पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 198, कुल 318 में से
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कहिके उठा समुद्रमहँ आवा । काढ़ि कटार ग्रीवै लै लावा ॥
कहा समुद्र पाप अब घटा । ब्राह्मण रूप आय परगटा ॥
तिलक दुवादश मस्तक दीन्हे । हाथ कनकबैशाखी लीन्हे ॥
मुद्राश्रवणैं जनेऊ कांधे । कनकपत्रै धोती तरिबांधे ॥
पांवरे कनक जड़ाऊ पाऊँ । दीन्ह अशीशआयतेहिठाऊँ ॥
कहो कुँवर मोसे संत बाता । काहे लागकरेसि अपघाताँ ॥
परहेसि मरेसिकिकौनैलाजा । आपन जिव देइसकेहिकाजा ॥
दो० जन कटार गर लावसि, समझदेख मन आप ।
सकत जीव जो काढ़ेसि, महादोष औ पाप ॥
को तुम उतरैं देइ हो पांडे । सो बोलै जाकर जिवभांडे ॥
जम्बूदीप केर हौं राजा । सो मैं कीन्ह जो करतनछाजौ ॥
सिंहलदीप राज घर बारी । सो मैं जाय विवाही नारी ॥
लख बोहितैं दायज ते भरी । नग अमोल औसबनिरेमरी ॥
रतन पदारथ माणिक मोती । हती न खांगीसम्पैतित्योती ॥
चहल घोड़ हस्ती सिंहली । औसँग कुँवर लाख दुइवली ॥
तेहि गोहनैं सिंहल पद्मिनी । इक सो एक चाह रुपमनी ॥
दो० पद्मावत जग रूप मन, कहाँलग कहूँ उहेल ।
ते समुद्र महँ खोयौ, हौं का जियोँ अकेल ॥
हँसा समुद्र होय उठा अजूरा । जगजोवूडसवकहिकहिमोरा ॥
तोर होय तोहि परै न बेरा । बूझ विचार तुहीं कहु केरा ॥
हाथ मरोर धुनै शिर मांखी । पैतोहिहिये न उघरेआंखी ॥
फुटनोट / शब्दार्थ:
गर्दन १ ज़ाहिर २ सोने की लाठी ३ कानमें वाली ४ सोनेकी पंटरी ५
खड़ाऊं ६ खुदकुशी ७ निन्दासे हँसी ८ पाप ६ जवाब १० बदन में जान
११ सज़ावार १२ नाव १३ साफ़ १४ दौलत १५ हाथी १६ साथ १७ रो-
शनी १८ तेरेपास रहती १६ दिल २० ॥