पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 14, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें२ पराशरस्मृतिः [ प्रथमो-
न चाहं सर्वतत्त्वज्ञः कथं धर्मं वदाम्यहम् ।
अस्मत्पितैव प्रष्टव्य इति व्यासःसुतोऽवदत् ॥ ४ ॥
हे महर्षियो ! मैं कलि के सम्पूर्ण धर्म-कर्मों का तत्त्व जाननेवाला
नहीं हूँ। यद्यपि मुझे कलि के धर्म सामान्य पितृ-प्रसाद से ज्ञात है,
अतः हम लोगों को पिता पराशर के पास ही चलकर यह प्रश्न
करना उचित है, ऐसा पराशरसुत व्यासजी ने कहा ॥ ४ ॥
ततस्ते ऋषयः सर्वे धर्मतत्त्वार्थकांक्षिणः ।
ऋषिं व्यासं पुरस्कृत्य गता बदरिकाश्रमम् ॥ ५ ॥
व्यासजी के इस प्रकार कहने पर कलि के सभी धर्मतत्त्वों की
जिज्ञासा से महर्षि वेदव्यास को आगे कर, बदरिकाश्रम गये ॥ ५ ॥
नानापुष्प-लताकीर्णं फल-पुष्पैरलङ्कृतम् ।
नदी-प्रस्रवणोपेतं पुण्यतीर्थोपशोभितम् ॥ ६ ॥
बदरिकाश्रम, अनेक प्रकार की पुष्पवाली लताओं से, फल एवं
पुष्पों से समन्वित है, अनेक नदियाँ तथा झरने जिसमें बह रहे हैं,
तथा जिसका जल तीर्थों से अत्यन्त पवित्र है, ॥ ६ ॥
मृगपक्षि-निनादाढ्यं देवतायतनावृतम् ।
यक्ष-गन्धर्व-सिद्धैश्च नृत्य-गीतैरलंक्रतम् ॥ ७ ॥
जिसमें अनेक प्रकार के जंगली जीव मृग और पक्षिगण निर्भीक
होकर मनोहर शब्द कर रहे हैं, जो अनेक देव-मन्दिरों से अलंकृत है
तथा यक्ष, गन्धर्व और सिद्धों के नाच-गान जहाँ परमात्मा की प्राप्ति के
लिए हो रहे हैं ॥ ७ ॥
तस्मिन्नृपिसभामध्ये शक्तिपुत्रं पराशरम् ।
सुखासीनं महातेजा मुनिमुख्यगणावृतम् ॥ ८ ॥