पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२६६)
तत् किं वृथा श्रमाय मां नियोजयसि । अत्रस्थः तावज्जला-
र्थमागतान् मूषकान् भक्षयिष्यामि समं त्वया मार्गोऽयं यतः
तेषाम् । अपरं यदि त्वां मुक्त्वा अस्य तीक्ष्णविषाणस्य वृष-
भस्य पृष्ठे गमिष्यामि तदा आगत्य अन्यः कश्चिदेतत् स्थानं
समाश्रयिष्यति । न एतत् युज्यते कर्तुम् । उक्तञ्च-
किसी एक स्थानमें तीक्ष्ण शृङ्गनामवाला बैल रहता था वह मदकी अधि-
कतासे अपने यूथको त्यागने किये शृंगोंसे नदीतटको विदीर्ण करता हुआ
अपनी इच्छासे मरकतमणीकी समान घास खाता वनचारी भया । उसी वनमें
प्रलोभक नाम शृगाल रहता था । वह कभी अपनी भार्याके सहित नदीके
किनारे सुखसे बैठाथा, इसी समय तीक्ष्णशृङ्ग जलपानके निमित्त नदीके तटपर
आया । तब उसके लम्बायमान अण्डकोष देखकर शृगालीने शृगालसे कहा,-
“स्वामिन् ! इस वृषभके मासपिण्ड लम्बायमान होते हुए देखो । सो यह एकही
क्षणसे अथवा प्रहारसे गिर जायगे । ऐसा विचार कर तुम इसके पीछे फिरो” ।
शृगाल बोला- “प्रिये ! नहीं जाना जाता कि, कव इन दोनोंका पतन होगा
वा नहीं । सो क्यों वृथा श्रममें मुझको नियुक्त करती है । यहीं पर स्थित हुआ
जलपानके निमित्त आये हुए मूपकोको तेरे साथ भक्षण करूगा कारण कि, यह
उनका मार्ग है । और यदि तुझको छोडकर इस तीक्ष्णशृङ्गवाले वृषके पीछे
जाऊगा तो, आनकर और कोई इस स्थानको ग्रहण कर लेगा, सो यह करना
उचित नहीं । कहा है-
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव च ॥ १४७ ॥”
जो विद्यमानको छोड़कर अविद्यमानका सेवन करता है उसके ध्रुव कार्य नष्ट
होते हैं और अध्रुव नष्ट हैं हीं ॥ १४७ ॥”
शृगाली आह- “भोः कापुरुषस्त्वं यत्किञ्चित् प्राप्तं तेनापि
सन्तोषं करोषि । उक्तञ्च-
शृगाली बोली,- “भो ! कापुरुष (डरपोक) तू जो कुछ प्राप्त हुआ है उसीसे
सन्तोष करता है । कहा है-