसकी प्रशंसा करें।
जो व्यक्ति मालव्य योग में पैदा होता है वह धैर्यवान् और पुष्ट
अंग वाला होता है। उत्तम भोजन करने वाला, विद्वान्, प्रसन्नमुख,
शान्तचित्त, पुत्र और स्त्रियों के सुख से युक्त, सदैव वृद्धि को प्राप्त,
यशस्वी और अच्छी सवारियों का (मोटर आदि) का भोक्ता हो।
जो व्यक्ति शश योग में उत्पन्न होते हैं वे अत्यन्त प्रभावशाली
होते हैं। किसी ग्राम के मालिक हों या नृप (बहुत से मनुष्यों का स्वामी)
अर्थात् उच्च पदाधिकारी हो। ऐसा व्यक्ति स्वयं बलवान् होता है और
उसकी मातहती में अच्छे-अच्छे लोग काम करते हैं। ऐसे लोगों की
अन्य लोग तारीफ़ जरूर करेंगे। किन्तु वास्तव में शश योग में उत्पन्न
लोगों का आचरण उत्तम नहीं होता। ऐसे-व्यक्ति अन्य पुरुषों की
स्त्रियों में आसक्त रहते हैं। ऐसे लोग धनी और सुखी होते हैं।
ऊपर पांच योग बताये गये हैं। मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि-
इनमें से कोई ग्रह स्वराशि या उच्च राशि का होकर केन्द्र में हो तो क्रमशः
यह पांचों योग बनते हैं। यहां यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि
मन्त्रेश्वर महाराज का कथन है कि यदि चन्द्र लग्न से केन्द्र में भी उपर्युक्त
पांचों ग्रहों में कोई स्वराशि या उच्च राशि का होकर चन्द्र केन्द्र में
हो तो साम्राज्य और सिद्धि प्रदान करने वाला होता है। कहने का
तात्पर्य है कि जैसे जन्म लग्न से केन्द्र का विचार करना वैसे ही चन्द्र
लग्न से भी विचार करना चाहिये। यदि कोई एक ग्रह उपर्युक्त
प्रकार से योग कारक हो तो मनुष्य भाग्यवान् होता है। यदि दो ग्रह
योग बनावें तो राजा के समान हो। तीन ग्रह योग बनावें तो राजा
हो; चार ग्रह योग बनावें तो महाराजा हो और जिसकी कुण्डली में
रुचक, भद्र, हंस, मालव्य और शश ये पाँचों योग हों वह इससे भी
उच्च पदवी प्राप्त करता है।