माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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28
जगत की समस्त वासनाएं छूट जायँ, उसका नाम क्या है? कषायों उपशान्त हो जायँ,
उनकी मन्द स्थिति हो, उसका नाम क्या है?
फिर देश-सर्व विरत सम्यक्त्व को प्रमाण किया गया, तो जो लोग ऐसा कहेंगे,
मिथ्यादृष्टि का त्याग सम्यक् मिथ्यात्व में सम्यक्त्व प्रगट होने पर होगा इसलिए
उसे ही या सम्यक्त्व से पहले जो कुछ दान या पूजा रूप या तपश्चरण रूप किया था
या त्याग किया, वह सम्यक् त्याग नहीं, या सम्यक्त्व पहले नहीं, तो उसका जो होगा, वह
व्यर्थ गया, या सम्यक् सम्यक्त्व हो देश-सर्व विरत रूप सम्यक्त्व को प्रमाण किया गया,
प्रथम सम्यक् का ऐसा स्वरूप या त्याग या सम्यक् के उपशम या सम्यक् रूप जानना चाहिए,
अनन्ता-नुबन्धी का अभाव पश्चात प्रत्याख्यान का देशप्रत्याख्यान, तो देश-सर्व रूप
किया तो मिथ्यात्व सम्यक्त्व रूप हो सम्यक्त्व नाम हो ही गया!
तो विरत सम्यक् नाम उस ही का तो नाम है तो इस प्रकार सम्यक् हुआ, सम्यक्त्व
हुआ, पश्चात सम्यक्त्व रूप से देश सम्यक्त्व सम्यक् होगा?
सम्यक्त्व रूप तो हुआ, पर उस से सम्यक्त्व सम्यक्
रूप विरत सम्यक्त्व को प्रमाण किया या तो विरत सम्यक् नाम सम्यक्त्व रूप को
ही सम्यक्त्व का विरत का होगा, सम्यक् ही?
तो फिर विरत सम्यक् तो विरत रूप ही हुआ और
सम्यक् सम्यक्त्व रूप नाम सम्यक्त्व रूप हुआ विरत रूप तो उस सम्यक्त्व रूप
नाम हुआ या सम्यक्त्व विरत का सम्यक् विरत रूप प्रमाण ही?
तो जो विरत विरत सम्यक् ही रहा फिर वह तो सम्यक्
ही ना हुआ सम्यक्त्व नाम रूप हुआ तो सम्यक्त्व के पश्चात विरत हुआ होगा
उस को विरत सम्यक् नाम ही कहा जाय सम्यक्--सम्यक् होगा, विरत विरत, विरत,
विरत! विरत का विरत ही हो जाय विरत नाम उस सम्यक् विरत का? तो सम्यक्त्व
विरत नाम नाम सम्यक्--सम्यक्
विरत का विरत ही प्रमाण तो विरत का विरत विरत ही?
विरत हुआ, तो जो विरत सम्यक् विरत हुआ, तो विरत विरत नाम को विरत विरत
नाम रहा
उस विरत का सम रूप सम्यक् रूप प्रमाण हो गया प्रमाण रहा, विरत विरत ही?
सो ऐसा जानना, सम्यक् सम्यक्त्व से सब विरत रूप हो, जो उस सम्यक्त्व रूप से,
सो विरत सब विरत रूप विरत विरत हो सम्यक्त्व का ही विरत विरत ही?
भला, सम्यक्त्व सम्यक्त्व से सम्यक्, विरत का सम्यक्त्व सम्यक्त्व का विरत ही
सम्यक् हो न जाय, सम्यक्त्व से ही रहा, उस विरत रूप का उस विरत का सम्यक्त्व ही
रूप रहा, सम्यक् का उस रूप का विरत विरत का सम्यक्त्व विरत रूप न होकर ही
सम्यक् विरत विरत का सम रूप?
पश्चात विरत विरत का विरत रूप हो, उस विरत विरत का न उस रूप का ही
सम्यक् विरत सम्यक्त्व प्रमाण विरत का विरत रूप सम्यक्त्व प्रमाण न होकर सम्यक्त्व
सम्यक्त्व सम्यक्त्व नाम तो ही विरत सम्यक्--सम्यक् ही? तो जो विरत रूप विरत ही
रहा तो सो विरत का सम सम्यक्त्व ही ना हुआ, या सम्यक्--सम्यक् ही का सम्यक्
सम्यक्--सम्यक्? तो सो ही तो सम रूप उस विरत सम्यक्--सम्यक् ही का सम रूप
विरत रहा, या सम्यक्त्व रूप विरत का ही विरत तो उस विरत का विरत ही,
सम्यक्त्व का सम्यक् रूप उस विरत का विरत रूप ही या विरत रूप का ही विरत विरत
रूप सम्यक्त्व हो, या विरत ही विरत, उस ही का विरत रूप ही उस विरत विरत,
विरत विरत सम्यक्त्व तो ही सो उस सम्यक्--सम्यक् ही? या सम्यक्--सम रूप का उस
विरत प्रमाण, विरत ही रहा सो, उस विरत प्रमाण रहा, उस विरत रूप सम्यक्त्व का
सम रूप या विरत सम्यक्त्व सम्यक्त्व रूप ही सम्यक्त्व नाम सम का सम्यक् सम्यक्?
उस का सम्यक् का नाम ही विरत का, तो सो ही उस सम्यक् विरत? सम्यक्त्व ही
रूप ही विरत, सम्यक्त्व विरत नाम उस ही का
सम्यक्त्व नाम विरत का सम रूप रूप हो, सम्यक्त्व सम्यक्त्व सम्यक्त्व ही
सम्यक्त्व का विरत सम्यक्त्व का ही स्व--रूप सम्यक्--का सम रूप ही उस ही विरत
का, पश्चात उस रूप का ही रूप उस विरत सम्यक्त्व प्रमाण ही उस सम्यक्--सम्यक् का ही
रूप सम्यक्--का सम्यक्त्व सम्यक्त्व प्रमाण का ही विरत ही रहा, विरत ही तो विरत का
विरत का विरत ही, विरत रूप रूप का विरत रूप विरत सम्यक् विरत विरत का सम्यक्त्व,
सो सम्यक् विरत विरत विरत विरत का सम्यक्त्व, सो विरत विरत
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विचार करके देख लो संसार का इतिहास उठाकर, जिसने माता--पिता का तिरस्कार
या अनादर अथवा उनकी बात नहीं मानी और उनका दिल दुखाया हो, तो कभी शान्ति पूर्वक रह नहीं
सकेगा या उसका वंश अथवा वह कभी भी सुखी रह सके यह नहीं कह सके, लेकिन जो कोई
हृदय रूपी गुरु आज्ञा धारण करके माता पिता की सेवा और आज्ञा का पालन करते हैं वह सुख
का आनन्द हमेशा पाते रहते हैं और सदा उन पर भगवान की कृपा भी बनी ही रहती व यश
पाते, और अन्त में उस परम आनन्द धाम को पाते, राम का उदाहरण प्रत्यक्ष
पर आज तो संसार स्वार्थी, कपटी व पाखण्डी बनता, विचार ही
बिल्कुल विपरीतार्थ दिशा में बदल व विपरीत दिशा में सोचने लग पड़े जिसका
नतीजा है, कि वह कभी सुखपूर्वक शान्ति से रह तो ही नहीं सकता है, बल्कि
अशान्ति से भरा रहता व दुःख भोग रहा क्योंकि सच्चाई के पथ से भटक ही गया, हर एक
इन्सान पर आज माया ऐसी सवार हो रही व ऐसा प्रभाव डाल रखा कि कोई भी सच, शान्ति
का दम नहीं भर रहा बल्कि स्वार्थ के वशीभूत होकर, चाहे सन्तान, चाहे कोई
अपना सम्बन्धी अपने स्वार्थ के वश होकर ही आज माता पिता को अपने घर अपने
पास रख या सेवा कर या फिर अपने से पृथक करके दुःखी कर रहे
कई सन्तान तो केवल व सोचे कि माता पिता अपनी सारी जिन्दगी की कमाई
मुझे, या जो कुछ भी उनके पास जायदाद पैसा रुपया हो वह सब ही मुझे दे दिया जाये
चाहे, मेरे ही भाई और बहन को न मिले और उनका कोई भी हिस्सा न रहे जो केवल मैं
अपने पास रखूँ जिससे मैं अपना गुजारा चलाता रहूँ व, तो सन्तान केवल अपने
स्वार्थ खातिर बाप से प्यार तो जताती या कहती कि पिताजी आप हमारे साथ रहिये
ताकि जायदाद अपने ही हाथ में आ सके; जब देखा
या बाप, तो फिर उनका आदर भाव खत्म हो गया या छोड़ दी उनकी सेवा या दूर
भगा दिया जायदाद ले, फिर क्या रहा
आज तो सारा संसार ही ऐसा स्वार्थी बन, फिर शान्ति का पाठ कहाँ
मिलेगा माता पिता को देखना भी कई सन्तान नहीं पसन्द करती व जब माँ बाप
वृद्ध होकर किसी सहारे या भोजन के मोहताज हो जाते तब--तो उन्हें या छोड़
दिया जाता बाहर या फिर, वृद्धा आश्रम भेज कर छुटकारा पा लिया लो!
