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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( १८४ ) - पञ्चतन्त्रम् ।
विद्या धन कारीगरी तवतक मनुष्य अच्छी तरह प्राप्त नहीं करता है जब-
तक प्रसन्न हुआ देश देशान्तरकी भूमिमें नहीं जाता है ॥ ४३१ ॥”
अथ तस्य तद्वचनमाकर्ण्य प्रहृष्टमनाः तेनैव सह गुरु-
जनानुज्ञातः शुभे अहनि देशान्तरं प्रस्थितः । तत्र च धर्म्म-
बुद्धिप्रभावेण भ्रमता पापबुद्धिना प्रभूततरं वित्तमासादितम्।
ततश्च द्वावपि तौ प्रभूतोपार्जितद्रव्यौ प्रहृष्टौ स्वगृहं प्रति
औत्सुक्येन निवृत्तौ । उक्तञ्च-
तब उसके इस वचनको सुनकर उसीके संग गुरुजनोंकी आज्ञा लेकर
सुन्दर दिनमें देशान्तरको गया वहां धर्मबुद्धिके प्रभावसे भ्रमते हुए पापबुद्धिने
बहुतसा धन प्राप्त किया । तब दोनोंही बहुत धनके उपार्जनसे प्रसन्न हुए अपने
घरके प्रति उत्कंठासे निवृत्त हुए । कहा है-
प्राप्तविद्यार्थशिल्पानां देशान्तरनिवासिनाम् ।
क्रोशमात्रोऽपि भूभागः शतयोजनवद्भवेत् ॥ ४३२ ॥”
प्राप्तविद्या धन और कारीगरीवाले देशान्तरमें निवास करनेवालोंको एक
कोशमात्र पृथ्वी सौयोजनकी समान होती है (अर्थात् जब सिद्धकार्य हो निज-
स्थानमें आते हैं तब एक कोश सौ योजनसा बीतता है) ॥ ४३२ ॥”
अथ स्वस्थानसमीपवर्त्तिना पापबुद्धिना धर्म्मबुद्धिरभि-
हितः,-“भद्र ! न सर्व्वमेतद्धनं गृहं प्रति नेतुं युज्यते, यतः
कुटुम्बिनो बान्धवाश्च प्रार्थयिष्यन्ते । तदत्र एव वनगहने
क्वापि भूमौ निक्षिप्य किञ्चिन्मात्रमादाय गृहं प्रविशावो
भूयोऽपि प्रयोजने सञ्जाते तन्मात्रं समेत्य अस्मात् स्थानात्
नेष्यावः । उक्तञ्च-
तब अपने स्थानके समीपवर्ती पापबुद्धिने धर्मबुद्धिसे कहा-“भद्र ! यह सब
धन घर लेजाना उचित नहीं है क्यों कि, कुटुम्बि और बन्धु उसकी प्रार्थना
करेंगे । सो इसी बनगहनमें कहीं पृथ्वीमें गाड़कर उसमेंसे कुछ लेकर घरको
जांय, कि, फिरभी प्रयोजन होनेपर उतनाही परस्पर मिलकर इस स्थानसे
लेजायेंगे । कहा है-
न वित्तं दर्शयेत्प्राज्ञः कस्यचित्स्वल्पमप्यहो ।
मुनेरपि यतस्तस्य दर्शनाच्चलते मनः ॥ ४३३ ॥