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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 320 में से

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७२ परशुरामकल्पसूत्रम्
कामिकागम और सुन्दरीहृदय भी कहते हैं। इसके चार त्रिकोण पराङ्मुख और
५ त्रिकोण स्वाभिमुख रहते हैं। इस आधार पर भी यह नौ त्रिकोणों वाला चक्र
श्रीचक्र ही है।
श्रीचक्र में विराजमान राजराजेश्वरी महामाहेश्वरी को तीन अर्घ्य समर्पित
करना चाहिये। इस अर्घ्य मन्त्र को त्रिपुरा गायत्री कहते हैं। इसमें तीन कूट बीज
प्रयुक्त होते हैं। प्रथम वाग्भवकूट का उच्चारण कर 'त्रिपुरसुन्दर्यै विद्महे' पुनः
कामराजकूट कहकर 'पीठकामिनि धीमहि' और तुरत शक्तिबीज बोलकर 'तन्नः
क्लिन्ना प्रचोदयात्' कहना चाहिये। यही त्रिपुरा गायत्री मन्त्र है। अर्घ्य के बाद
अष्टोत्तरशत जप करे और मौन होकर ध्यानस्थ हो जाय ।।५।।
ततो यागमन्दिरप्रवेशादीन् वदति
यागमन्दिरं गत्वा क्लृप्ताकल्पस्सङ्कल्पाकल्पो वा पीठमनुना
आसने समुपविष्टः ।।६।।
यागमन्दिरं पूजा-स्थानं गत्वा एतेन सन्ध्या बहिर्जले नद्यादाविति
सिद्धम्। क्लृप्ता धृता आकल्पा भूषणानि येनेदृशः। इदं भूषणधारणं
पूजाकर्तुरङ्गम्। सङ्कल्पेन मानसक्रियया कल्पित आकल्पो येनेदृशो वा।
पीठमनुनेति पूर्वं व्याख्यातम्। समुपविष्ट इत्यत्र आसमाप्ति एकासनेन स्थेयम्
इति ज्ञापयति ।।६।।
यागमन्दिर पूजा-स्थान के लिये प्रयुक्त शब्द है। पूजा-स्थान में जाने से
पहले शिष्य को सन्ध्या करनी आवश्यक है। सन्ध्या कहाँ की जाय, इसका
निर्देश यहाँ नहीं है। इससे स्पष्ट है कि, वह नदी, जलाशय आदि क्षेत्र में कहीं
अन्यत्र कर लेनी चाहिये। पूजा मन्दिर में सज-धज कर जाना चाहिये। श्रीमन्त
को विहित आभूषण से भूषित होना आवश्यक है। अथवा धनाभाव की अवस्था
में मानस प्रक्रिया द्वारा अपने को सुमन बनाकर पूजा में संलग्न होना चाहिये।
पीठमन्त्र के विषय में पहले कहा जा चुका है। पूजा में एक आसन में बैठना
चाहिये। सम् उपसर्ग से यही ध्वनन हो रहा है।।६।।
एतत्सपर्योपयोगिनीं त्रितारीमाह
त्रितारीमुच्चार्य रक्तद्वादशशक्तियुक्ताय दीपनाथाय नम इति
भूमौ मुञ्चेत् पुष्पाञ्जलिम् ।।७।।