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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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( ४८६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तत् कथं भगिनीसुत ! माम् अनभिज्ञं वदन् निवार-
यसि ?” । शृगाल आह,-“माम ! यदि एवं तदहं तावद्
वृतेः द्वारस्थितः क्षेत्रपालम् अवलोकयामि । त्वं पुनः
स्वेच्छया गीतं कुरु” । तथा अनुष्ठिते रासभरटनम् आकर्ण्य
क्षेत्रपः क्रोधात् दन्तान् घर्षयन् प्रधावितः । यावत् रासभो
दृष्टः तावत् लगुडप्रहारैः तथा हतो, यथा प्रताडितो
भूपृष्ठे पतितः । ततश्च सच्छिद्रम् उलूखलं गले बद्धा क्षेत्र-
पालः प्रसुप्तः । रासभोऽपि स्वजातिस्वभावात् गतवेदनः
क्षणेन अभ्युत्थितः ।
हे मान्जे ! सो तू मुझे अनभिज्ञ किस प्रकार कहकर निवारण करता
है” । शृगाल बोला,-“जो ऐसा है तो मैं वृति के द्वार पर स्थित हुआ क्षेत्रपाल को
अवलोकन करूं । तू अपनी इच्छा से गीत का गान कर” । ऐसा करने पर
गधे का शब्द सुनकर क्षेत्रपाल क्रोध से दांत पीसता धावमान हुआ और गधे को
देखते ही इस प्रकार लगुड प्रहार से ताडन किया कि वह ताडित हो पृथ्वी पर
गिर पड़ा । तब सछिद्र उलूखल को उसके गले में बांधकर क्षेत्रपाल सो गया ।
और गधा भी जातिस्वभाव से वेदना रहित हो क्षणमात्र में उठ बैठा ।
उक्तञ्च-
कहा है-
“सारमेयस्य चाश्वस्य रासभस्य विशेषतः ।
मुहूर्तात्परतो न स्यात्प्रहारजनिता व्यथा ॥ ५९ ॥”
“कि कुत्ता घोडा और विशेष कर गधा एक मुहूर्त से पीछे इनको प्रहार की
व्यथा नहीं होती है ॥ ५९ ॥”
ततः तदेव उलूखलम् आदाय वृतिं चूर्णयित्वा पलायि-
तुम् आरब्धः । अत्रान्तरे शृगालोऽपि दूरादेव तं दृष्ट्वा सस्मि-
तम् आह-
इस कारण उसी उलूखल को लेकर उस वाड को तोड भागने लगा । इसी
समय शृगाल भी दूर से उसे देख हँसता हुआ बोला,-
“साधु मातुल गीतेन मया प्रोक्तोऽपि न स्थितः।
अपूर्वोऽयं मणिर्बद्धः सम्प्राप्तं गीतलक्षणम् ॥ ६० ॥”