लेकिन यदि वे खुद भी विचार करके देखें कि कल हम भी तो माता
पिता की श्रेणी में ही आ गये हैं सन्तान के, कल को जब हम बूढ़े होंगे? तो
क्या वह भी ऐसा बर्ताव हमारे साथ करेगी तब क्या शान्ति मिलेगी? विचार करो
इन्सानों विचार
जो भी संसार में आया है उसको यह शरीर छोड़ कर एक दिन जाना अवश्य ही
पड़ेगा! तो फिर यह दुनिया दो--दिनों, थोड़ी देरकी खातिर क्यों
पाप के भारी कर्म कर अपना ही बुरा कर रहे इस सच को समझो जी,
इन्सानों, सच्चाई के पथ पर चल कर सच्चाई--धर्म, दया, नम्रतापूर्वक
व्यवहार करो हर इन्सान से तभी सुख, ही सुख सब जगह ही पाओगे
आज हर घर परिवार में एक दूसरे पर ईर्ष्या क्रोध जलने की अग्नि
सुलगाये, एक दूसरे को न देख कर खुश बल्कि ईर्ष्या जलते ही हैं, हर एक घर
आज नरक बना हुआ है भाई, नरक कहाँ मिलेगा!
स्वर्ग तो शान्ति में, तो शान्ति का मूल क्या है? आज भाई--भाई की
जान का बैरी बना हुआ या भाई भाई को आपस में दो--फाड़ कर रहे, एक ही
माँ का सन्तान भाई ही भाई--परिवार को उजाड़ने, मारने में, अपना बड़प्पन
रूप पाखण्ड को ही अपना मान--शान समझ मनुष्य ही तो इन्सान का ही गला
घोंट
या तो इन्सान उस रब को केवल मात्र परमात्मा जानकर ही सब कुछ
समझ कर निर्वाह करता या तो यह सोच समझ कर त्याग करता, दयावान् बनता,
परोपकारी बन, अपना जीवन, तो सब सम्भव निर्वाह हो ही जाता जिस पर सदा उस
दाता की कृपा बनी रहती
पर आज उल्टा पाठ ही, इन्सान पढ़ रहा जिससे इन्सानियत इन्सान रूप में
है? आज इन्सान पाश्विक, रूप धारण करता जा रहा, जिस सच इन्सान
को पहचानना है, उस सच्चाई को भूल बैठा मनुष्य, जिस के लिए बार बार
यह दुनिया में ही इन्सान का जन्म दिया है परमात्मा ने जिस से हर एक मुक्ति पा,
उस का ध्यान लगा मुक्ति रूप जन्म--मरण बन्धन से ही सदा--सदा छूट--कर छुटकारा
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34
लेकिन विस्मय केवल इसी पर निर्भर न था कि संन्यासी सब का सब भोजन कर गया
जिस भोजन करने वाले में साधारण व्यक्ति पचास मिनट लगाता उसे संन्यासी ने दस मिनट में, उस
सब भोजन को इस प्रकार समाप्त कर दिया था कि जैसे भोजन था, ही नहीं या फिर न जाने
सब का सब भोजन कहाँ समा गया, पर सब लोग इस देखकर यह निश्चय करने लगे थे, यह
भी, न तो संन्यासी का यह पहला काम पहले कभी का किया हुआ संन्यासी का खेल था। वह
खेल केवल था, जिसे दिखलाकर सब संन्यासी का विश्वास कर रहे थे, सब का ध्यान अपनी
तरफ कर लिया।
वह संन्यासी यह विश्वास सब लोगों अथवा एकत्र जन पर इस प्रकार जम, जमने जा रहा
था! केवल इतना नहीं, जो कुछ भी वह संन्यासी अपने मुख से कह रहा था, एकत्र जन
पर उस एकत्र जन समुदाय पर उसका ही प्रभाव पड़ना! जमना! सब लोग जो संन्यासी के पास
एकत्र थे, वह सब इस प्रकार उस ओर जा रहे थे मानों उनका, जो कुछ सोच विचार उस
बात अथवा इस ओर उस समय हो रहा था, केवल वह समाप्त हो रहा था और जो कुछ
वह सब संन्यासी कह रहा था, सब एकत्र जन उस पर ही विश्वास न केवल, बल्कि सब
उस प्रकार केवल उस पर विश्वास करने अथवा करने के ही योग्य थे, जो वह संन्यासी कह
दिया करता था। इस ओर सब एकत्र न केवल थे, पर उन एकत्र अथवा संन्यासी के बीच में
यह अंतर पड़ता जा रहा था कि वह सब संन्यासी को देख-देखकर प्रसन्न केवल
होते ही न रह जाते थे बल्कि संन्यासी के उस खेल-तमाशे अथवा खेल पर विश्वास करके
संन्यासी पर अपना विश्वास इस प्रकार से कर रहे थे कि वह संन्यासी को केवल एक
ऐसा व्यक्ति ही मानकर न रह रहे थे, जो केवल पेट भरने के ही लिए संन्यासी बनकर
घूमता फिर रहा हो अथवा जिसे केवल भोजन से, या सब प्रकार की सांसारिक सुख-भोग से
मोह
वह केवल यह देख प्रसन्न थे, जो वह संन्यासी भोजन कर रहा था, जिसे वह न केवल
एक साधारण जन से अधिक खा रहा था बल्कि साधारण व्यक्ति से अधिक? उस सब पर
अविश्वास तो, था ही नहीं सब लोगों को उस समय जो एकत्र थे, पर वे सब जो कुछ
भी अविश्वास इस बात पर कर रहे थे अथवा कर रहे थे कि क्या वह संन्यासी
सच, में भोजन था, या भोजन से, या केवल पेट, में भोजन न--था सब का सब ही!
जिसे सब एकत्र लोग समाप्त हुआ देख रहे थे, केवल विस्मय ही सब को हो रहा
था।
संन्यासी के मुख पर वह तेज चमक रहा था, जिस मुख-तेज पर
एकत्र जन सब प्रकार मुग्ध होकर उस ओर देख रहे थे और संन्यासी
की बात शांत होकर सुन रहे थे। जिसे संन्यासी केवल एक खेल समझ रहा था! संन्यासी
जिसे सब कुछ न समझकर केवल एक खेल समझ रहा था! पर जो सब एकत्र
लोग वहां संन्यासी को, उस संन्यासी को सब कुछ जानकर मान रहे थे।
केवल इतना ही नहीं संन्यासी सब लोगों को वह सब सुना रहा था जिसे वह
उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर न केवल न केवल कह रहा था, बल्कि जो कुछ
सब उस उत्तर-पश्चिम की ओर देख रहे थे अथवा संन्यासी को उस दिशा की ओर
मुंह किए हुए सब लोग एकत्रित थे, जिसे संन्यासी सब प्रकार से कह
रहा।
संन्यासी को भोजन सब लोग अब तक साधारण भोजन मात्र कहते आ रहे थे।
केवल यह ही, साधारण भोजन संन्यासी को केवल पेट भरने वाला कहा गया था,
अथवा लोग, जिसे भोजन कह रहे थे वह केवल पेट भरने वाला भोजन था उत्तर-
पश्चिम दिशा की ओर संन्यासी उस उत्तर-दिशा की ओर देख रहा था। संन्यासी
का भोजन सब ने न केवल देखा, न सब लोगों को उस प्रकार का भोजन ही
समझा जा रहा था अथवा, भोजन सब ने देखा, पर संन्यासी केवल पेट का
भोजन ही न समझा जा रहा था।
पर आश्चर्य, इस बात का था कि वह सब भोजन पेट का ही भोजन था!
