सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 170 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 87

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ७५
मणि के पात्र तथा शंख ये जल के प्रक्षालन मात्र से ही शुद्ध हो
जाते हैं। परन्तु पत्थर का बना हुआ पात्र पत्थर से रगड़ने से ही शुद्ध
होता है ॥२८॥
मृण्मये दहनाच्छुद्धिर्धान्यानां मार्जनादपि ।
वेणु-वल्कल-चीराणां क्षौम-कार्पास-वाससाम् ॥२९॥
मिट्टी के बरतन आग पर तपाने से शुद्ध होते हैं, तथा धान्य की
शुद्धि जल के छींटे दे देने से होती है। इसी प्रकार बाँस के पात्र,
वल्कल, चीर ( फटे वस्त्र ), रेशमी एवं सूती वस्त्र ॥२९॥
और्ण-नेत्रपटानां च प्रोक्षणाच्छुद्धिरिष्यते ।
मुञ्जोपस्कर-शूर्पाणां शणस्य फल-चर्मणाम् ॥३०॥
तथा ऊनी वस्त्र और सन से निर्मित वस्त्रों की शुद्धि जल के छींटे
देने से हो जाती है। मूँज, उपस्कर ( घर को शुद्ध करनेवाले झाडू ),
सूप, सन, फल, चाम ॥३०॥
तृणकाष्ठस्य रज्जूनामुदकाभ्युक्षणं मतम् ।
तूलिकाद्युपधानानि रक्तवस्त्रादिकानि च ॥३१॥
तथा तृण, काष्ठ और रस्सी की शुद्धि केवल जल के प्रोक्षण ( छींटा
देने ) मात्र से हो जाती है। तकिया, लाल रंग में रँगे हुए वस्त्र ॥३१॥
शोषयित्वार्कतापेन¹ प्रोक्षणाच्छुद्धितामियुः ।
मार्जार-मक्षिका-कीट-पतङ्ग-कृमि-दर्दुराः ॥ ३२ ॥
धूप में सुखाकर जल के छींटा दे देने से शुद्ध हो जाते हैं। बिल्ली,
मक्खी, कीट, पतंग तथा मेढक ॥३२।
१. '-ऽऽतपेनैव' इति । २. 'मनुरब्रवीत्' इति ।