पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २६६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
सुपूरा स्यात्कुनदिका सुपूरो मूषिकाञ्जलिः ।
सुसन्तुष्टः कापुरुषः स्वल्पकेनापि तुष्यति ॥ १४८ ॥
कुनदी जल्दी पूरा होजाती है, मूषिककी अंजली शीघ्र भर जाती है, का-
पुरुष शीघ्र थोड़ेहीसे सन्तुष्ट हो जाते हैं ॥ १४८ ॥
तस्मात् पुरुषेण सदा एव उत्साहवता भाव्यम् । उक्तञ्च-
इस कारण पुरुषको सदा उत्साहसे रहना चाहिये । कहा है-
यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता ।
नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम् ॥ १४९ ॥
जहां उत्साहसे आरम्भ होता है, जहां आलस्य हीनता होती है, जहां नीति
और विक्रमका संयोग है वहां अचल लक्ष्मी रहती है ॥ १४९ ॥
तदैवमिति सञ्चिन्त्य त्यजेन्नोद्योगमात्मनः ।
अनुद्योगं विना तैलं तिलानां नोपजायते ॥ १५० ॥
योंही होगा ऐसा विचार कर अपना उद्योग त्यागना नहीं चाहिये
अनुद्योगके विना तिलोंमेंसे तेलभी नहीं निकलता है ॥ १५० ॥
अन्यच्च-
औरभी-
यःस्तोकेनापि सन्तोषं कुरुते मन्दधीर्जनः ।
तस्य भाग्यविहीनस्य दत्ता श्रीरपि मार्ज्यते ॥ १५१ ॥
जो मन्दबुद्धि पुरुष थोड़ेमेंही सन्तोष करता है उस भाग्यहीनकी दूसरोंकी
दी हुई लक्ष्मीभी नष्ट हो जाती है ॥ १५१ ॥
यच्च त्वं वदसि, एतौ पतिष्यतो न वेति, तदपि अयु-
क्तम् । उक्तञ्च-
और जो तुम कहते हो कि, यह गिरेंगे या नहीं सोभी अयुक्त है । कहाहै-
कृतनिश्चयिनो वन्द्यास्तुङ्गिमा न प्रशस्यते ।
चातकः को वराकोऽयं यस्येन्द्रो वारिवाहकः ॥ १५२ ॥
कारण, कि कार्यसिद्धिमें उत्साहवाले पूजनीय हैं हमारी उच्चाभिलाषा प्रशंसाको
प्राप्त होती है यह चातक दीन क्या वस्तु है जिसके उत्साहसे देवराज जल
देता है (उस क्षुद्रके निश्चयको जानकर देवराजभी उसके मनोरथको पूर्ण
करता है ) ॥ १५२ ॥