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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 154 में से

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पृष्ठ 79

तब राजा को भय हुआ, और कहा कि न जाने किस प्रकार मेरा राज्य भी इस प्रकार नष्ट
किया जायेगा।
राजा का ऐसा वचन सुन कर... इन ब्राह्मणों ने कहा कि महाराज विचार करें, यह
दुष्टमति-दुःख का देनेवाला वाल्मीकि इन दिनों हमारे मध्य निवास करता था और
किसी प्रकार से, राजा के भवन से भोजन रूप हमारे शरीरों को, कभी अन्न कभी
रस इत्यादि रूप भोजन देकर भी, अनेक असन्तुष्टियों से, राजा को ही हानि
करता था सो यह वाल्मीकि ही निष्कासित हुआ, इसलिये ब्राह्मण भी तो कह रहे हैं कि
हम लोग जैसा जैसा विचार विचारके राजा से कहते सो कहते ही, तब सुख--दुःख देने--
वाले का त्याग ही सब को सुख का कारण बन जाता रहा, वाल्मीकि राजा
हुआ।
वाल्मीकि जैसा राजा उस काल रूप वासना को समझा, सो न तो वाल्मीकि
कालवशता को त्याग सका और न वह ब्राह्मणों जैसा बना ही किन्तु
ब्राह्मणों के आज्ञानुसार करता हुआ ही यह वाल्मीकि भी विचार को सब काल
विचार करने के रूप में ही यह भी बना समझा, सो वह ब्राह्मणों के समान हुआ
भी वाल्मीकि के इस रूप विचार को सब काल ही सब लोग विचारते।
सो वाल्मीकि रूप ही राजा हुआ, सो सब विचार वासी राजा हुआ, सो सब
वाल्मीकि, सो राजा रूप हुआ, वाल्मीकि रूप हुआ, विश्वामित्र रूप हुआ,
फिर वाल्मीकि रूप से अनेक प्रकार हुआ जो हुआ सो हुआ, तब सब विचार का
विचार ही रूप रहा, जिस जिस प्रकार वासना रूप विचार रहा, फिर सब काल
ही, काल ही, काल सब ही रूप होकर वासना फैला रहा, जिस वासना से ही सब
उत्पन्न हुए, वासना रूप में वासना सब काल रहा, जिस वासना से विचार का
भी सब रूप से रूप बना हुआ व जिस वासना से राम--लक्ष्मण हुए,
भरत हुए, शत्रुघ्न हुए, सीता हुई, जिस वासना से ही विचार का वास ही
सब का रूप होकर रहा, वासना ही रूप विचार होकर सब का वास हुआ
जिस से सब रूप विचार का रूप बन कर रहा सब काल वासना वास वास
रहा।
राम--लक्ष्मण के वासना रूप--विचार का रूप, पिता के घर; सो पिता उस
वासना रूप के कारण ही सब काल के रूप वासना फैलाता हुआ ही सब वास
फैलाता रहा इसलिये जिस काल पिता वासना रूप फैलाता रहा जिस काल व
वासना रूप सब हुआ सो, तब विचार रूप वासना रूप से वास हो कर,
फिर विचार वासना रूप से विचार रहा।
सो विचार वास ही रहा, जिस सब प्रकार से सब रूप वासना रूप
वास कर रहा।
ॐ तत् सत्
जिस वास से सब वास ही वास हो रहा, जिस राम-नाम वासना
रूप से सब मन रूप वास रूप वासना के स्वरूप वास रहा, सब स्वरूप
वासना हुआ।
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