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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 258

पद्मावत । ३५७
दैके दर्शन जो राखत जीउ। सोकसे आवहिंभोसकपीउ ॥
दो० अबहूँ जून्हरै साँजके, कीन्ह चहूँ उजियार।
होरी खेलों रन कठिन, कोउन समेटहिद्वारै ॥
अन राजा सो जरै नियानों। बादशाह की सेवै न माना ॥
बहुताहिंग्रसगढ्कीन्हसँजोना। अंत भई लंका जस रवना ॥
जेहि दिन वह छैके गढ़घाटी। होय अब ओही दिन माटी॥
तू जानेसि जल चुवै पहारू। वह रोवै मन सँवर संहारू ॥
सोतंहि सोत ऐस गढ़ रोवा। कस होइहै जो होइहै धुवा ॥
सँवर पहाड़ सो ढारै आंसू। पै तोहि सूझ न आपन नाशू ॥
आज काल्ह चाहे गढ़ टूटा। अबहुँ मान जो चाहस छूटा ॥
दो० है जो पाँच नग तोसों, लै पांचों कर भेंट।
मरुँ सो एकगुन मानै, सब औगुनकर मेट॥
अन सुरजा को भेदे पारा। बादशाह बड़ अहै हमारा ॥
औगुन मेट सकहि पुनि सोई। औजो कीन्ह चहै सो होई ॥
नग पांचों का देउँ भँडारों। इसकन्दर सो वाचै दारों ॥
जो यह वचन तुहिं माथे मोरे। सेवैं करों ठाढ़ करें जोरे ॥
पै बिन सेसैं न असमनमाना। सत बोल बाचोंपरमाना ॥
कीन्हजो गुरुँलीन्हजगभारू। तेहिक बोल नहिं टरै पहारू॥
नायन मांझ भँवर इत ग्रीवा। सुरजहिं कहां सुन्द भईजीवा॥
दो० सुरजैं सतकीन्ह छल, बैनहिं मीठी मीठ ।
राजा कर मन माना, मानी तुरत बसीठं ॥
.. क्या किसी को मुँह दिखावेंगे १ मौत २ राख ३ आखिर ४ खिदमत ५-
१३ नाश ६ सूराख ७ शायद ८ सच है ६ खज़ाना १० नाम बादशाह ११-१२
हाथ १४ क़सम १५ मज़बूत १६ भारी १७ नामपहलवान १८ वात १६
क़ासिद २०॥