वह भोजन सब लोग जिसे, पेट का भोजन ? कह रहे थे कि वह संन्यासी केवल, पेट
भरने भर को भोजन कर ही रहा था? क्या वास्तव में, वह भोजन था? क्या संन्यासी
का, वह भोजन था? इस ओर का भोजन सब को समझ में आ रहा था कि भोजन
था, भोजन सब को पेट भरने का भोजन लग रहा था, पर वह भोजन संन्यासी का
था, संन्यासी के ही उस भोजन को स्वीकार कर रहा, पर वह स्वयं पेट से भोजन कर
रहा था या पेट को भोजन दिया जा रहा था! सब लोग देख रहे थे, केवल
35
पापो मरणतोऽपि! मी काय करू? या पातकातून मी निसटणार कसा ना, कारण मला
सर्व
माहिती पण मी फार पूर्वी एका ग्रंथकाराकडून एका साधू व संतांची
जी माहिती वाचली ती फार विचित्र होती! साधूचा हा धर्म असतो की तो माणसाला
पाप व संकट या दोहोंतून ही तारील व संकटा या जगातील नसून त्या परलोकीच्या
जरी
तो संकटात पडून ही पाप तर करतोच करतो ना, कारण तो तसे करीत असता जर तो
त्यात पडला तर तो पापाच्या या पापातून मुक्त कसा होऊ शकतो असा विचार करून
जेव्हा एखादा साधू या जगात येतो, तेव्हा तो स्वतः या संकटात पडून त्या पाप्यास
त्या पापातून सोडवितो. आणि म्हणूनच साधूविषयी जे काही म्हटले जाते ते सर्व
काही खोटे
नाहीं! या विचाराने मला त्या साधूचा विचार आला की तो मला पापमुक्त
करू शकत नाही म्हणून मी त्याच्या जवळ गेलो नाही. मी त्या साधूला पूर्वी पाहिले
होते पण मी त्याच्याकडे गेलो नाही. कारण एका साध्या पापी माणसाला साधू
सोडवू शकतो, पण माझ्यासारख्या पापी माणसाला सोडवू शकत नाही! कारण
हा विचार असा आहे की, एका पापी माणसाला सोडविण्याकरिता त्या साधूला स्वतः
पापी व्हावे लागते! जर पापी व्हावे लागले तर तो साधू कसा? जर साधू झाला नाही,
तर तो मला सोडवू शकत नाही.
या अशा विचाराने मी स्वतःच पापी होण्याचे पत्करले व त्याचा परिणाम असा झाला की,
त्या पापातून मुक्त होण्याचा मार्ग मी शोधू लागलो! या विचाराने मला असे वाटले की
या पापाचे प्रायश्चित्त तरी काय असावे? जर मी स्वतः मेलों--तर मला या जगातील
सर्व दुःखापासून सुटका होईल! पण जर मी आत्महत्या केली--तर माझे नाव मला कधी
पुसून टाकता येणार नाही आणि तो पापाचा डाग तसाच राहील! त्यापेक्षा असे केले तर बरे
होईल की मी स्वतःच एका न्यायाधीशापुढे जाऊन उभे राहावे आणि सर्व हकीकत त्याला
सांगावी आणि त्याला सांगावे की तू मला फाशीची शिक्षा दे. यामुळे माझे नाव तरी पुसले
जाईल आणि मला शांती मिळेल! असा विचार करून मी स्वतः न्यायालयात जाण्याचे
ठरविले! पण मी न्यायालयात गेलो नाही कारण जर मी न्यायालयात गेलो तर लोक
मला हसतील आणि म्हणतील की हा मेला--हा खुनी आहे आणि तो लोकांचे तोंड पाहाण्यास
समर्थ नसल्यामुळे न्यायालयात आला आहे. शेवटी मी शांत बसून विचार केला की
आपण स्वतः न्यायालयात न जाता, आपण असे काही करावे, ज्यामुळे पोलिसांना माझी खरी
हकीकत कळेल आणि ते मला पकडतील!
या एका उपायाने मला बरे वाटले आणि मी या उपायाचा अवलंब केला. असा विचार
करून मी शांत बसलो. तोच मला समोरून एक लहान मुलगा येताना दिसला. त्याला
पाहून माझ्या मनातील पापी विचार जागा झाला. मी त्याला पकडून विचारले की, तू कोठे
चालला आहेस? त्याने सांगितले की, मी घरी चाललो आहे. मी म्हटले, "तू घरी का जातोस?"
त्याने सांगितले, "माझी आई वाट पाहात आहे म्हणून मी घरी चाललो आहे."
यावर मी त्याला म्हटले, "तू घरी जाऊ नकोस--माझ्याबरोबर चल." त्या मुलाने नकार
दिला, पण मी त्याला सोडले नाही. शेवटी त्या मुलाने मला शिवी दिली आणि जोराने
ओरडू लागला. त्याबरोबर मी त्याचा गळा आवळला आणि तो जागीच ठार झाला!
नंतर मी त्या मुलाच्या प्रेताची विल्हेवाट लावली.
याप्रमाणे मी दुसरा खून केला आणि नंतर मला पश्चात्ताप झाला. आता मला
वाटू लागले की, आपण या जगात राहण्यास योग्य नाही. मी आता मरणारच! मला
आता कोणीही सोडवू शकत नाही. मी स्वतःच स्वतःला मारून घेतो आणि या जगातील
सर्व पापातून मुक्त होतो! शेवटी मी असा निश्चय केला की, आपण विष खाऊन मरून
जावे! याप्रमाणे मी विष खाल्ले पण त्या विषाचा माझ्या शरीरावर काहीच परिणाम झाला
नाही! आता मला काय करावे ते सुचेना! मी घरात गेलो, दार लावून घेतले आणि विचार
करू लागलो की, आपण आता काय करावे? विचार करता करता मला झोप लागली.
सकाळी उठून पाहतो तो दारावर कोणीतरी थाप मारीत असल्याचे ऐकू आले.
मी दार उघडले आणि पाहतो तो पोलिस दारात उभे होते! पोलिसांनी मला
अटक केली आणि मी सुटकेचा निःश्वास सोडला. मला फाशीची शिक्षा झाली आणि मी
आता मरणार!
मला फाशीची शिक्षा झाल्याचे ऐकून, ती तरुणी ओरडली आणि म्हणाली, देवा, हे
काय झाले? तो तरुण पुढे म्हणाला, "बाई, शांत राहा, घाबरू नका. तुम्ही आता
सुखरूप आहात. त्या दुष्टाला योग्य ती शिक्षा झाली आहे. चला, आपण आपल्या घरी
जाऊ."
सुनो ! हम विश्वास पूर्वक कहते कहते थक गये कि भगवान सदा प्रत्यक्ष रूप से हमारे साथ रहते तथा हमारी
सहायता तो करो, पर सम्भवतः विश्वास नहीं होता।
जरा सोचो हमारे जीवन निर्वाह की चिन्ता स्वयं भगवान को ही करनी पड़ती है।
अन्यथा हम असहाय होकर क्या कर सकते हैं। हमारा जन्म, पालन-पोषण भी एक ऐसा कार्य है,
जिससे यह स्पष्ट पता लग जाता है कि ईश्वर ही प्रत्यक्ष होकर यह सब कार्य करते हैं। अतः
अविश्वास का प्रश्न
केवल एक बात बता दीजिये कि जब आपका जन्म हुआ तो क्या आप स्वयं ही
उपस्थित हो गये, या आपके लिए भोजन पानी हवा आदि की सब प्रकार पहले प्रबंध था। अथवा किसी
बात की कमी थी। यदि यह सब कुछ सत्य है, और निश्चित सत्य है। भगवान का यह सब प्रत्यक्ष
रूप से आपके जीवन निर्वाह में सहयोग था तो क्या अब उन्होंने अपना सहयोग देना बन्द कर
दिया, जो इस तरह भयभीत रहते हो? वास्तव में यह केवल आपकी अज्ञानता का ही प्रमाण
है, जो अपने भगवान सम्बन्धी विचार, ज्ञान को विकसित करने की चेष्टा नहीं करते।
जीवन व्यतीत करते-करते भी, यदि हम प्रभु की ओर अपनी दृष्टि रखें,
भगवान् सदा ही हमारे साथ हैं। वे हमारे लिए सब कुछ करते हुए भी कभी अहङ्कार नहीं
करते। बस, यह देखना है कि प्रभु का ही आधार है। यह भाव मन में बैठाने का प्रयत्न करना
ही जीवन का ध्येय है। भगवान पर विश्वास न रहने का फल ही यह है कि मनुष्य अपनी
भलाई !
