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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम्। ( १८३ )
धर्मबुद्धि और कुबुद्धि इन दोनोंको मैने जाना पुत्रकी वृथा पंडिताईसे पिता
धूमसे घातित हुआ ॥ ४२९ ॥”
दमनक आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत-
दमनक बोला,-“यह कैसी कथा है?” वह बोला-
कथा १९.
कस्मिंश्चिदधिष्ठाने धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रति-
वसतः स्म। अथ कदाचित् पापबुद्धिना चिन्तितम्, अहं
तावत् मूर्खो दारिद्योपेतश्च। तदेनं धर्मबुद्धिमादाय देशा-
न्तरं गत्वा अस्य आश्रयेण अर्थोपार्जनं कृत्वा एनमपि वंच-
यित्वा सुखी भवामि। अथ अन्यस्मिन् अहनि पापबुद्धिः
धर्मबुद्धिं प्राह--“भो मित्र ! वार्द्धकभावे किं तमात्मविचे-
ष्टित स्मरसि । देशान्तरमदृष्ट्वा कां शिशुजनस्य वार्त्ता
कथयिष्यसि। उक्तञ्च-
किसी एक स्थानमें धर्मबुद्धि और पापबुद्धि दो मित्र रहते थे । तब कदा-
चित् पापबुद्धिने विचार किया मैं मूर्ख और दरिद्र हूं सो इस धर्मबुद्धिको लेकर
देशान्तर जाकर इसके आश्रयसे धन उत्पन्नकर इसको भी वंचित कर सुखी
हूगा फिर और एक दिन पापबुद्धि धर्मबुद्धिसे बोला-“भो मित्र ! वृद्धावस्थामें
क्या अपनी चेष्टाको स्मरण करोगे देशान्तरको बिना देखे बालकोंसे क्य
वार्त्ता कहैगा । कहा है-
देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम् ।
भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम् ॥ ४३० ॥
जिसने देशान्तरोंमे बहुत भाषावेषादि नहीं जाना है पृथ्वीतलमे घूमते हुए
उसका जन्म वृथा गया ॥ ४३० ॥
तथाच-
तैसेही-
विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक् ।
यावद्व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः ॥ ४३१ ॥”