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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

२७२ परशुरामकल्पसूत्रम्
प्रकार सभी पटलों का एक साथ स्मरण कर इस महोपनिषद् को पूर्णता प्रदान
की गयी है॥८४॥
ग्रन्थकर्त्तारं तद्गुणोत्कर्षं च प्रकटयति
इति श्रीदुष्टक्षत्रियकुलकालान्तकरेणुकागर्भसम्भूतमहादेव-
प्रधानशिष्य-जामदग्न्यश्रीपरशुरामभार्गवमहोपाध्यायमहाकुलाचार्य-
निर्मितं कल्पसूत्रं सम्पूर्णम्॥८५॥
दुष्टेत्यनेन दुष्टनिग्रहपूर्वकधर्मव्यवस्थापकत्वं दर्शितम्। महादेवेत्यनेन
सम्प्रदायप्रवर्त्तकशुद्धिर्दर्शिता। कुलाचार्य इत्यनेन स्वस्य सर्वतन्त्रस्वतन्त्रता
सूचिता। एतैः सर्वविशेषणैः स्वप्रणीतग्रन्थे अप्रामाण्यशङ्काकलङ्कलेशाभावः
सूचितः॥८५॥
सूत्र में दुष्टक्षत्रियकालान्तक विशेषण एक ऐतिहासिक सन्दर्भ को सूचित
करता है। यद्यपि इस श्रीविद्या-साधना की परम्परा में इस विशेषण की कोई
प्रासङ्गिकता नहीं, फिर भी इस उपनिषद् की धर्ममूलकता को ध्यान में रखते
हुए एक धर्मप्रवर्त्तक द्वारा ही यह धर्माङ्ग शास्त्र प्रवर्त्तित है, इसका गर्व लेखक
में होना स्वाभाविक लगता है। अध्येता को भी इस रहस्य से परिचित होना
चाहिये।
भगवान् परशुराम का महत्त्व सूचित करते हुए यह घोषणा करते हैं कि,
मैं रेणुका सदृश विश्वविश्रुता विदुषी ऋषि का पुत्र हूँ। तत्पश्चात् गुरु स्मरण भी
प्रसङ्गसम्मत है। ये भार्गव हैं महोपाध्याय हैं। ये महाकुलाचार्य हैं। इन सद्विशेषणों
से विभूषित भगवान् परशुराम इस महोपनिषद् के रचनाकार हैं। उनकी जय हो।
इति शिवम्॥८५॥
वृत्तिकारपरिचयः
एषोऽपराजितानन्दनाथः श्रीगुरुसेवया।
सम्यन्त्रसूक्ष्मविज्ञानः श्रीदेवीप्रेरितः कृती॥
जामदग्न्यं कल्पसूत्रं व्याचख्यौ गूढभावकम्।
बालानां सुखबोधाय श्रीदेवीप्रीतयेऽपि च।

सर्वसाधारणक्रमः २७३
रचनाकालः -
अग्निबाणाद्रिभूसंख्ये शाके तपसि गीष्पतेः।
वासरे शुक्लपक्षस्य दिन आद्ये निशामुखे।।
अर्पितः श्रीकालिकायामनेन प्रीयतां शिवा।।
।। इति श्रीपण्डितकुलावतंसनिखिलनित्यनैमित्तिकानुष्ठानपुष्टीकृतकलशो-
द्भवाद्युपासकवर्य्यामृतेशानन्दनाथप्रेमपात्रसुब्रह्मण्यतनूद्भवश्रीरामेश्वरविरचिता
सौभाग्योदयसंज्ञिका परशुरामकल्पसूत्र(मुख्यांश)वृत्तिः परिपूर्णा।।
।। इति शिवम्।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का सर्वसाधारणक्रम नामक दशम खण्ड परिपूर्ण ।।१०।।
।। शुभं भूयात् ।।

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CC.0 Digitized by Arya Samaj Foundation, Chennai and eGangotri
Vidya Niwas Mishra Collection, Varanasi. Courtesy. Dayanidhi Mishra ji

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Vidya Niwas Mishra Collection, Varanasi. Courtesy. Dayanidhi Mishra ji

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