अपने विचार भगवान् ओर ही समर्पित कर नियमित रूप से ध्यान करें। तब उस
समय का वातावरण स्वयं ही पवित्र हो जायेगा, सो भी ऐसा जिसका प्रभाव कभी नष्ट
होनेवाला नहीं होता।
इस प्रकार जब हम प्रभु के प्रति अपनी लगन को बढ़ाते रहेंगे तो परमात्मा भी हमारे प्रति
अपनी कृपा को बढ़ाते रहेंगे। अतः प्रभु का स्मरण सदा करना चाहिये। जिस प्रकार एक पतङ्गा
अग्नि को देखकर, उसमें कूद पड़ता है। इस प्रकार की लगन यदि ईश्वर के साथ रखी जाये तो अवश्य
ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। संसार के माया-जाल में फंसकर मनुष्य प्रभु से विमुख हो जाता है।
जो कि ईश्वर के प्रति किये गये उपकार का फल उलटा देना है। ईश्वर ने यदि संसार बनाया तो हमें
सहयोग देने के लिए, न कि अपने स्वरूप को भूल जाने के लिए। अतएव, भगवान् सदा
हमारे साथ रहते हैं, इस पर विश्वास न होना ही मनुष्य की भारी भूल है।
जब कभी भी संकट आये, तब यही समझें, 'भगवान् ही परीक्षा ले रहे हैं।' प्रभु की लगन
ही ईश्वर से मिला सकती है।
इस प्रकार प्रभु से सम्बन्धित हो कर विचार करने पर मालूम होगा कि भगवान्
से तो हमारा नित्य का नाता है, जिस का कभी वियोग नहीं हो सकता। इस प्रकार यदि प्रभु
का चिन्तन किया जाये तो हम निश्चय ही पाप-कर्मों से छूट सकते हैं। जब प्रभु
हमारे साथ हर समय है तो परमात्मा का ध्यान सदा बना रहना चाहिये। ईश्वर सर्वव्यापी
है। यह जानकर जब इस बात का निश्चय हो जाता है तो प्रभु के प्रति लगन बढ़ती है।
जो कुछ इस संसार में दिखाई देता है, वस्तुतः वह सब उस शक्ति-सम्पन्न का चमत्कार
मात्र ही तो है। प्रभु की कृपा से ही ज्ञान का प्रकाश होता है। यदि प्रभु की कृपा न होती, तो
हम अज्ञान के अन्धकार में भटकते रहते। अतः प्रभु के प्रति लगन ही हमारा जीवन ध्येय होना
चाहिये। हमें सदा इस बात का विचार रखना चाहिये, कि यह संसार नाशवान् है। प्रभु ही नित्य-
स्वरूप है। जो सदा हमारे कल्याण के लिए तत्पर रहता है।
ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने के पश्चात् मनुष्य के मन में शंकायें उत्पन्न नहीं
होतीं। ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान् है। ईश्वर सब जगह व्याप्त है, उसका न आदि है
न अन्त, परमात्मा सदैव ही विद्यमान रहता है। प्रभु के दर्शन करने का साधन केवल प्रेम है।
ईश्वर के प्रति प्रेम की भावना होना ही प्रभु-दर्शन का कारण बनता है। मनुष्य
केवल प्रभु की शरण में जाने पर, प्रभु के प्रति समर्पित होकर ही प्रभु को पा सकता
है। इस प्रकार जब भगवान् की कृपा से मनुष्य का संशय दूर हो जाता है, तो फिर
शंका कैसी? वह तो प्रेम में डूब जाता है। प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम का फल यह होता
है कि प्रभु को कभी भी नहीं भूला जा सकता। प्रभु-दर्शन से बढ़कर संसार में और कोई
आनन्द नहीं हो सकता। प्रभु-दर्शन पाकर मनुष्य कृत-कृत्य हो जाता है। ईश्वर के प्रति
इस प्रकार की निष्ठा रखने वाले भक्त का जीवन ही सफल है। भक्त, भगवान् का
दास बन जाता है।
37
इस बात का फैसला, स्वामी राम और राम महाराज ने, दोनों संप्रदायों की उपस्थिति
निर्णय पत्र लिख लिखा करके कर न्यायालय से भी प्रमाणित करवा कर ही तय कर दिया गया,
जिससे कि भविष्य कभी कोई विवाद या द्वन्द न खड़ा हो सके, पर हां जी, यह तय हो जाने
पश्चात् भी श्री स्वामी जी के शिष्य, इन को अपना गुरू ही मानते व पूजते
महाराज श्री मंगल-दास जी स्वयं जीवन पर्यन्त नित्य प्रति प्रात स्नान करने जाते,
तब सर्वप्रथम् स्वामी शरण देवाचार्य महाराज की समाधि पर प्रणाम अवश्य ही किया करते
और हर समय समाज में इन तीनो संतो व गुरु जी, का सम्मान समाज में ऐसा दिलाते
कि जिससे किसीको संकोच या सन्देह न रहे, इसलिये संत, भक्तगण सब दोनों संतों
सामान आदर देते, किन्तु अपनी निजी निष्ठा केवल महाराज श्री मंगल दासजी में, ही
मानते कि जिनका शिष्यत्व उन लोगों ने स्वच्छा से स्वीकर व धारण किया था।
पश्चात् स्वामी जी ने जो जो वचन ले या फरमा दिये थे, उनको हमेशा निभाते रहे।
और अपनी निजी शक्ति व योग्यता के अनुसार हमेशा समाज हित का कार्य करते रहे। संतो भक्तों
को नाम दान उपदेश दिया सो अलग रहा पर समाज कल्याण के हित में कार्य और बढ़
कर किया जिसके विषय में आगे हम पाठक को अवगत करा
यहां पर हम जन साधारण पाठकों की समझ में आने हेतु यह भी व्यक्त कर देना
उचित समझते हैं। कि जिस समय स्वामी शरण देवाचार्य जी महाराज नित्य लीला में लीन हुए
उस समय समाधि पर जो जो सामान दिया गया था उस समय का, किसी कारण वश
फोटो नहीं खींचा गया था। अतः यह सब सामान स्वामी जी को भेंट किया! ऐसा फोटो
स्वामी शरणदेवा समाधि गद्दी व श्री संत! से भेट करा दिया गया व कैसा? अज्ञानता वश
गलत प्रचार किया गया जिस पर पाठक ध्यान नदेवे।
अब केवल आप को इस बात का पूर्ण निश्चय कर लेना चाहिये! स्वामी राम जी
द्वारा जो कुछ किया गया सो केवल श्री राम द्वारा रचित विधान स्वरूप हुआ यह सब प्रभु की
ही लीला थी सो सो ही सब हुआ स्वामी भगवान स्वरूप पूज्यपाद स्वामी शरण देवाचार्य
जी महाराज का किसी भक्त विशेष से कोई द्वेष भाव? कभी नहीं हो सका न होना ही
संभव रहा, क्योंकि उस समय सारा जगत ही, उनके लिये तो सिर्फ परमात्मा का ही रूप
रहा, सिर्फ उस ही समय स्थिति को सम्भालने के लिये ही जो जो विधान हुआ होगा वही
सबको मान्य रहा पर स्वामी श्री मंगल दास जी महाराज के हृदय में जो आदर, व सत्कार
गुरु चरणो भगवान देवाचार्य महाराज प्रति सदैव रहा व उस पर अमल भी किया, तथा
सत्कार स्वरूप अपने गद्दी पर हमेशा श्री स्वामी जी, महाराज की फोटोयुक्त तस्वीर रखी
तथा उसे साक्षात स्वरूप समझ कर ही, रोज उस पर हार, धूप दीप व भोग नैवेद्य लगा कर
सब को चरणामृत रूप में तो दिया, सो वर्तमान तक भी यह क्रम सब तरफ चालू चला
आया देखा गया
पर इसके विपरित भी क्या ऐसा सम्भव? हो सका यदि हम ऐसा कहे
कि स्वामी मंगल दास जी को इस बात का तो पश्चाताप रहा होगा और प्रायश्चित
रूप उन्होंने यह सब कुछ किया तो ऐसा सोचना कदापि भी सत्य रूप को नहीं प्रकट कर
रहा बल्कि यह तो उनका हृदय स्वरूप भाव स्वतः प्रभु भक्ति रूपी उदार हृदय था!
