पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 170, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपद्मावत | १६६
हौं का खेलौं कन्त बिन, रही छारै शिर मेल ॥
अगहन दिवस घटा निश बाढ़ी। दुपहर रयनि जाय किमि गाढ़ी॥
अब धन दिवस बिरह भारराती। जरों बिरह जस दीपक बाती ॥
कांपा हियों जनावा सीव। तौ पै जाय होय सँग पीव ॥
घर घर चीर रचे सब काहू। मोर रूप सब लैगा नाहूँ ॥
पलट न बहुरा गा जो बिछोई । अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई ॥
बज्रांगिन बिरहिन हिय जारा। सुलग सुलग दग्धै भइ छारा ॥
यह दुख दग्ध न जानै कन्तू । यौवन जन्म करै भसमन्तू ॥
दो० पियसों कहो सँदेशरा, ये भँवरा ये काग।
सो धन बिरहिन जर गई, तेहि क धुवां हम लाग ॥
पूष जाड़ थर थर तन कांपा । सूर्य जुड़ाय लंक दिशि तापा ॥
विरह बाढ़भा दारुनै सीव। कँप कँप मरों लेइ हर जीव ॥
कन्त कहां हो लागों हियरे। पन्थ अपार सूझ नहिं नियरे ॥
सौरैं सेती आवै जूड़ी। जानहु सेज हिमंचलै बूड़ी ॥
चकई निश बिछुड़े दिन मिला। हौं दिन रात बिरह कोकिला॥
रयनि अकेल साथ नहिं सखी। कैसे जिये बिछोही पखी ॥
विरह सजान भयो तन जाड़ा। जियत खाय औ मुयेहिन छांड़ा॥
दो० रक्त ढुरा माँसू गिरा, हाड़ भये सब शंख ।
धने सारस होइ रुरुमुई, आय समेटहिं पंख ॥
लाग्यो माघ परै अति पाला। बिरहा काल भयो जड़काला॥
पहल पहल तन रुई जो झांपों। अहिल अहिल अधिको हिय कंपों ॥
१-६ दिन २ रात ३-४ दिल ५-१८ जाड़ा ६ खाविन्द ७
जलाना ८ उत्तर तरफ १० टेढ़ा ११ छाती १२ राह १३ तोशक लिहाफ़ १४
पालाकी तरह १५ तथा नागमती १६ बहुत १७ ॥