पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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शिरपीटता हुआ बोला,-"भो धर्मबुद्धे ! तैनेही यह मेरा धन हरलिया है किसी
औरने नहीं। जो फिरभी गड्ढा भरदिया सो उसका आधा मुझे दे नहीं तो मैं
राजकुलमें निवेदन करूंगा"। वह बोला,-"भो दुरात्मन् ! ऐसा मत कह ।
निश्चयही मैं धर्मबुद्धि हूं यह चोर कर्म नहीं करता हूं। कहाहै-
मातृवत्परदाराणि परद्रव्याणि लोष्ठवत् ।
आत्मवत्सर्वभूतानि वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः ॥ ४३५ ॥”
माताकी समान पराई स्त्री, मट्टीकी समान पराया धन, आत्माकी समान सब
प्राणियोंको धर्मबुद्धि देखते हैं ॥ ४३५ ॥”
एवं द्वावपि तौ विवदमानौ धर्माधिकारिणं गतौ प्रो-
चतुश्च परस्परं दूषयन्तौ । अथ धर्माकरणाधिष्ठित-
पुरुषैः दिव्यार्थे यावत् नियोजितौ तावत् पापबुद्धिः
आह,-“अहो ! न सम्यग्दृष्टोऽयं न्यायः । उक्तञ्च-
इस प्रकार वे दोनोंही झगडा करते हुए धर्माधिकारीके पास जाकर बोलते
हुए परस्पर दूषण देनेलगे । तब धर्माधिकारीसे नियुक्त हुए पुरुषोंने ज्यों ही
शपथके निमित्त उसको नियुक्त किया, तबतक पापबुद्धि बोला,-"आश्चर्य है
कि, भलीप्रकार न्याय नहीं हुआ । कहा है-
विवादेऽन्विष्यते पत्रं तदभावेऽपि साक्षिणः ।
साक्ष्यभावात्ततो दिव्यं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ४३६ ॥
विवादमें पहले पत्र ( लेख ) देखा जाता है, उसके अभावमें साक्षी, साक्षीके
अभावमें शपथ करनी ऐसा बुद्धिमानोंने कहा है ॥ ४३६ ॥
तदत्र विषये मम वृक्षदेवताः साक्षिभूताः तिष्ठंति ।
ता अपि आवयोः एकतरं चौरं साधुं वा करिष्यन्ति” ।
अथ तैः सर्वैः अभिहितम्-“भोः ! युक्तमुक्तं भवता ।
उक्तञ्च-
सो इस विषयमें वृक्षदेवता हमारे साक्षी हैं वही हम दोनोंमें एकको चोर
या साधु करेंगे" तब उन सबने कहा-"भो ! आपने सत्य कहा । कहा है-
अन्त्यजोऽपि यदा साक्षी विवादे सम्प्रजायते ।
न तत्र विद्यते दिव्यं किं पुनर्यत्र देवताः ॥ ४३७ ॥