जो केवल आत्मिकभाव लिये ही था निष्ठा मन भाव स्वयं उनका अपना कर्तव्य
समझ कर कर रहे थे न कि किसी के दबाव में अथवा किसी लोभ लालच में आकर ऐसा
कर रहे थे; क्योंकि ऐसा करने से उनका जो लक्ष्य सदा निष्काम सेवा स्वरूप था, जिसे
समाज के लिये आदर्श उप--देश, मिला
यह बात भी निर्विवाद, सत्य है कि जो मनुष्य जैसा कार्य करेगा व पायेगा, जो जैसा
बोयेगा वही फल पायेगा, दूसरा उस को नहीं ले जा सकता, यह बात तो केवल ही नहीं
अपितु पूर्ण सत्य रूप में हम सब,मानव जाति पर लागू होती देखी जाती, जिसे कर्मफल
कहा जाता है। इसलिए भी, यह तो तय रहा कि जन-हित में किया गया कार्य कभी
निष्फल या अकारथ ही सिद्ध नहीं होता, देर भले ही लग जाय पर परिणाम तो
रूप व अच्छा फल ही प्राप्त होता है जो समाज को देखकर सुखी हो, यह वास्तविकता ही
सच है जो सदैव अमर रहने का रूप इस नश्वर जगत छोड़
स्वामी मंगल जी ने जो भी कुछ किया उसका भी फल उनको सुयश रूप में प्राप्त हुआ
जिसका ही फल, आज सारा संसार देख रहा है, कि आज कोई ऐसा संत समाज या स्थान
होगा जहां मंगल धाम, मंगल निकेतन, मंगल चिकित्सालय न बना देखा गया हो, जहां
मरीजों को लाभ मिल रहा, असहाय जन लाभ उठा रहे हैं तो उन को, मंगल स्वरूप ही
नजर आ रहा है। मानव के तन भगवान द्वारा दिये जाते, व मनुष्य को जन-कल्याण
रूपी इस तन से व साधन का सद-उपयोग करके संत, भक्त जन, अपने नाम रोशन कर
38
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□□□□□□□; □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□, □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□
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□□□ □□□□ □□ □□□ □ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□, □□□□□□□□ □□□□□ □□□□□
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39
चित्र में दिए गए पृष्ठ का टेक्स्ट फ़ॉन्ट त्रुटि (Font corruption / missing font rendering) के कारण केवल चौकोर बक्सों (tofu/rectangles) के रूप में दिखाई दे रहा है।
अक्षरों का मूल रूप रेंडर न होने के कारण यह पाठ्य सामग्री पठनीय नहीं है, इसलिए इसका देवनागरी लिप्यंतरण दृश्य रूप से संभव नहीं है। केवल नीचे पृष्ठ संख्या 40 और कुछ विराम चिह्न (जैसे ?, !, ;, , आदि) ही दृश्यमान हैं।
भाग 3 (पृष्ठ 41-60)
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41
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42
कहना पड़ा होगा, हाँ, न्याय संगत अधिकार देने की बात कही जाय अथवा
किया जाय तो वह बात सुन कर हँसेगा, सिर धुनने लगेगा या कान बन्द
कर लेगा।
जो प्रत्येक को रूप, रस, गन्ध स्पर्श! का ज्ञान, वाणी शक्ति से मुक्त
कर दे? उसके बाद भी हम यह न सोच सकें तो, सो तो सो ही गये होंगे?
हम तो सो गये, मगर वो जागा ही, जिस ने प्रत्येक को ज्ञान से भी वंचित
कर डाला तथा यह न सोचे कि हम भी कभी जागेंगे? उठ कर खड़े तो नहीं होंगे?
जब से उठ कर वो सब कुछ कर डाला जिसका परिणाम हम भोगते रहे, फिर भी हमारी
अक्ल पर तो ताला लगा रहा, न तो हम ने अपने अस्तित्व को, न ही उस की
राह को जाना जो समाज को, देश को आगे लेकर जाती है?
वो लोग अधिकार दे या न दे मगर उनका तो फर्ज बनता था सो उन्होंने किया,
हम लोग अपना फर्ज भूलते
जीवन तो समाज का था, उस वक्त जिस प्रकार से अन्धविश्वास बढ़ ही
गया था कि लोग या तो वो सब जानते नहीं थे, जिस कारण समाज से बहिष्कार या
समाज निष्कासित कर दिये जाने का भय बना रहता, क्योंकि बहुत सारे अत्याचार
तो केवल इसी, से डर कर लोग सहन कर रहे थे, उस वक्त उन लोगों
क्या वो अधिकार था? क्या वो समाज से बहिष्कृत नहीं हो रहे? वो अकेले
पड़ गये थे मगर वो, उस वक्त वो समाज से बहिष्कार को नहीं, अपने विचार
प्रवाह को ज्यादा महत्व दे रहे थे? हालांकि समाज से ही तो वो सब डर रहे
थे, सो जन-जागृति का बिगुल, समाज को ही जगा कर तथा समाज के ही
लोगों को जगाकर बताया गया कि वो जो कर रहे हैं, वो सब सो रहे
हैं! जब जगाया जा रहा, उनकी राह सरल की जाती हो तो, वो सो ही रहे
हैं! जाग जाओ, इस प्रकार के संदेश जन तक लोग पहुंचाते रहे, मगर उस
अन्धविश्वास को, उस वक्त समाप्त कर पाना बड़ा कठिन दायित्व! उस वक्त
निर्वहन किया गया!
जो प्रकाश उन के द्वारा इन लोगों को मिला वो लोग प्रकाश को प्रकाशित
तो कर सके, पर अन्धकारमय उस राह को जिसे समाज पर थोपकर यह दिखाया जा
रहा था सब कुछ, अन्धविश्वास से ग्रसित हो समाज के ही लोग कर रहे थे।
इस से बड़ा क्या होगा, कि लोग अपने हक अधिकार को पहचान नहीं, उस वक्त
पा रहे!
वो प्रकाश उन के ही अन्धकारमय के उस स्वरूप को सामने लाया, जो
केवल अपने लाभ के लिये ऐसा किया जा रहा था अथवा सो सोचा जा रहा
था! वो लोग समाज सुधारक बन कर सामने तो आये, समाज की बहुत सारी
ऐसी प्रथाओं को तो दूर कर सके!
उस काल में भी लोग, सब के अन्धविश्वास से मुक्त तो नहीं मगर कुछ
तो थे जो उन सब बातों को जान चुके थे, इस लिये समाज को एक रोशनी
मिली तो प्रकाश फैलता गया, जब रोशनी से राह को देखा गया, तो लोगों
समझ कर उस राह को अपनाया जिस कारण आज हम सब कुछ बन
सके हैं। यदि हम समाज के लिये कुछ-कुछ भी कर पाते हैं तो उस
विचार को तो माना ही जा रहा है। जिसकी शुरुआत उन
लोगों ने की, क्या विचार वो सब था? हालांकि! उस का स्वरूप, वो
आज तो नहीं? जो सब हम देख रहे हैं, वो स्वरूप तो आज का नहीं?
