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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 726 में से

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पृष्ठ 78

६० पञ्चदशी
अप्रमत्तो भव ध्यानादाद्ये ऽन्यस्मिन् विवेचनम् ।
कुरु प्रमाणयुक्तिभ्यां, ततो रूढतमो भव ॥७३॥
यदि इस अरूढि का कारण अनेकाग्रता हो, तब तो [प्रत्यय
की एकाकारता रूपी] 'ध्यान' की सहायता से अपने मन को
सावधान कर लो। यदि कोई संशय रह गया हो तो प्रमाण
और युक्ति के द्वारा उस का विवेचन कर डालो। यों दोनों
रुकावटों को हटा कर रूढतम हो जाओ।
ध्यानान्मानाद्युक्तितोऽपि रूढे भेदे वियत्सतोः ।
न कदाचिद् वियत्सत्यं सद्वस्तु छिद्रवन्न च ॥७४॥
ध्यान [प्रत्यय की एकतानता] से मान [६७ श्लोक में कहे
गये] से तथा ६८ वें श्लोक में कही हुई युक्ति से, जब आकाश
और सत् का भेद चित्त में भले प्रकार जम जाय, तब फिर यह
आकाश कभी भी सत्य नहीं रहता [फिर तो यह सदा ही
मिथ्या भासा करता है] तब यह भी ज्ञात हो जाता है कि सद्वस्तु
में छिद्र [अर्थात् आकाश नाम की भी कोई वस्तु] है ही नहीं।
ज्ञस्य भाति सदा व्योम निस्तत्त्वोल्लेखपूर्वकम् ।
सद्वस्त्वपि विभात्यस्य निश्चिद्रत्वपुरःसरम् ॥७५॥
[जिस प्रकार किसी दुष्ट के याद आ जाने पर उसके दुर्गुण
याद आ जाते हैं इसी प्रकार] ज्ञानी पुरुष को व्यवहार में जब
आकाश की प्रतीति होती है तब उसे आकाश की निस्तत्वता
का परिज्ञान भी उस के साथ ही साथ हुआ करता है तथा
जब उस ज्ञानी को सद्वस्तु का विभान होता है तभी उसे यह
ज्ञान भी साथ ही हो जाता है कि सद्वस्तु में आकाशादि नाम
की कोई भी वस्तु नहीं होती।