सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 233

(२१८) पञ्चतन्त्रम् ।
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना
छायेव मैत्री खलसज्जनानाम् ॥ ४० ॥
प्रारम्भमें बहुत फिर क्रमसे न्यून, पहले थोडी क्रमसे बढती हुई दिनके पूर्वार्द्ध
और परार्धसे भिन्न हुई छायाकी समान दुष्ट और भलोंकी मित्रता होती है॥४०॥
तत् साधुरहमपरं त्वां शपथादिभिर्निर्भयं करिष्यामि” ।
स आह,-“न मे अस्ति ते शपथैः प्रत्ययः । उक्तञ्च-
सो मै साधु हूं और तुझको शपथादिसे निर्भय करूंगा" वह बोला,-
"मुझे शपथका विश्वास नहीं है। कहाहै-
शपथैः सन्धितस्यापि न विश्वासं व्रजेद्विपोः ।
श्रूयते शपथं कृत्वा वृत्रः शक्रेण सूदतः ॥ ४१ ॥
शपथसे सन्धिका प्राप्त हुए शत्रुके विश्वासमें न जाय सुना जाता है कि,
शपथ करकेभी इन्द्रने वृत्रासुरको मार डाला ॥ ४१ ॥
न विश्वासं विना शत्रुुर्देवानापि सिद्धयति ।
विश्वासात्त्रिदशेन्द्रेण दितेर्गर्भो विदारितः ॥ ४२ ॥
विश्वासके बिना शत्रु देवताओंकोभी सिद्ध नहीं होता है, विश्वाससेही
इन्द्रने दितिका गर्भ नष्ट करादिया ॥ ४२ ॥
अन्यच्च-
औरभी-
बृहस्पतेरपि प्राज्ञस्तस्मान्नैवात्र विश्वसेत् ।
य इच्छेदात्मनो वृद्धिमायुष्यं च सुखानि च ॥ ४३ ॥
जो बुद्धिमान् अपनी बुद्धि, आयु और सुखकी इच्छा करे वह बृहस्पतिके
विश्वासमेंभी न जाय ॥ ४३ ॥
तथाच-
और देखो-
सुसूक्ष्मेणापि रन्ध्रेण प्रविश्याभ्यन्तरं रिपुः ।
नाशयेच्च शनैः पश्चात्प्लवं सलिलपूरवत् ॥ ४४ ॥
शत्रु बहुत सूक्ष्ममार्गसे भीतर प्रवेश कर शनैः २ नाश करे जिस प्रकार
जलका पूर शनैः २ भरकर नावको पूर्ण करता है ॥ ४४ ॥