पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४६२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
पृष्टः-“भोः ! किमेतत् भवता कुकृत्यमनुष्ठितम् ?” स
आह,-“किं करोमि ? मया श्रेष्ठिमणिभद्रगृहे दृष्ट एवंविधो
व्यतिकरः” । सोऽपि सर्वमणिभद्रवृत्तान्तं यथादृष्टम् अक-
थयत् । ततः श्रेष्ठिनम् आहूय भणितवन्तः,-“भोः श्रेष्ठिन् !
किं त्वया कश्चित् क्षपणको व्यापादितः ?” ततः तेनापि
सर्वः क्षपणकवृत्तान्तः तेषां निवेदितः। अथ तैः अभिहितम्-
तब घरमें उनको प्रवेश कराकर द्वार बंद कर उनके शिरमें डंडेसे प्रहार
करने लगा । वे भी ताडित हुए कोई मरगये कोई शिरफूटनेसे चिल्लाते हुए
भागे, इसी समय उनके चिल्लानेके शब्दको सुनकर नगरके रक्षकों ने कहा-“भो
भो यह नगरके मध्यमें क्या बडा कोलाहल है सो जाओ जाओ” । वे सब उन
की आज्ञा करते उद्यके सहित वेगसे उस घरमें गये । उन्होंने रुधिरसे भीजे
शरीर भागते हुए क्षपणकोंको देखा । तब उन्होंने उस नाईको बांध लिया ।
और मरनेसे बचे हुओंके साथ न्यायालयमें प्राप्त किया । तब उन्होंने नाईसे
पूछा-“भो ! यह क्या है ? तैने बडा कुकृत्य किया है ?” वह बोला-“मैं क्या
करूं ? मैने सेठ मणिभद्रके घरमें इस प्रकारका व्यापार देखा था”। और वह
सब मणिभद्रके दृष्टान्तको जैसा देखा था तैसा कहता भया । तब वे श्रेष्ठीको
बुलाकर कहते भये-“भो सेठ ! क्या तैने किसीक्षपणकको मारा ?” तब उसने
सब क्षपणकका वृत्तान्त उनसे कहा । तब उन्होंने कहा,-
“अहो ! शूलम् आरोप्यताम् असौ दुष्टात्मा कुपरीक्षित-
कारी नापितः” । तथा अनुष्ठिते तैः अभिहितम्-
“अहो इस दुरात्माको शूलपर आरोपण करदो यह दुष्टात्मा नाई कुपरीक्षित
करनेवाला है” । ऐसा करनेपर उन्होंने कहा,-
“कुदृष्टं कुपरिज्ञातं कुश्रुतं कुपरीक्षितम् ।
तन्नरेण न कर्त्तव्यं नापितेनात्र यत्कृतम् ॥ १७ ॥
“जो बुरा देखा, कुत्सित जाना, कुत्सित सुना, कुत्सित परीक्षा कियाहुआ है
मनुष्यको वह बात नहीं करनी चाहिये जो नाईने किया ॥ १७ ॥
अथवा साधु इदमुच्यते-
अथवा यह अच्छा कहा है-