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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

६२ पाकदर्पणम्
लालस्राव, रक्तविकार तथा क्रिमिरोग को नाश करता है। बड़ा नेनुआ का फल
वीर्यवर्द्धक, विषनाशक तथा मधुर होता है ॥ ४३३ ॥
पटोलफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पटोलस्य फलं सम्यगाहरेत् सूदकोविदः ।
सम्भारादीन् विनिक्षिप्य तत्पचेत्पूर्ववत्पुनः ॥ ४३४ ॥
वासयित्वा पुनस्तच्च वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ।
उष्णवीर्यकरं स्वादु त्रिदोषघ्नं विपाकतः ॥ ४३५ ॥
परवल के फलका शाक बनाने की विधि तथा गुण-विद्वान् पाचक परवल
के फल को अच्छी तरह लेकर तथा सम्भारादि (मसाला-नमक आदि) छौंकर
पूर्ववत् पकावे और सुगन्धित द्रव्य कर्पूर आदि से सुगन्धित कर तथा पूगपट्ट नेत्र
से वेष्टित कर खाने के लिये दे । यह उष्णवीर्य, विपाक में मधुर तथा त्रिदोष
नाशक है ॥ ४३४-४३५ ॥
बिम्बफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
प्रयत्नेन समादाय बिम्बस्य तरुशं फलम् ।
शलाकया पुनः सम्यक् छिन्द्यात्तच्च समन्ततः ॥ ४३६ ॥
निधाय प्रवणीभाण्डे सिञ्चेत्तत् जलं बुधः ।
पक्त्वा तच्च पुनः सम्यक् सर्पिषा च पुनः पचेत् ॥ ४३७ ॥
धूपयेद्धिङ्गुना तच्च वासयेत्कर्पूरादिभिः ।
वेष्टयित्वाथ नेत्रेण दापयेद्भोजनार्थिने ॥ ४३८ ॥
इदं बिम्बफलं वृष्यं चक्षुष्यं वातपित्तजित् ।
हितं कृच्छ्रहरं पथ्यं शुक्रदं कामलादिजित् ॥ ४३९ ॥
पित्तरक्तक्षयश्वासतृष्णाकासनिवारणम् ॥ ४४० ॥
बिम्ब फल (कुन्दरु फल) का शाक बनाने की विधि तथा गुण-बुद्धिमान्
पाचक बिम्ब (कुन्दरु) फल का तरुण फल प्रयत्न पूर्वक लेकर उसको चारों
तरफ से शलाका द्वारा अच्छी तरह काट दे और बटलोही में रखकर जल छोड़ दे
उसको अच्छी तरह पकाकर पुनः घी के साथ पकावे और हींग का छैंक देकर
धूपित कर ले । इसके बाद कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्य से सुगन्धित बना ले ।
इसको पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर भोजन करने वाले के लिये दे । बिम्ब फल
(कुन्दरु फल पाक) वीर्यवर्द्धक, नेत्र के लिये हितकर तथा वात पित्त को जीतने
वाला है और यह मूत्र कृच्छ्र के लिये हितकर, पथ्य, शुक्रप्रद, कामला रोग को
नलविरचितम् ६३
जीतने वाला तथा रक्त पित्त, क्षय रोग श्वास वृद्धि, प्यास एवं कास (खाँसी)
को दूर करने वाला है ॥ ४३६-४४० ॥
कोकान्दोलफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पूर्ववद् विपचेद्विद्वान् क्रोकान्दोलफलं नवम् ।
श्लेष्मपित्तहरं स्वादु स्निग्धं रुचिकरं परम् ।
स्वेदनं गुरु वृष्यं च वह्निमान्द्यकरं परम् ॥ ४४१ ॥
कोकान्दोल फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण-नवीन कोकान्दोल
फल को लेकर विद्वान् पाचक पूर्ववत् पकावे और भोजन में प्रयोग करे । यह
कफ-पित्त को दूर करने वाला, स्वादिष्ट, स्निग्ध, उत्तम रुचिकारक, स्वेदन करने
वाला, गुरु, वीर्यवर्द्धक तथा मन्दाग्नि कारक होता है ॥ ४४१ ॥
कलिङ्गफलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
फलान्यादाय रम्याणि कलिङ्गस्य नवान्यथ ।
शोधनं छेदनं पाकं पूर्ववद्विपचेद्बुधः ॥ ४४२ ॥
योगं च मरिचादीनां कुर्यात्तेषां ततः पुनः ।
पाकं कृत्वा घृतेनैव भर्जयेद्रामठेन च ॥ ४४३ ॥
वासयेद्धनसारेण बद्ध्वा नेत्रेण दापयेत् ।
कलिङ्गस्य फल छेद्यं सर्पिषा तच्च भर्जयेत् ॥ ४४४ ॥
वासयित्वा ततस्तच्च वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ।
हृद्यं कफजदोषघ्न दीपनं ग्राहिरोचनम् ॥ ४४५ ॥
कलिग (बहेड़ा) फल का पाक बनाने की विधि तथा गुण-सुन्दर एवं
नवीन बहेड़ों के फल को लेकर शोधन करे, काट ले तथा पूर्ववत् फल पाक विधि
के अनुसार पकावे और उसमें मरिच, धनिया, चातुर्जात के चूर्ण मिला दे । पुनः
घृत के साथ पकाकर हींग के साथ भून ले । इसके बाद कर्पूर से सुगन्धित कर
तथा पूगपट्ट नेत्र से बाँधकर खाने के लिये दे । कलिंग के फल को लेकर काट ले
तथा उसको घी में भून ले । इसके बाद कर्पूर से सुगन्धित कर तथा पूगपट्ट नेत्र
से आवेष्टित कर दे । यह हृदय को बल देने वाला, कफज दोष को नाश करने
वाला जाठराग्नि दीपक, ग्राही तथा रुचिकारक होता है ॥ ४४२-४४५ ॥
कुबेराक्षिपर्णपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
समादाय कुबेराख्याः पर्णं सुतरुणं नवम् ।
तत्तिक्तमोचनं कुर्यात् कुण्डलीचूर्णयोगतः ॥ ४४६ ॥