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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

भाषाटीकासमेतम् । (२१९)
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत् ।
विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥ ४५ ॥
अविश्वासीका विश्वास न करे, विश्वासीकाभी बहुत विश्वास न करे, कारण
कि, विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय मूलसहित नष्ट कर देता है ॥ ४५ ॥
न बध्यते ह्यविश्वस्तो दुर्बलोऽपि बलोत्कटैः ।
विश्वस्ताश्चाशु बध्यन्ते बलवन्तोऽपि दुर्बलैः ॥ ४६ ॥
अविश्वासी दुर्बलकोभी बलवान् बली नहीं बाध सक्ता, विश्वासी बलवान्भी
दुर्बलोंसे बाधलिये जाते हैं ॥ ४६ ॥
सुकृत्यं विष्णुगुप्तस्य मित्राप्तिर्भार्गवस्य च ।
बृहस्पतेरविश्वासो नीतिसन्धिश्चिधा स्थितः ॥ ४७ ॥
तीन प्रकारकी नीति सधी होती है चाणक्यका सम्यक् कार्यानुष्ठान करना,
परशुरामका मित्रलाभ और बृहस्पतिका मत है विश्वास न करना यह तीन
प्रकारकी नीतिसंधी है ॥ ४७ ॥
तथाच-
तैसेही-
महताप्यर्थसारेण यो विश्वसिति शत्रुपु ।
भार्यासु सुविरक्तासु तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ ४८ ॥"
बडे अर्थसार परभी शत्रु का जो विश्वास करता है और विरक्त भार्याका
जो विश्वास करता है उनके अन्ततक ही उसका जीवन है ॥ ४८ ॥”-
तच्छ्रुत्वा लघुपतनकोऽपि निरुत्तरः चिन्तयामास ।
"अहो ! बुद्धिप्रागल्भ्यमस्य नीतिविषये । अथवा स एव
अस्योपरि मैत्रीपक्षपातः”। स आह-“भो हिरण्यक !
यह सुन लघुपतनकभी निरुत्तरहो विचारने लगा, "अहो नीतिविषयमें
कितनी तीक्ष्ण इसकी बुद्धि है, अथवा वह इसपर मित्रताका पक्षपात है” और
बोला-"भो हिरण्यक !
सतां साप्तपदं मैत्रमित्याहुर्विबुधा जनाः ।
तस्मात्त्वं मित्रतां प्राप्तो वचनं मम तच्छृणु ॥ ४९ ॥