पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४६३ )
अपरीक्ष्य न कर्तव्यं कर्तव्यं सुपरीक्षितम् ।
पश्चाद्भवति सन्तापो ब्राह्मण्यां नकुलार्थतः ॥ १८ ॥"
कोई काम बिना परीक्षासे न करना चाहिये, परीक्षासेही करना चाहिये, बिना-
विचारे सन्ताप होता हे, जैसे ब्राह्मणीको नकुलके निमित्त हुआ था ॥ १८ ॥"
मणिभद्र आह,-"कथमेतत् ?" ते धर्माधिकारिणः प्रोचुः-
मणिभद्र बोला,-"यह कैसी कथा ?" वे धर्माधिकारी बोले-
कथा २.
कस्मिंश्चिदधिष्ठाने देवशर्मा नाम ब्राह्मणः प्रतिवसति
स्म । तस्य भार्या प्रसूता सुतम् अजनयत,तस्मिन् एव दिने
नकुली नकुलं प्रसूता । अथ सा सुतवत्सला दारकवत्तमपि
नकुलं स्तन्यदानाभ्यङ्गमर्दनादिभिः पुपोष । परं तस्य न विश्व-
सिति "यत् कदाचित् एष स्वजातिदोषवशात् अस्य दार-
कस्य विरुद्धम् आचरिष्यति" इति, एवं जानाति स्वचित्ते ।
उक्तञ्च-
किसी स्थानमें देवशर्मा नाम ब्राह्मण रहता था उसकी भार्याने पुत्र उत्पन्न
किया । उसी दिन नोलीने एक नकुलको उत्पन्न किया । वह पुत्रवत्सला बाल-
ककी समान उस न्योलेकोभी दूध दान शरीरके मलनेआदिसे पुष्ट करती भई ।
परन्तु उसका विश्वास न करती कि "यह कदाचित् अपनी जातिके दोषसे इस
बालकके विरुद्ध आचरण करेगा" ऐसा अपने चित्तमें जानती । कहा है-
"कुपुत्रोऽपि भवेत्पुंसां हृदयानन्दकारकः ।
दुर्विनीतः कुरूपोऽपि मूर्खोऽपि व्यसनी खलः ॥ १९ ॥
"कुपुत्रभी पुरुषोंके हृदयके आनन्दका करनेवाला होता हे, चाहे दुर्विनीत
कुरूप व्यसनी खल हो ॥ १९ ॥
एवं च भाषते लोकश्चन्दनं किल शीतलम् ।
पुत्रगात्रस्य संस्पर्शश्चन्दनादतिरिच्यते ॥ २० ॥
लोक यह कहते हैं कि, चन्दन शीतल हे परन्तु पुत्रका शरीर चन्दनसे
अधिक शीतल हे परन्तु पुत्रके शरीरस्पर्शसे चंदन अधिक शीतल नहीं है ॥२०॥