पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 183, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१८२ पद्मावत ।
जहां न रहन भयो निज चालू । होत हि कस न तहां भा कालू ॥
नैहर आय काहि सुख देखा । जनु है गयो स्वपन कर लेखा ॥
राखत पार सो पिता निछोहों । कित विवाह के दीन्ह विछोहों ॥
दो० हिये ३ आय दुख बाजों, जिव जानहु गाछेक ।
मन तेवान के रोवै, हर मँडार कर टेकें ॥
पुनि पद्मावत सखी बोलाई । सुनि के गवन मिलीं सब आई ॥
मिलहु सखी हम तहँवां जाहीं । जहां जाय पुनि आवन नाहीं ॥
सात समुद्र पार वह देशू । कित रे मिलन कित आव सँदेशू ॥
अगम पंथ परदेश सिधारी । न जनो कुशल कि विथाँ हमारी ॥
पितौ नेछोहैं कीन्ह हियँ माहां । तहँ को हम राखै गहि बाहां ॥
हम तुम एक मिले सँग खेला । अन्त विछोहें आन गेयें मेला ॥
तुम अस हितू सँगात पियारा । जियत जीव नहिं करौं निरारों ॥
दो० कन्त चलाई का करौं, आयसु जाय न मेट ।
पुनि हम मिलहिं कि ना मिलैं, लेहु सहेली भेट ॥
धनिं रोवंत रोईं सब सखी । हम तुम देख आप कहँ झखी ॥
तुम ऐसी जहँ रही न पाहीं । पुनि हम काहि जो आहि पराहिं ॥
आदि पितौ जो रहा हमारा । वहूँ न यहि दिन हिये विचार ॥
छोहूँ न कीन्ह निछोहों ओहूं । का हम दोष लगाइक गोहूँ ॥
मँकुँ गोहूँ कर हिया चरानों । पै सो पिता न हिये छोहानों ॥
औ हम देखा सखी सरेखे । यहि नैहर पाहुन कर लेखे ॥
तब तेंहि पिय नैहर ना चाहा । जेहि ससुरार अधिक होय लाहा ॥
बेदर्द १ जुदाई २-१० दिल ३ पहुँचा ४ ईश्वर का नाम, ले ठीक करके ५
मुश्किल राह ६ दुख सुख का हाल ७ बेमेहरी ८ दिल ६-१६ गरदन में डाला
११ अलग १२ हुक्म १३ पद्मावत १४ आदम १५ मेहरवानी १७ बेदर्दी १८
पाप १६ शायद २० छाती फटी २१ मेहरवान २२ बहुत फ़ायदा २३ ॥