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सर्वकोश
पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 175

१७४ पद्मावत ।
योगी होय निसरा सो नाँहूँ । तबहुन कहा सँदेशन काहूँ ॥
नित पूँछौं सब योगी जंगम । कहै न कोइ निजवात विहंगम ॥
दो० चांखो चक्र उजारभये, सकल सँदेशा टेक ।
कहौं बिरह दुख आपन, बैठसुनहु दँड एक ॥
तासों दुख कहिये हों वीरा । जेहि सुनके लागै परपीरा ॥
कोहोय भिमै दिनको लै रहा । को सिंहलं पहुँचावै चहा ॥
जहां सो कन्त गयेहोय योगी । हों किंगरी भई झूर वियोगी ॥
वह सुनके पूरी करु भेटाँ । हों भई भस्म न आय समेटा ॥
कथा जो कहै आय पियकेरी । पाँवर्र होहुँ जन्म भर चेरी ॥
वहके गुन सँवरत भई माला । अबहुँ न बहुरा उड़गा छाला ॥
बिरह गुरुइ खप्पर के हियों । पवन अधार रहै सो जिया ॥
दो० हाड़भई झुर किंगरी, नसैं भई सब तांति ।
रोमरोम तन धुनउठै, कहो विथा तेहिभांति ॥
पद्मावत सों कयो विहंगम । कन्त लुभाय रहे जेहि संगम ॥
तूँ घर घरर्न भई पिउ हरता । मोतन जप दीन्हीं औ बरता ॥
रावन कनकें सो तोकहँ भयो । रावेंटे लङ्क मोहिं कै कियो ॥
तोकहँ चैन सुख मिलै शरीरा । मोकहँ हिये द्वंद दुख पीरा ॥
हमहूँ व्याह तोर सँग पीऊ । आपहिपाय जान पर जीऊँ ॥
अबहूँ कर माया जिव फेरो । मोहिं जियाव देहु पिय मेरो ॥
मोहिं भोगसों काज न प्यारी । सौंह दृष्टि १३ की चाहनहारी ॥
दो० सौत न होस तू बैरिन, मोरकन्त जेहि हाथ।
आनिभिलाव एकबेरकैसे, तोरपांय मोरमाथ ॥
खाविन्द १ चारोंतरफ़ २ नामपहलवान ३ दुखी ४ मुलाक़ातकर ५
जूती ६ दिल ७ नामचिड़िया ८ घरवाली ६ सोना १० राख ११ अपना पैर
जानके मेरी ज़िन्दगी चाह १२ सीधी निगाह १३ ॥