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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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( २२० ) पञ्चतन्त्रम् ।
पंडित जन कहते हैं कि, सत्पुरुषोंकी सातपग संग चलनेसेही मित्रता होती
है इस कारण मित्रताको प्राप्त हुआ तू मेरा वचन सुन ॥ ४९ ॥
दुर्गस्थेनापि त्वया मया सह नित्यमेव आलापो
गुणदोषसुभाषितगोष्ठी कथाः सर्वदा कर्त्तव्या यद्येवं न
विश्वसिषि" । तच्छ्रुत्वा हिरण्यकोऽपि व्यचिन्तयत् ।
“विदग्धवचनोऽयं दृश्यते लघुपतनकः सत्यवाक्यश्च,
तद्युक्तमनेन मैत्रीकरणम् । परं कदाचित् मम दुर्गे चर-
णपातोऽपि न कार्य्यः । उक्तञ्च-
दुर्गस्थानमें स्थित हुएही तेरा मेरे साथ नित्यही वार्तालाप, गुणदोष सुन्दर
वचन गोष्ठीकी कथा सदा करनी चाहिये । जो इस प्रकार विश्वास नहीं करता
है तो" यह सुनकर हिरण्यक भी विचारने लगा । "चतुर वचनवाला यह
लघुपतनक दिखता है और सत्यवादी है सो इसके साथ मित्रता करना भला है,
परन्तु कभी मेरे दुर्गमें चरणभी न रखे. कारण कि,-
भीतभीतः पुरा शत्रुर्मन्दं मन्दं विसर्पति ।
भूमौ प्रहेलया पश्चाज्जारहस्तोऽङ्गनास्त्विव ॥ ५० ॥"
प्रथम भयभीत शत्रु भूमिमे मन्द मन्द चलता है पीछे लीलासे शीघ्रतासे
गमन करता है जैसे स्त्रियोंके अंगपर जारका हाथ ॥ ५० ॥”
तच्छ्रुत्वा वायस आह-“भद्र ! एवं भवतु" । ततः
प्रभृति द्वौ तौ अपि सुभाषितगोष्ठी सुखमनुभवन्तौ
तिष्ठतः । परस्परं कृतोपकारौ कालं नयतः । लघुपत-
नकोऽपि मांसशकलानि मेध्यानि बलिशेषाणि
अन्यानि वात्सल्याहृतानि पक्वान्नविशेषाणि हिरण्य-
कार्थमानयति । हिरण्यकोऽपि तण्डुलान् अन्यांश्च
भक्ष्यविशेषान् लघुपतनकार्थं रात्रौ आहृत्य तत्का-
लाया तस्य अर्पयति । अथवा युज्यते द्वयोरपि एतत् ।
उक्तञ्च-
यह सुन काक बोला- "भद्र ! ऐसाही हो" उस दिनसे लेकर वे दोनों
सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुभव करते स्थित रहे, लघुपतनक भी मांसखण्ड पवित्र