वक्त के साथ बदल गया सब।
मगर सच, क्या हमारा समाज आज-कल सही की तरफ जा रहा है? कुछ लोग
आज भी तो अन्धविश्वास अथवा अंध विश्वास फैलाकर, तथा अंधविश्वासी
बनाकर ही समाज को दिशा-हीन तो नहीं कर रहे? कुछ लोग तो ऐसा कर
ही रहे हैं, अन्धविश्वास को अपनाकर हम उन लोगों को बढ़ावा दे सकते
हैं अन्यथा नहीं! उस वक्त के, स्वरूप से तो वर्तमान का रूप सही नहीं,
अंधविश्वास केवल रूप तो बदल गया मगर उस स्वरूप को सब लोग आज
भी नहीं समझ पा रहे हैं कि क्या है और क्या नहीं! हालांकि वो ही, इस
बात को नहीं मान कर अपनी राह बना
रहे होंगे। वो, उन बातों को छोड़ कर आगे बढ़ रहे
तो उनका तो कल्याण हो ही गया, पर जो अन्धविश्वास के साथ आगे बढ़ा होगा,
43
इसलिए तुम सब उस प्रभु का भजन करो। परमात्मा दयालु, कृपालु, सब जीवोंपर उसका बड़ा भारी उपकार है!
उस उपकार को जो मनुष्य भूल जाता है—कृतघ्नताका वह पाप सिरपर बाँधता है। अरे भाइयो, उठो सचेत,
उस परमात्मा की शरण गहो!
यह विचार कर किसी वृद्ध ने कहा—हे भाई! मुझे तो अब तक मालूम ही नहीं हुआ था कि माता-
पिताका हमारे ऊपर इतना उपकार है। आज प्रभु की कृपा से सब ज्ञात हुआ, जो उपदेश तूने दिया, बड़ा
उत्तम उपकार का रूप हमारे मन में दृढ़ किया। सो अब ऐसा उपाय बता कि जिससे हमारा उद्धार
कैसे हो। सब दुःखों से छूटने का उपाय क्या है!
तब सब को ऐसा समझा उपदेश दिया—हे भाई! जो माता का भजन न करे—जो पिता की सेवा
पूजा मन से न करे—जो बड़े भाई का आदर न करे, जो स्वामी अर्थात् जिससे आजीविका पाता है उसका
उपकार न माने—जो माता-पिता अपने बच्चों का उपकार भूल जावें अर्थात् उनका आदर न करें,
ऐसा नर घोर नरक में जायगा! ऐसा वचन सुनकर लज्जित, भयभीत होकर बोले, हे हमारे भाई, अब कोई
ऐसा उपाय
हम लोगों द्वारा होना तो बड़ा ही कठिन जान पड़ता है! तब उस पुरुष ने सब को समझाकर कहा
परस्पर प्रीति का, सत्यताका मार्ग धारण करना चाहिए जिससे सबका उपकार हो सके। ऐसा धर्म
धारण करो!
तब सबलोग उठ कर, विचार करके सब जन घर को आये। आपस में परस्पर मिलकर
ऐसा निश्चय कर अपने घर-गृहस्थ का काम करने लगे। जो माता-पिता थे, सो बच्चों
की भलाई का विचार करने लगे। जो बच्चे थे सो माता-पिता, बड़े भाई आदिकों की
आज्ञा मानने लगे। माता-पिता की सेवा-पूजा करें! सब का मन आनन्द में मग्न हो गया। जिस
घर में सब पुत्र आज्ञाकारी हों उस घर में सर्व सम्पदा वास करती है। अतः हे शिष्य,
ऐसा विचार कर सेवा-भक्ति का आदर करो! सो भी निश्छलभाव, निष्कपट होकर। सो अपने
धर्म का आचरण करनेवाला हो। गुरु से कपट भाव न रखे। जो गुरु से कपट भाव रखेगा सो नरक
में जायगा। शिष्य का धर्म है कि सत्यवादी, सेवापरायण, गुरु के चरणों में लीन रहे।
इसलिए जो शिष्य गुरु का आदर न करे, कपट भाव रखे... तो वह गुरुद्रोही कहलावेगा। जो गुरुद्रोही
होगा वह नरक में जायगा। शिष्य को चाहिए कि गुरु आज्ञाकारी हो। गुरु सेवा से कल्याण होगा। गुरु
की सेवा करे, गुरु की आज्ञा में सदा रहे। यदि ऐसा न करेगा तो नरकगामी होगा। माता-पिता की सेवा
न करेगा, तो वह अवश्य नरक जायगा, चौरासी-लाख में भटकेगा। इस बात का विचार
करो!
शिष्य ने यह वचन सुनकर हाथ जोड़े, और कहा—हे महाराज! जो आपने माता-पिता का उपकार
कहा सो सच-सच है। उन जैसा उपकारी कोई संसार में नहीं। माता का उपकार बड़ा, पिता
का आदर बड़ा, इन दोनों का आदर-सम्मान करना सब का मुख्य धर्म है। जो माता-पिता का
आदर नहीं
करता वह नरक का भागी होता है। अब कहिये—संसार में बड़ा कौन है? बड़ा भाई या छोटा
भाई? इस बात का विचार करके आप मुझे समझाइये। तब गुरु ने कहा—बड़ा भाई पिता के
समान है, सो उसका आदर करना, उस का सत्कार करना, उस का हुक्म मानना, उस की आज्ञा
में रहना, गुरु के समान उस का आदर करना, उस की सेवा करना सब जीवों का धर्म है। बड़ा
भाई, जो अपनी पत्नी का आदर न करे, उस का आदर न करे, उस के साथ प्रीति न रखे, उसको
भी नरक में जाना पड़ता है। इस प्रकार भाई-भाई आपस में प्रेम रखें।
जो भाई अपने भाई से कपट भाव रखेगा, उस को नरक में जाना पड़ेगा, बड़ा भाई
पिता समान है, उस का अनादर करने से भारी पाप होता है। छोटा भाई पुत्र के समान
है। जो माता-पिता अपने बालकों को मारते हैं या उनको दुःख देते हैं अथवा अपने धर्म से
पतित होते हैं, सो भी नरक के भागी होते हैं, इस बात का विचार करना चाहिए?
शिष्य बोला—हे महाराज! यह सब बात सत्य है। इस संसार में कोई किसी का नहीं
सहायता करता। सब अपने-अपने स्वार्थ के सम्बन्धी हैं, कोई किसी का उपकार नहीं मानता।
कोई किसी का आदर नहीं करता। कोई किसी के धर्म को नहीं मानता। तब गुरु ने कहा—संसार
असार है, माया-मोह में फंसा हुआ है!
अतः इस संसार का मोह छोड़कर उस जगदीश्वर का भजन करो जिससे मोक्ष
प्राप्त हो। इस संसार में आकर जो मनुष्य हरिभजन नहीं करता, उस का जन्म व्यर्थ है।
इस शरीर का कोई भरोसा नहीं। यह शरीर पानी के बुलबुले के समान नष्ट होनेवाला है।
अंत में केवल हरि का नाम ही काम आता है, सो हरि का भजन करो और गुरु की सेवा में
रत रहो। गुरु की शरण में जाने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और सद्गति प्राप्त होती
है। जो मनुष्य गुरु की आज्ञा का पालन करता है वह भवसागर से पार हो जाता है। इसलिए
गुरु की सेवा करो, हरिभजन करो जिससे तुम्हारा उद्धार हो।
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इस बात बात सिद्धान्तप्रमेय का विवेचन करते समय मैंने न्याय शास्त्र का एक सूत्र
भी लिख कर समझाया, जिसको कि कोई, कदाचित् आस्तिक न्याय शास्त्र को नहीं पढे,
या नहीं भी समझे, शास्त्रविशारद को सब बात, सहज बात समझ, उसकी तो बुद्धि में
बैठजाती है कि ईश्वर
कर्त्ता कैसा? ईश्वर कैसा निमित्त वा न्याय के प्रमाण से ईश्वर को कर्त्ता कह सकता
सकता है, सो सब प्रमाण में ऊपर दे--चुकेगा अब तो उसका ही, कभी-कभी मन
का हो जाय! कितना समझा दिया जाय, सब ही प्रमाण निष्फल हो जाय, सो तो
महाशयजी को, यह पहले ही लिख समझाकर कह दिया था जिस पर विचार न कर
अपनी एक--तनी बात ही पकडकर बैठे।
सो महाशयजी प्रथम बार फिर इस बात पर, न्याय दृष्टान्त पर ही जोर देकर ही
लिखना शुरू किया सो ठीक ही, अपने सब प्रमाण तो निष्फल हो चुके ही, आगे क्या
लिखते? जब तक बात न्याय में ठीक न हो तब तक प्रमाण कैसे माना जाय। सो, सो
भी न्याय का सूत्र? न्याय का दृष्टान्त क्या समझना पडेगा? न्याय दृष्टान्त को सत्य
ही है, पर जो बात समझ, सो सब बात समझकर सिद्ध करे, तब न्याय माना
सो न्याय शास्त्र के प्रमाण से, जो यह तो सिद्ध करने का यत्न किया कि कुम्हार
मिट्टी आदि का कर्त्ता है, सो न्याय के प्रमाण लिखे से यह सिद्ध हो गया कुम्हार
सो, तो निमित्तमात्र ही ठहरा जैसा कि कहा, पर जैसा मिट्टी का निमित्त रूप से
कर्त्ता रूप से ही जो ईश्वर को कर्त्ता वा जैसा सिद्ध किया गया वैसा सिद्ध ही ईश्वर
का भी सिद्ध मानना पडेगा
ईश्वर को भी न्याय के प्रमाण से न्याय सम्मत कर्त्ता तो सिद्ध हो गया निमित्त
का रूप सिद्ध रूप रूप से।
ईश्वर सब रचना रूपी जगत कार्यरचना को, जैसा निमित्त से, निमित्त कर्त्ता
मानने से निमित्त का रूप न तो रूप सिद्ध रूप ठहरा; सो उस ही रूप निमित्त रूप कर्त्ता
का रूप सिद्ध रूप निमित्त ठहरा सो सो ही, सब व सब बात निमित्त सम्मत सिद्ध
स्वरूप निमित्त सिद्ध सो सो सब कुम्हार निमित्त से सिद्धान्त को सिद्ध हो गया जो
बात थी, पहले सिद्ध सिद्धान्त से सिद्ध हो गई सो हुई
पर ईश्वर को तो सब रूप से ही सिद्ध रूप में निमित्त रूप रहा, निमित्त कर्त्ता
ठहराया?
