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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 170 में से

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पृष्ठ 86

७४ पराशरस्मृतिः [सप्तमो-
भस्मना शुद्ध्यते कांस्यं सुरया यन्न लिप्यते ।
सुरामात्रेण संस्पृष्टं शुद्ध्यतेऽग्न्युपलेखनैः१ ॥२४॥
जो काँस पात्र में मद्य का स्पर्श न हुआ हो, तो वह भस्म से मलने
पर शुद्ध हो जाता है । किन्तु मद्य के स्पर्श हो जानेपर अग्नि में तपाकर
माँजने से उसकी शुद्धि होती है ॥२४॥
गावाघ्रातानि कांस्यानि श्व-काकोपहतानि च ।
शुद्ध्यन्ति दशभिः क्षारैः शूद्रोच्छिष्टानि यानि च ॥२५॥
जिस काँस के पात्र को गौ ने सूंघ लिया हो, कुत्ता अथवा कौवे ने
उसे दूषित कर दिया हो अथवा शूद्र के द्वारा वह उच्छिष्ट कर दिया
गया हो वह दश बार क्षार ( खट्टे ) पदार्थ के द्वारा मलने से शुद्ध
होता है ॥२५॥
गण्डूषं पादशौचं च कृत्वा वै कांस्यभाजने ।
षण्मासान् भुवि निक्षिप्य उद्धृत्य पुनराहरेत् ॥२६॥
काँस के बरतन में कुल्ला कर देने पर अथवा पैर धो लेने पर छः
महीने तक उसे पृथ्वी में गाड़े । तदनन्तर उसका व्यवहार करे ॥२६॥
आयसेष्वायसानां च सीसस्याग्नौ विशोधनम् ।
दन्तमस्थि तथा शृङ्गं रौप्यं सौवर्णभाजनम् ॥२७॥
लोहे के पात्र के अशुद्ध हो जाने पर उसे लोहे से रगड़े । शीशे के
पात्र क अशुद्ध हो जाने पर उसे अग्नि में तपावे । दाँत, हड्डी, सींग,
चाँदी एवं सोने के बने हुए पात्र, ॥२७॥
मणिपात्राणि शङ्खश्चेत्येतान् प्रक्षालयेज्जलैः ।
पाषाणे तु पुनर्धर्षः शुद्धिरैवमुदाहृता ॥२८॥
१. ‘-ऽग्न्युपलेपनैः’ इति पुस्तकान्तरे ।