पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १८५ )
बुद्धिमान् अपना थोडा धनभी किसीको न दिखावे कारण कि, उसके दर्श-
नसे मुनिकाभी मन चलायमान होजाता है ॥ १४३ ॥
तथाच-
तैसेही-
यथामिषं जले मत्स्यैर्भक्ष्यते श्वापदैर्भुवि ।
आकाशे पक्षिभिश्चैव तथा सर्वत्र वित्तवान् ॥१४४॥”
जैसे मांस जलमें मच्छोंसे, पृथ्वीमें सिंहादि हिंसकोंसे, आकाशमें पक्षियोंसे
खाया जाता है इसी प्रकार सर्वत्र धनवान खाया जाता है ॥ १४४ ॥”
तदाकर्ण्य धर्मबुद्धिः प्राह,-"भद्र ! एवं क्रियताम्”। तथा
अनुष्ठिते द्वावपि तौ स्वगृहं गत्वा सुखेन संस्थितवन्तौ ।
अथ अन्यस्मिन्नहनि पापबुद्धिर्निशीथेऽटव्यां गत्वा तत् सर्वं
वित्तं समादाय गर्तं पूरयित्वा स्वभवनं जगाम । अथ अन्ये-
द्युः धर्मबुद्धिं समभ्येत्य प्रोवाच,-"सखे ! बहुकुटुम्बा वयं
वित्ताभावात् सीदामः । तद्गत्वा तत्र स्थाने किञ्चिन्मात्रं
धनमानयावः”। सोऽब्रवीत,-"भद्र ! एवं क्रियताम्”। अथ
द्वावपि गत्वा तत् स्थानं यावत् खनतस्तावत् रिक्तं भाण्डं
दृष्टवन्तौ । अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् प्रोवाच-“भो
धर्मबुद्धे ! त्वया हृतमेतद्धनं न अन्येन, यतो भूयोऽपि गर्त्ता-
पूरणं कृतं, तत् प्रयच्छ मे तस्यार्द्धं, अथवा अहं राजकुले
निवेदयिष्यामि”। स आह,-“भो दुरात्मन् ! मैवं वद,
धर्मबुद्धिः खलु अहम् । न एतच्चौरकर्म करोमि । उक्तञ्च-
यह सुनकर धर्मबुद्धि कहने लगा,-"भद्र ! ऐसाही करो” ऐसा अनुष्ठान
करनेपर वे दोनोंही अपने घर जाकर सुखसे स्थित हुए । तत्र किसी और दिन
पापबुद्धि अर्धरात्रमें जाकर उस सब धनको ले गड्ढेको पूर्ण कर अपने घर
आया । फिर दूसरे दिन धर्मबुद्धिसे मिलकर बोला,-“सखे ! हम बहुत कुटु-
म्बी हैं इस कारण धनके अभावसे दुःखी होते हैं । सो चलकर उस स्थानसे
कुछ धन लावें” । वह बोला,-“भद्र ! ऐसाही करो” । तब दोनोंही जाकर
जब उस स्थानको खोदने लगे तब वहां बर्तन रीता देखा । तब वह पापबुद्धि