पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपद्मावत १७७
हौं राजा सोई ओ योगी। जेहिकारण वह ऐसो वियोगी ॥
जस तू पंखी^१ हौं दिन भरौं। चाहों कबहिं जाय उड़ परौं ॥
दो० पलक आंख तेहिमारेगैं^२, लागीडुनहुरहाहिं ।
कोउ न सँदेशी आवहिं, तेहिक सँदेश कहाहिं ॥
पूँछहि कहा सँदेश वियोगू^३। योगी भया न जानहि भोगू ॥
धर्नी संग न संगे पूरे। पानी बूड रात दिन झूरे ॥
तेल बैल जस बायें फिरे। परै भँवर महँ सौहें^४ न टरे ॥
तुरी^५ नाउँ दाहिन रथ हांका। बायें फिरै कुम्हार का चाका ॥
तुहिअस नाहिं जो पंख भुलाना। उड़ै सो आव जगतमहँ जाना॥
एक दीप का आयों तोरे। सब संसार पांयतर मोरे ॥
दहने फिरै सो अस उजियारा। जस जग चांद सूर्य्य औ तारा ॥
दो० मुहसँदबायेंदिशँ^६ तजी, एकश्रवणैं^७ इकआंख।
जबते दाहिन होय मिला, बोल पपीहा पांख ॥
हौं ध्रुव अंचल सो दाहिनलावा। फिर सुमेरुँ^६ चितोरगढ़ आवा॥
देखों तोरे मँदिर घमोई। मात तोर आंधर भई रोई ॥
जस श्रवणैं बिन अन्धी अन्धा। तस रुरुमुई तोहिं चितबन्धा ॥
कहेसि मरों को कांवर लेइ। पूत नाहिं पानी को देइ ॥
गई प्यास लाग तुहि साथा। पानी देह दशरथ के हाथा ॥
पानी न पिये आग पै चाहा। तोहिअस पूत जन्म अस लाहा॥
भागीरथी^१२ होहु कर फेरा। जाय सँवारि मरन की बेरा ॥
दो० तू सपूत मन ताकर, अस परदेश न लेहि।
अबताईं मुइ होयही, मुयहिं जाय कत देहिं॥
- दुखी १ जानवरपरिन्द २ राह ३ दुख ४ सामने ५ घोड़ा ६ तरफ़ ७ कान
८ नामसितारा ६ पहाड़ १० नाम-मातापिताभक्त ११ गंगाज़ी १२ ॥