सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 197

( १८२ ) पञ्चतन्त्रम् !
सो हे मूर्ख ! सिखाया हुआ भी तू न सीखा । अथवा तेरा दोष नहीं है साधुमें
शिक्षा गुणके निमित्त होतीहै असाधुमें नहीं। कहाहै-
किं करोत्येव पाण्डित्यमस्थाने विनियोजितम् ।
अन्धकारप्रतिच्छन्ने घटे दीप इवाहितः ॥ ४२५ ॥
अनुचित स्थानमें लगाई पंडिताई क्या कर सकतीहै जैसे अंधकारसे पूर्ण
घडेके ऊपर धरा हुआ दीपक (उसके भीतरका अंधकार दूर नहीं कर
सकता) ॥ ४२५ ॥
तद्व्यर्थपाण्डित्यमाश्रित्य मम वचनमशृण्वन् न आत्मनः
शान्तिमपि वेत्सि, तन्नूनमपजातः त्वम् । उक्तञ्च-
सो वृथा पांडित्यका आश्रय कर मेरे वचन न सुने न अपनी शान्तिको भी
जाना सो अवश्यही तू विजातीयहै। कहा है-
जातः पुत्रोऽनुजातश्च अतिजातस्तथैव च ।
अपजातश्च लोकेऽस्मिन्मन्तव्याः शास्त्रवेदिभिः ॥ ४२६ ॥
इस संसारमें शास्त्रके जाननेवाले जात, अनुजात, अतिजात और अपजात
यह चार प्रकारके पुत्र कहते हैं ॥ ४२६ ॥
मातृतुल्यगुणो जातस्त्वनुजातः पितुः समः ।
अतिजातोऽधिकस्तस्मादपजातोऽधमाधमः ॥ ४२७ ॥
माताके तुल्य गुणवाला जात, पिताके तुल्य गुणवाला अनुजात, पितासे
अधिक अतिजात और अपजात अधमाधम कहाता है ॥ ४२७ ॥
अप्यात्मनो विनाशं गणयति न खलः परव्यसनहृष्टः ।
प्रायो मस्तकनाशे समरमुखे नृत्यति कबन्धः ॥ ४२८ ॥
पराये दुःखसे प्रसन्न हुआ दुष्ट अपने नाशको नहीं गिनताहै प्रायः मस्तकके
नाश होनेमेंभी कबन्ध समरमें नृत्य करता है॥ ४२८ ॥
अहो ! साधु चेदमुच्यते ।
अहो ! यह सत्य कहा है कि-
धर्मबुद्धिः कुबुद्धिश्च द्वावेतौ विदितौ मम ।
पुत्रेण व्यर्थपाण्डित्यात्पिता धूमेन घातितः ॥ ४२९ ।