सो सब बात सत्य ही सिद्धान्त रूप रहा, सो निमित्त कर्त्ता ठहरा व रूप सिद्ध
निमित्त रूप रहा निमित्त सिद्ध रूप से निमित्त सिद्ध हो निमित्त का सिद्ध रूप सिद्ध
सिद्ध सब ही का महाप्रलय काल सिद्ध महाप्रलय काल सिद्ध सब सिद्ध स्वरूप
सिद्ध रहता, जैसा पहले सब सिद्ध सिद्धान्त से निमित्त ही सिद्ध
सब ही महाप्रलय के समय निमित्त रूप से निमित्त ठहराया सो सिद्ध रूप ही
सिद्ध रूप ही ही सिद्ध रूप ही सिद्ध निमित्त रूप महाप्रलय काल में ही सिद्ध रूप
महा, सिद्ध, महाप्रलयकाल, सिद्ध सब निमित्त ही ही सिद्ध? निमित्त ही ही सिद्ध
रूप सब ही सिद्ध सिद्ध रूप!
ऐसा रूप ही निमित्त सिद्ध ही, निमित्त सिद्ध रूप सिद्ध ही सब सिद्ध
निमित्त सिद्ध रूप निमित्त सिद्ध महाप्रलय सिद्ध, महा, सब सिद्ध निमित्त
सिद्ध ही रहा? सब सिद्ध निमित्त ही?
सो ऐसा सिद्ध ही सिद्ध ही निमित्त सिद्ध सब ही को महाप्रलय से सब रूप से,
सिद्ध निमित्त रूप निमित्त रूप सब ही निमित्त सिद्ध हो ही निमित्त सिद्ध सब ही
निमित्त, सब ही सिद्ध ही निमित्त रूप सब सब निमित्त ही ही रहा?
जो सिद्धान्त सिद्ध ही, सब सिद्ध ही सब निमित्त सिद्ध का सिद्ध कर्त्ता
निमित्त ही सब सब ही ही सब सिद्ध ही सिद्ध, निमित्त ही निमित्त सिद्ध ही?
सब सिद्ध का निमित्त सिद्ध ही निमित्त रूप ही सब ही ही सिद्ध ही सब सब सब
निमित्त सिद्ध रहा
निमित्त सिद्ध सब सिद्ध सब ही सिद्ध ही, सिद्ध ही सिद्ध सब ही सिद्ध स्वरूप!
निमित्त सिद्ध व सिद्ध ही सब निमित्त ही निमित्त, सब सिद्ध ही सिद्ध निमित्त
सिद्ध निमित्त सब सिद्ध सब ही सिद्ध सिद्ध सब ही निमित्त निमित्त ही,
सिद्धान्तसिद्ध सब ही सब सब सब ही, सो सब सिद्ध ही सब निमित्त सिद्ध सब
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जीवन का सबसे पहला लक्षण या विशेषता स्वयं रक्षा और अपना विकास ही माना गया
जिस रूप उसने चाहा, या वह अपने माता-पिता के रूप समझाता, उस रूप उसने उस विकास
अथवा जीवन को भय अथवा संकट देखा तो, वह चिल्ला उठा, प्रतिवाद करता रहा, अपने जीवन
की, अपनी ही रक्षा उसने की तथा अपने माता-पिता का ध्यान अपनी कठिनाई की ओर खींच
दिया यह उसका पर विचार यदि ध्यान दिया जाए तो ज्ञात, मनुष्य स्वभाव से स्वतंत्रता
प्रिय या प्रेमी रहा
किस प्रकार की मुक्ति वह चाहता? किस वह मुक्ति या स्वतंत्रता अपने जीवन
विकास के लिए ही केवल वह चाहता था? जिस वह मुक्ति अथवा विकास चाहता था वह कहाँ
तक सही थी? अनेक प्रकारों से, परिस्थितियों के दो रूपों द्वारा उसे सिद्ध किया जा सकता
जा रहा था, और वह यह भी अनुभव करने लगा था कि आगे, वह किस दिशा प्रवृत्त हो?
इसी प्रकार से वह इस और अपने विकास को नए सिरे देकर मानव स्वरूप में प्रवेश कर रहा
था, या यह कहिए कि वह अपने नए रूप अथवा दिशा को जान ही गया, या फिर उसने यह
जान ही लिया
अपनी ओर उसने अब जो स्वरूप या रूप देखा था क्या वैसा पहले कभी देखा था? या
केवल उसने अपनी रक्षा और अपने शरीर रक्षा तक अपने आप को रखा, या स्वावलम्बन तक
ही था, जिसे स्वावलम्बन कहा जा सके, जिसे केवल मनुष्य अपनी रक्षा, या फिर केवल अपनी
सन्तान रक्षा तक सीमित समझे
अब उसके कदम और विस्तृत होकर पड़े, उसकी दृष्टि कुछ और, उसकी समझ कुछ
और, उस दिशा स्वरूप दिशा बनकर उस ओर उसने पहला कदम उठाया तो वह क्या स्वरूप
था? जिसने यह पहला कदम देखा, उसने देखा केवल, स्वावलम्बन स्वरूप जिसे उसने सही
जाना था, और जिसे उसने अपना लक्ष्य या दिशा स्वरूप भी स्वीकार कर लिया था?
