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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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(५०६) पञ्चतन्त्रम् ।

इसी (१) विकालमें वह नित्यही मुझे क्लेशित करता है । उस दुरात्माके
प्रतिषेध (नष्ट) होनेका कोई उपाय है ?" यह सुनकर राक्षस भी विचारने
लगा । "अवश्यही जैसा मैं हू ऐसा कोई दूसरा विकाल नाम इसके हरनेकों
नित्यही आता है । परन्तु वह भी इसके हरनेको समर्थ नहीं होता । सो घोडेका
रूप धरकर घोडोंके बीचमें स्थित होकर देखूं कि, वह किस रूप और किस
प्रभावका है"। इस प्रकार राक्षस घोडेका रूप करके घोडोंके मध्यमें स्थित
हुआ । ऐसा करनेपर अर्द्धरात्रको राजगृहमें कोई घोडोंका चोर आया । वह सब
घोडोंको देख उस राक्षसको श्रेष्ठ घोडा जानकर उसपर चढा । इसी समय
राक्षस विचारने लगा । "अवश्यही यह विकाल मुझे चोर जानकर क्रोधसे मार-
नेको आया है । सो मैं क्या करूं" ! ऐसा विचारते वह भी लगामको मुखमें
रख कोडेके आघातसे ताडित करता हुआ । तब यह भयसे व्याकुल मन हो
पलायन करने लगा । चोरभी दूर जाकर लगाम खेंचकर उसको स्थित करने
लगा । और वह तो केवल महावेगसे भागनेही लगा । तब वह चोर उसको
लगाम खैंचनेको न गिननेवाला मानकर विचारने लगा । "अहो इस प्रकारके
घोडे नहीं होते हैं जो लगामको न गिनें सो अवश्यही यह घोडेरूपी राक्षस
होगा । सो कहीं यदि रेतली पृथ्वी देखूं तो वहां कूद पडू । अन्यथा मेरा जीवन
न होगा" । ऐसा विचार करते इष्टदेवताका स्मरण करते हुए वह घोडा वटके
नीचेको होकर निकला । चोर वटकी शाखा अवलम्बन कर वही स्थित हुआ,
इस प्रकार दोनोंही पृथक् होकर परमानन्दको प्राप्त हो जीवनकी प्राप्त
आशावाले हुए । उस वटमें कोई राक्षसका मित्र वानर रहता था । उसने राक्ष-
सको व्याकुल हुआ देखकर यह कहा,-"भो मित्र ! वृथा भयसे क्यों पलायन
करते हो, सो यह मनुष्य तो भक्ष्य है इसे खाजाओ" । वहभी वानरके वचन
सुन अपना स्वरूप धारण कर शंकित मनसे गति रुकीहुई लौटा । चोरभी उसे
वानरका बुलाया हुआ जानकर क्रोधसे उसकी लम्बी पूंछको मुखमें डाल चबाने
लगा । वानरभी उसको राक्षससे अधिक मान भयसे कुछ न बोला केवल
व्यथासे दुःखी हो आंख मींचकर बैठ गया राक्षसभी उसे ऐसा देख यह श्लोक
पढने लगा,-


१ कुसमय.