सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 229

( २१४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

का त्वया सह मम मैत्री तत् गम्यतां, मैत्री विरोधभावात्
कथम् ? उक्तञ्च-
ऐसा विचार वृक्षसे उतर कर बिलके द्वारे आय चित्रग्रीवकी समान शब्द
करके हिरण्यकको बुलाता हुआ "आओ २ भो हिरण्यक ! आओ"। उस
शब्दको सुनकर हिरण्यक विचार करने लगा "क्या और कोई कबूतर बंधा
रहगया, जिससे मुझे बुलाता है"। और बोला-"भो ! आप कौन हो ?" ।
वह बोला-"मैं लघुपतनक नाम काकहूं" । यह सुन अन्तर लीन होकर हिर-
ण्यक बोला-"भो ! इस स्थानसे बहुत शीघ्र गमन करो" काक बोला,-"बड़े
कार्यकेलिये तुम्हारे पास आया हू, फिर मुझे दर्शन क्यों नहीं देते हो" ।
हिरण्यक बोला-"तुम्हारे साथ मिलनेसे मेरा कुछभी प्रयोजन नहीं है"।
काक बोला,-"चित्रग्रीवका मैने तुमसे पाशमोक्षण देखा है उस कारण
मुझको बड़ी प्रीति हुई है, सो कदाचित् मेरा बंधन होनेसे तुम्हारे निकटसे
छुटकारा होगा, सो मेरे साथ मित्रता करो" । हिरण्यक बोला-"भो ! आश्चर्य
है कि, तू मेरा भोजन करनेवाला और मैं तेरा भोज्य पदार्थ हूं । सो कैसी
तुम्हारे साथ मेरी मित्रता ? सो जाओ विरोधभावसे मित्रता कैसी ? कहा है-
ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं कुलम् ।
तयोर्मैत्री विवाहश्च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ ३० ॥
जिनका समान धन, जिनका समान कुलहो उन्हीकी मित्रता और विवाह
होना उचित है विरुद्धका नहीं ॥ ३० ॥
तथाच-
और देखो-
यो मित्रं कुरुते मूढ आत्मनोऽसदृशं कुधीः ।
हीनं वाप्यधिकं वापि हास्यतां यात्यसौ जनः ॥ ३१ ॥
जो मूढ कुबुद्धि अपने असदृश मित्रोंको करता है हीन वा अधिक करता:
है वह हास्यताको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥
· तत् गम्यताम्"इति । वायस आह,-"भो हिरण्यक !
एषोऽहं तव दुर्गद्वारे उपविष्टः । यदि त्वं मैत्रीं न करोषि
ततोऽहं प्राणमोक्षणं तवाग्रे करिष्यामि । अथवा प्रायोपवे-