पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (४८५)
शरज्ज्योत्स्नाहते दूरं तमसि प्रियसन्निधौ ।
धन्यानां विशति श्रोत्रे गीतझंकारजा सुधा ॥ ५४ ॥”
शरदमें चन्द्रकिरणद्वारा अन्धकार दूर (नाश) करनेपर प्रिय जनोंके
निकट वडभागी पुरुषोंके कानमें गीतके झंकारसे उत्पन्न हुई सुधा प्राप्त
होती है ॥ ५४ ॥”
शृगाल आह-“माम ! अस्ति एतत्, परं न वेत्सि त्वं
गीतं केवलम् उन्नदसि । तत् किंतेन स्वार्थभ्रंशकेन ?” रासभ
आह,-“धिक् धिक् मूर्ख ! किमहमं न जानामि गीतम् ?
तद्यथा तस्य भेदान् शृणु-
शृगाल बोला,-“मामा ! है तो ऐसाही परन्तु तुम गीत नहीं जानते केवल
कुत्सित शब्द करते हो, सो उस स्वार्थनाशक (गीत) से क्या है”। रासभ
बोला-“धिक् ! धिक् मूर्ख ! क्या मैं गीत नहीं जानता सो उसके भेद सुन-
सप्त स्वरास्त्रयो ग्रामा मूर्च्छनाश्चैकविंशतिः ।
तालास्त्वेकोनपञ्चाशत्तिस्रो मात्रा लयास्त्रयः ॥ ५५ ॥
सात स्वर (निषाद, ऋषभ, गान्धार, षड्ज, मध्यम, धैवत, पञ्चम), तीन
ग्राम, इक्कीस मूर्च्छना, आरोह अवरोहक स्वर, उनचाश ताल, तीन मात्रा,
तीन लय ॥ ५५ ॥
स्थानत्रयं यतीनाञ्च षडास्यानि रसा नव ।
रागाः षट्त्रिंशतिर्भावाश्चत्वारिंशत्ततः स्मृताः ॥ ५६ ॥
यतियोंके तीन विराम स्थान, छः मुख, नौ (शृंगार, हास्य, करुणा, रौद्र,
वीर, भयानक) रस, छत्तीस राग, ४० चालीस भाव ॥ ५६ ॥
पञ्चाशीत्यधिकं ह्येतद्गीताङ्गानां शतं स्मृतम् ।
स्वयमेव पुरा प्रोक्तं भरतेन श्रुतेः परम् ॥ ५७ ॥
यह एकसौ पचासी गीतोंके अंग श्रुति पर भरत मुनिने स्वयं कहे हैं ॥५७॥
नान्यद्गीतात्प्रियं लोके देवानामापि दृश्यते ।
शुष्कस्नायुस्वराह्लादाद्त्र्यक्षं जग्राह रावणः ॥ ५८ ॥
गीतसे अधिक लोकमें प्रिय और कुछ नहीं है तप करनेसे शुष्क इन्द्रिय
श्शिरा युक्त होकरभी स्वरसे ही रावणने शिवजीको वशीभूत कियाथा ॥ ५८ ॥