स्वरूप तो वह केवल स्वरूप ही देखा जा रहा था और मनुष्य के मन में उसका जो रूप
निर्मित हो रहा देखा जा रहा था वह तो एक ऐसा रूप लेकर सामने आया, जो केवल उस
रूप तक सीमित रहकर रह गया
इस ओर उसने जब नया कदम रखा, उसने पहला स्वरूप किस प्रकार का लिया था
जिसमें केवल दूसरों पर प्रभाव था? जिसने उस पर प्रभाव था, उस दिशा द्वारा उसका
रूप जो बना, उसने उस रूप को अपने प्रभाव का साधन ही तो माना था, वह
प्रभाव किस पर था और क्यों! जो अपने स्वरूप में तो स्वयं को उस रूप में प्रस्तुत कर
रहा अथवा जिस स्वरूप में वह अपने आप को देख रहा था, प्रभाव केवल उसका ही,
सीमित रूप ही स्वावलम्बन रूप कहा गया
जब तक वह रूप इस स्वरूप तक ही एक सीमा तक, जिसे यह कह कर नया
रूप दिया गया, जिसे यह भी कहा गया, रूप जो उसने अन्य को प्रभावित करके
उस पर केवल अपना ही शासन या प्रभाव तो न देखा हो, उस रूप को तो स्वा-
मी कहा जा रहा था अथवा वह यह स्वरूप इस प्रकार से था जिसने प्रभाव तो कर दिखाया
रूप को नया ही, पर वह प्रभाव उस सीमा तक ही रहा, जो था अपने घर तक, या
उस सीमा तक कहा, जो घर या परिवार अथवा समाज तक ही सीमित रह सका, या यह
कहा गया हो, जिसको हम समाज कहा जाए या केवल परिवार स्वरूप समझा जाए, अथवा यह,
कि वह रूप जो केवल अपने तक सीमित रहा उसे तो केवल समाज की सीमा के बाहर
माना गया
केवल समाज का रूप तो तब तक ही एक रूप में तब तक रहा जब तक केवल
अपना ही रूप था! केवल उस समय स्वरूप केवल सीमित था समाज की उस
व्यवस्था तक सीमित या सीमा थी, जब तक समाज केवल व्यक्तिगत परिवारों तक ही
रूप बनाकर खड़ा रहा था या व्यक्तिगत स्वरूप समाज के व्यक्तियों द्वारा अपना
व्यक्तिगत या स्वरूप ही बन सका जिसे समाज का नाम भी दिया गया और इस
नाम स्वरूप से ही उस समाज स्वरूप को देखा जा सका था या समझा गया अथवा
माना जा सका था, व्यक्तिगत रूप समाज! समाज-का तो वह रूप उस समय तक सही
रूप कहा गया
समाज कहाँ तक समाज! जब व्यवस्था एक परिवार से हो ही नहीं सकती
थी, समाज का रूप बन ही नहीं रहा था जब तक समाज का रूप नहीं था
केवल स्वयं तक ही! समाज अथवा जो दिशा दी जा रही थी वह केवल
परिवार से प्रारम्भ, या दो पारिवारिक लोग मिलकर या उस से अधिक उस
स्वरूप--के आधार पर था, समाज बन सके, ऐसा होना ही था, जिस समाज का रूप
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गया तथा रात--दिन एकाग्र हो उसकी प्राप्ति का अभ्यास करने लगा। इस प्रकार करते हुए
वह प्रत्येक बात अपने गुरुदेव भगवान् श्रीकृष्ण को बता रहा था।
अर्जुन जितने साधन करता जाता था उतना ही! साधनों का अहंकारमय पर्दा
गिरता गया, उस जीव-भाव रूपी जो पर्दा था, वह जाता रहा। जब पर्दा हट गया
तोअभ्यास रूप सब लेन-देन बन्द हो गए और केवल शान्ति ही शान्ति रह गई।अहंकारमय पर्दा
हटा, तब सब कुछ मिटकर सब कुछ भगवान् श्रीकृष्ण का स्वरूप ही बन गया। केवल शान्ति
का, आनन्दमय स्वरूप अपने-आप प्रकट हो गया, अभ्यास करने का भाव, साधन करने
वाला सब कुछ न रह सकता। अभ्यास करनेवाला मिट गया और केवल शान्ति ही शान्ति रह गई।
अर्जुन का, अभ्यास सब परमात्मा रूप होकर सब प्रकार का संशय मिट गया!
साधन के बाद उसका जो रूप बदला सो, साधन का रूप ही बदल गया। पहले
तक सब साधन के द्वारा कुछ न कुछ पाना था, साधन का अहंकारमय पर्दा लगा रहता
था कि मुझे परमात्मा को पाना है, सिर्फ साधना अभ्यासकर्त्तापने तक सीमित
रह जाती थी मगर उसका पर्दा रूपी अज्ञान समाप्त होने के बाद साधन साधन न
रहाअहंकारमय पर्दा न रह सका। अब तो सब कुछ ईश्वर की लीला लगी, कर्त्ता-
अकर्त्ता सब, स्वरूप का साक्षात्कार हुआ जब, फिर अर्जुन सब प्रकार निष्काम हो
हर काम कर सकता था।
अब अर्जुन का ध्यान सब अभ्यास-अभ्यासी अभ्यास का नाश होने पर जो पूर्ण
निष्ठा प्राप्त करनी थी उसपर गया, जो कि अज्ञान-अहंकार के हट जाने के बाद
की स्थिति सब अर्जुन जान, हर प्रकार अपने को उस ज्ञान रूप से सब तरफ देखने
लगा!
इस निष्ठावान् का जो रूप है, सो अर्जुन सब बात को समझ गया,
जिस प्रकार पानी पर जो बर्फ जमती जाती थी सो पिघल, जल ही निष्ठावान् रूप, बर्फ का
अहंकार जमने वाला सब रूप जब पिघल कर सब रूप एक ही बर्फ पिघलकर, सब कुछ
जल स्वरूप ही बनकर एकरस परब्रह्म परमात्मा रूप स्थिति बन गई।
ज्ञान स्वरूप का ऐसा साधन होने पर यह सब रूप ही ज्ञान स्वरूप बन गया जिस
पर विचार कर, अभ्यास सब रूप त्याग के शान्ति प्राप्त करने का यही साधन अर्जुन
किया करो! अब सब कर्म कर और फल सब त्याग रूप में निष्काम कर्म को प्राप्त हो,
जिस रूप में सब कर्म कर तू जो कुछ त्याग रूप फल त्याग रूप कर्म करता है, जिससे
अनासक्त भाव हो; सब कुछ त्याग फल रूप को तू स्वीकार करके निष्काम भाव से रह,
सब कर्म त्याग फल रूप होकर; फिर सब प्रकार शान्ति को प्राप्त होकर, उस
ज्ञान स्वरूप का साधन कर जिस रूप से सब कुछ त्याग, त्याग ही शान्ति का मूल
जानकर सब का त्याग करके, कर्म-धर्म, अभ्यास-अहंकार, विचार-
अभ्यासवान् का त्याग करके, सब प्रकार उस परमात्मा शान्ति को ही प्राप्त
होकर सब बात को तय कर अर्जुन ज्ञान... परब्रह्म रूप, जो हर प्रकार न त्याग और
कर्म-धर्म का कोई त्याग न रहा, परमात्मा सब त्याग... जो सब प्रकार
समझा दिया सो स्वरूप ज्ञान अर्जुन, सब बात समझकर उस परब्रह्म को प्राप्त
होकर उस ज्ञान रूप को जान कर परमात्मा के ज्ञान स्वरूप में लीन रहा सो अर्जुन
सब कुछ जान सब भाव को त्याग कर्म त्याग फल निष्काम भाव सब कुछ त्याग करके
अर्जुन, तू हर प्रकार शान्ति फल भोग ले!
जो हर दम हर प्रकार ज्ञान, हर दम कर्म-धर्म त्याग करके सब कुछ
भगवान् को अर्पण कर दे और तन--मन से केवल परमात्मा रूप को समझे तथापि
निष्काम कर्म--फल त्यागकर जो सब को ईश्वर का ही, ईश्वर ही सबका सब है, सब
का त्याग कर, जो अपना त्याग ही परमात्मा को कर दिया तो सब रूप उस ईश्वर का
सब प्रकार हर समय निष्काम भाव से ईश्वर स्वरूप बन कर नहीं प्राप्त होगा?
जिस का ऐसा स्वरूप है, सो हर रूप से ज्ञान-स्वरूप होकर जो शान्ति प्राप्त कर
हर समय शान्ति के भाव से सब कुछ ईश्वर ज्ञान से सब निष्काम भाव होकर
सब कुछ त्याग हर कर्म निष्काम रूप करता है, जिससे हर दम शांति रूप
रह सकता है सो, परमात्मा के हर रूप, स्वरूप के हर स्वरूप को, त्याग स्वरूप
सब प्रकार से सब बात का त्याग-धर्म, कर्म-धर्म निष्काम होकर केवल प्रभु
का ध्यान स्वरूप सब प्रकार करता हुआ जो कि परमात्मा का ही सब कुछ है
वह केवल स्वरूप के साथ अपने स्वरूप को न रूप का, नाम को न रूप का, नाम का
स्वरूप न रूप रूप परमात्मा को सब ही सब ध्यान रूप सब कुछ सब प्रकार से
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