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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 154 में से

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विशाखा का रूपक अलग था, ललिता का रूप अलग था। यह तो प्रत्येक गोपी का रूप,
जो उस समय उपस्थित गोपियां थीं, जो उस उस गोपियों गोपियों के रूप में स्वयं
कृष्ण प्रकट हुए गोपियों के स्वरूप रूप में, प्रत्येक के रूप, सब रूप स्वयं
कृष्ण के प्रकट हुए रूप थे। यह उन गोपियों स्वरूप गोपी रूप।
तो जो स्वरूप कृष्ण रूप का बनाया जा रहा है, वह कैसा स्वरूप बनाया जा रहा
केवल श्रृंगारपरक ही वह रूप होगा या और कुछ? वैसा ही तो जैसा स्वरूप
अक्रूरजी के समक्ष रूप हुआ प्रकट, वैसा नारायण के स्वरूप का रूप
गोपांगना समूह के रूप में इस रूप का दर्शन हो रहा था। गोकुल का दर्शन वैसा हुआ
था।
वृंदावनचन्द्र तो जो रूप का धारण किए हुए प्रकट रूप हुए उस समय
वृन्दावन में प्रत्येक के रूप को रूप में ले रहे भिन्न-भिन्न के रूप। प्रत्येक
गोपी का जो रूप था उस स्वरूप गोपी के रूप धारण से पहले, जब यह सब
कुछ रूप स्वयं नारायण के रूप में भगवान् ने रूप धारण गोपियों का रूप
दे कर के रूप न जाने के रूप में क्या स्वरूप दिया था जो कि रूप न था। प्रत्येक
प्रत्येक गोपी स्वयं में रूप के रूप विह्वल हो जाती थी जब न रूप उस रूप
स्वरूप।
सुचित्रा रूप में गयी, ललिता के रूप, सब के रूप जहां पर रूप रूप रूप
रहा, प्रत्येक सखियां तो रूप के रूप में रूप में ही रूप हो जाती रही
रहा, हर गोपी रूप रूप सखियों के स्वरूपवान् रूप न बन पाए, सखियां
स्वयं सखियों का रूप बनकर के रूप रूप में तो स्वयं रूप ही ऐसा रहा, रूप
सखियां कृष्ण रूप, सखियां कृष्ण स्वरूपों का ही रूप रूप बन गई।
स्वयं सखियां बन गई, सब स्वरूप स्वयं, सब कृष्ण स्वरूप, सब गोप
रूप गोपियां ही!
तो यह रूप कृष्ण के आराधक रूप के रूप स्वरूप का प्रभाव ही रहा।
ऐसा आराधक स्वरूप जो सब रूप रूप के हो कृष्ण रूप के स्वरूप रूप में
दिखा।
ऐसा आराधक का रूप, सब रूप तो सब रूप के रूप ऐसा आराधक बना
सब कृष्ण रूप?
सखियों का रूप ऐसा रूप के स्वरूप रूप में सब स्वरूप रूप हो गए
सखियां सब स्वयं? सब स्वरूप रूप स्वयं के आराधक बन ही गए? ऐसा रूप
भगवान् कृष्ण स्वयं बना रहे।
ऐसा आराधक रूप बन कर सब स्वरूप रूप में हो गए तो सब गोपी रूप
में कृष्ण के पास कोई ऐसा स्वरूप तो बन जाना संभव न था क्योंकि प्रत्येक
का ही, प्रत्येक स्वरूप का ही, प्रत्येक स्वरूप के रूप में ही नारायण रूप रहा,
नारायण रूप रहा, तो फिर कृष्ण का ही स्वरूप तो कृष्ण को ही मिला!
स्वयं आराधक का रूप ऐसा, कृष्ण स्वयं ही जब आराधक रूप में प्रकट
होता रहा।
तो यह रूप के रूप का रूप रूप का रूप न स्वयं कृष्ण के रूप
विह्वल हो हो कर सब रूप बना रहा, कृष्ण जन-जन के ही रूप में ही
प्रत्येक सखा जन--के रूप नारायण के स्वरूप में, यह रूप कृष्ण रूप सब
का रूप ही--सब जन-जन के स्वरूप रूप बना रहा था सब कृष्ण रूप।
तो सब कृष्ण स्वरूप बन, कृष्ण का रूप रूप बना ही रहा, तो भगवान् के... ।
ऐसी कृपा आराधक के रूप रूप, भगवान् के सब रूप रूप में रूप
सब स्वरूप प्रभाव रूप, नारायण स्वरूप के रूप में, रूप सब रूप।
तो सब जन नारायण रूप सब हो जाए तो सब कृष्ण रूप में स्वरूप ही
स्वरूप ही सब का रूप बन गया, कृष्ण रूप सब नारायण का रूप था, तो ही
रहा, तो कृष्ण ही रहा, सब रूप सब कृष्ण के रूप में रूप में ही रहा।
तो भगवान् का सब रूप ही तो स्वरूप रहा! ऐसा स्वरूप सब बन गए? सब
हो गए?
सब रूप के आराधक बने, तो वो सब रूप स्वरूप बन गए? तो वो रूप
का रूप रूप के स्वरूपवान् रूप ही!
तो सब के स्वरूप के रूप, सब रूप सब के रूप ऐसा दिखा! सब स्वरूप
ऐसा बना सब रूप में सब रूप सब में सब रूप सब रूप भगवान् के
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