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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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छठा अध्याय : योग ११३
प्रभुरगदशरीरः शीलवान् ख्यातकीर्ति-
र्विषयसुखसुवेशो निर्वृतश्चानफायाम् ॥ ६ ॥
उत्पन्नभोगसुखभाग्धनवाहनाढ्य-
स्त्यागान्वितो धुरुधुराप्रभवः सभृत्यः ।
केमद्रुमे मलिनदुःखितनोचनिःस्वाः
प्रेष्याः खलाश्च नृपतेरपि वंशजाताः ॥ ७ ॥
अब चार योग बताते हैं । इन चारों योगों का विचार चन्द्र राशि
से किया जाता है । इन चारों योगों में जहां ग्रह का उल्लेख किया
जावे वहां मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि केवल इन पांच ग्रहों को
समझना चाहिये । सूर्य की गणना इनमें नहीं करनी चाहिये :—यदि
चन्द्रमा से द्वादश में कोई ग्रह हो और द्वितीय में कोई ग्रह नहीं हो तो
अनफा योग होता है । यदि चन्द्रमा से द्वादश में कोई ग्रह न हो और केवल
द्वितीय में हो तो सुनफा योग होता है । यदि चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश
दोनों स्थानों में ग्रह हों तो दुरुधरा योग होता है। यदि चन्द्रमा से
द्वितीय और द्वादश में—दोनों स्थानों से किसी में भी कोई ग्रह न हो
तो केमद्रुम योग होता है । कुछ लोगों का मत है कि निम्नलिखित योगों
में से कोई हो तो केमद्रुम योग नहीं होता ।
(१) यदि चन्द्रमा के साथ कोई ग्रह हो ।
(२) यदि लग्न से केन्द्र में कोई ग्रह हो ।
(३) यदि चन्द्रमा से केन्द्र में कोई ग्रह हो ।
मन्त्रेश्वर महाराज ने यह लिखकर कि कुछ अन्य लोगों का मत

  • जन्म कुंडली में जिस राशि में चन्द्रमा हो उसे चन्द्र राशि या
    चन्द्र लग्न कहते हैं ।