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सर्वकोश
पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

१६८ पद्मावत ।
बहुतैं आय गये शिर मारा । हाथ न रहा झूठ संसारा ॥
जोपै जगतै होत थिरैं मायौँ । सैंततें सिद्धि न पावत राँयौँ ॥
सिद्धै द्रव्य न सैंता गाड़ा । देखा भार चूँव कै छाड़ा ॥
पानी की पानी महँ गई । तुइँ जो जिया कुशल सब भई ॥
दो० जाकर दीन्ह जीव औ कायाँ, लेहि चाह जब चाव।
धन लक्ष्मी सब ताकर, लिये तो का पछताव ॥
अनपाँड़ैं पर कहि का हानी । जो पाऊँ पद्मावत रानी ॥
तेंपं के पावा मिलके फूला । पुनि तेहि खोइ सोई पँथै भूला ॥
पुरुषन आपन नारि सराहाँ। मुये गँये सँवरा पै चाहा ॥
कहँ अस नारि जगत उपराहीं। कहँ अस जीव मिलन सुख द्याहीं॥
कहँ अस रहस भोग अब करना । ऐसे जिये चाहि भल मरना ॥
जहँ अस परी समुद्र नगदियाँ । तेहि किम जिया चहै मरजिया ॥
जस ये समुद्र दीन्ह दुख मोको । दै हंत्या भगरों शिवलोकों ॥
दो० का मैं यहिक नशावा, का मैं सँवरा दांव ।
जाय स्वर्ग पर होयहै, यहिकर मोर नियाव ॥
जो तु मुवा कित रोवस खरा । नामुएँ मरै न रोवै मरा ॥
जो मर भा औ छांड़ेसि कार्याँ। बहुर्र न करै मरन की दाया ॥
जो मर भयो न बूड़े नीराँ । बहत जाय लागे पै तीराँ ॥
तुहौं एक मैं वावर भेटाँ । जैस राम दशरथ कर बेटा ॥
वहूँ नारि कर पड़ा बिछोवाँ । वही समुद्र महँ फिरि फिरि रोवा ॥
दुनियाँ १ क़ायम २ दौलत ३ फ़क़ीर जमा न करता ४ राजा ५ खैरियत ६ बदन ७-१८ पेन्नाहाण ८ नुक़सान ६ मेहनतसे १० राह ११ तारीफ १२ मरन पीछे १३ जवाहरचिरागकी तरह रौशन १४ ईश्वर के सामने १५ आसमान १६ हिलना १७ फिर १८ पानी २० किनारा २१ मुलाक़ाते २२ जुदाई २३ ॥