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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 726 में से

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पृष्ठ 79

वासनायां प्रवृद्धायां, वियतसत्यत्ववादिनम् ।
सन्मात्रबोधमुक्तं च दृष्ट्वा विस्मयते बुधः ॥७६॥
[जो सदा आकाश को मिथ्या भाव से तथा सत् को वस्तु
भाव से चिन्तन किया करता है तो इस चिन्तन से यह होता
है कि] इस वासना के अत्यन्त बढ़ जाने पर आकाश और सत्
के तत्व को समझ लेने वाला वह बुध, फिर जब कभी किसी
ऐसे पुरुष को देखता है, जो आकाश को तो सत्य मानता हो
और उसे आकाशरहित सद्वस्तु का बोध बिलकुल भी न हो,
तब उसे बड़ा ही आश्चर्य होने लग पड़ता है [कि ओहो इसे
सर्वभासक, सर्वाधिष्ठान, सर्वाधार, सत् का तो ज्ञान नहीं है,
किन्तु यह अपने अज्ञान के कारण, भास्य, अधिष्ठेय किंवा आधेय
पदार्थों को ही जान रहा है ।
एवमाकाशमिथ्यात्वे तत्सत्यत्वे च वासिते ।
न्यायेनानेन वाय्वादेः सद्वस्तु प्रविविच्यताम् ॥७७॥
इस प्रकार जब आकाश का मिथ्यापन तथा सत् का सत्यपन
भले प्रकार जी में बैठ जाय, तब फिर इसी न्याय से वायु
आदि शेष भूतों में से भी सद्वस्तु को पृथक् कर लेना चाहिये ।
सद्वस्तुन्येकदेशस्था माया, तत्रैकदेशगम् ।
वियत् तत्राप्येकदेशगतो वायुः प्रकल्पितः ॥७८॥
माया सद्वस्तु में उसके किसी एक देश में ही पड़ी हुई है।
उस माया के किसी एक देश में यह आकाश रह रहा है । उस
आकाश के किसी एक देश में इस वायु की कल्पना हो गयी है
[यों इस वायु का भी सत् के साथ परम्परा से सम्बन्ध है।
इससे इसका विवेचन भी कर ही डालना चाहिये ।]