पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 522, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header]
भाषाटीकासमेतम् । (१०७)
“यादृशी वदनच्छाया दृश्यते तव वानर ।
विकालेन गृहीतोऽसि यः परेति स जीवति ॥ ९० ॥
“हे वानर ! जैसी तेरे मुखकी छाया दीखती है विकालसे गृहीत हुआ
तूभी विदित होता है, जो भागेगा सो जियेगा ॥ ९० ॥”
उक्त्वा प्रनष्टश्च ।
यह कह भागगया-
तत्प्रेषय मां येन गृहं गच्छामि । त्वं पुनः अनुभुङ्क्ष्व अत्र
स्थित एव लोभवृक्षफलम्” । चक्रधरः प्राह,-“भोः ! अका-
रणमेतत्, दैववशात् सम्पद्यते नृणां शुभाशुभम् । उक्तञ्च-
सो मुझे जानेकी आज्ञा दो । और तू यहीं स्थित हुआ लोभवृक्षका फल
भोग ।” । चक्रधर बोला,-“भो ! यह अकारण हुआ है । देववशसे मनुष्योको
शुभाशुभ फलकी प्राप्ति होती है । कहा है-
दुर्गस्त्रिकूटः परिखा समुद्रो
रक्षांसि योधा धनदाच्च वित्तम् ।
शास्त्रञ्च यस्योशनसा प्रणीतं
स रावणो दैववशाद्विपन्नः ॥ ९१ ॥
जिसका दुर्ग त्रिकूट पर्वत, समुद्र खाई, राक्षस योध्ता, कुबेरसे धनकी प्राप्ति,
जिसके यहां शुक्रका निर्मित किया शास्त्र वह रावण भी दैववशसे नष्ट
हुआ ॥ ९१ ॥
तथाच-
और देखो-
अन्धकः कुब्जकश्चैव त्रिस्तनी राजकन्या ।
त्रयोऽप्यन्यायतः सिद्धाः सम्मुखे कर्मणि स्थिते ॥९२॥”
तथा अधा कुबडा तीन स्तनवाली राजकन्या यह तीनों कर्मके सन्मुख
होनेमें अन्यायसे भी सिद्ध हुए ॥ ९२ ॥”
सुवर्णसिद्धिः आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्-
सुवर्णसिद्धि बोला,-“यह कैसे ?” वह बोला-