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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 154 में से

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कथा समाप्त हुई, श्रोतृमण्डली उठ कर विदा हुई अथवा कथावाचक की चरणवन्दना कर भेंट
चढाकर सब ने अपने स्थान लिया।
विश्वामित्रजीप्रभृति जितने तपस्वी, ज्ञानी या विरक्त भक्तवृन्द थे वेसबही तो मन्त्रद्रष्टा
ऋषि, वेदशास्त्र के पारदर्शी विद्वान्मूर्धन्य या स्वयमेव ही भगवान् के पार्षद तथा परमहंस कोटि के
महापुरुष थे। श्रीरामचन्द्र जी केवल एक मनुष्य ही नहीं किन्तु साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं इस बात
को वे जानते थे। यही नहीं, वे जानते थे कि, वे पूर्णकाम प्रभु इस समय केवल नर लीला कर रहे
थे। अस्तु, जिनको भगवद् रूप तत्त्वतः ज्ञात था, उनके लिये चिन्ता व शोक सम्भवतः ही नहीं हो
सकता था। पर, जो जो भी व्यक्ति इन बातों को नहीं या यत्किञ्चित् जानता था उसको,
विश्वामित्रप्रभृति सम्पूर्ण महर्षियों का आनन्द देखकर और भी सन्देह उत्पन्न हो जाता था; पर
इसका कुछ कारण वे समझ न पाते थे। महर्षिगण इस सब नर लीला का ऐसा आनन्द ले रहे
थे कि जिससे यह पता लगाना ही कठिन था कि विश्वामित्र जी, दशरथ कौशल्या अथवा पुर
नरनारियों को इस बात का ज्ञान था कि वस्तुतः विश्वामित्र जी क्या चाहते थे।
इन बातों को जान कर विश्वामित्र जी मन ही मन बहुत हर्षित हुए। अपनी कथा समाप्त
करके, अब वह मुग्ध हो दशरथजी का मुख देख रहे थे, दशरथ जी उनके मुख की ओर तथा सब
सभासद् विश्वामित्र जी की ओर देख रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो सब चित्र लिखे से
बैठे हों। विश्वामित्र बोले, 'राजन! आज्ञा दीजिये!' इसके उपरान्त सभासदों की ओर देखकर वे
फिर बोले, 'प्रियवर, हमारी प्रार्थना पर सब विचार करें। पर स्मरण रहे, सब सोचकर ऐसा
निर्णय कीजिये जिससे देश तथा विश्वामित्र की मर्यादा बनी रहे तथा किसी प्रकार भी अयोध्या के
सम्मान की हानि न हो।'
महर्षि की आज्ञा पाकर महाराज दशरथ ने कहा, 'भगवन्! राम-लक्ष्मण दोनों अभी बहुत छोटे
हैं, सुकुमार हैं। उनका यह शरीर, उस पर उनकी कोमलता देखकर तो कोई विचारशील यही कह
उठेगा कि 'हाय, राक्षस क्या इस सुन्दर रूप पर तरस नहीं खायेंगे!' पर जब कोई यह सोचता
होगा कि राक्षस तो पापी होते हैं, तब निश्चय ही मन काँप उठता है। क्या आज तक विश्वामित्र-
सदृश किसी महर्षि को यह ज्ञात नहीं हुआ कि राक्षसों का स्वभाव क्या है? क्या वे किसी
पर दया कर सकते हैं?
इस पर भी विचार किया जावे कि विश्वामित्र सदृश ज्ञानी मुनि जिनको अपने प्राणों की भी
चिन्ता न थी, यदि वे राम को राक्षसों के हाथ सौंपने के लिये आये थे तो क्यों आये
थे?
एक बात यह भी है, जिस पर विश्वामित्र जी विचार करना भूल गये, वह यह कि यदि राम
और लक्ष्मण राक्षसों को मार सकें, तो भी क्या वे इस योग्य हैं कि उनको राक्षसों से युद्ध
के लिये भेजा जाय? एक बालक को इस प्रकार युद्ध में झोंकना, जिसके सम्बन्ध में सब कुछ
जानते हुए भी कि वह क्या है और क्या नहीं कर सकता है फिर भी उसे इस प्रकार भयंकर
काम में लगा देना, विश्वामित्र जी जैसे मुनि के लिये शोभा नहीं देता।
विश्वामित्र जी विचारवान् पुरुष हैं, उनको चाहिये था कि वे ऐसा कोई काम न करते जिससे किसी
का अनिष्ट होने की आशंका उत्पन्न हो। विश्वामित्र जी को चाहिये था कि वे राम की जगह
किसी और वीर को माँगते। पर उन्होंने राम को ही माँगा, जिसका अर्थ यह है कि राम के बिना
उनका काम नहीं चल सकता।
अब प्रश्न यह उठा, विश्वामित्र जी, राम को ही क्यों माँग रहे हैं?
इस बात को सोच कर विश्वामित्र-सदृश ज्ञानी मुनि के मन में क्या विचार उठ
सकता था इसका उत्तर, विश्वामित्र ही दे सकते थे। विश्वामित्र जी अपने विचार से राम
को इस योग्य समझ रहे थे कि वे राक्षसों का वध कर सकें!
दूसरी बात, जो दशरथ जी के मन में आई वह यह थी कि राम-लक्ष्मण दोनों
बालकों को विश्वामित्र जी के हाथ सौंपने पर विश्वामित्र जी के साथ जाने में अयोध्यावासियों,
नगरवासियों को जो कष्ट होगा वह असह्य होगा। विश्वामित्र जी का यह कार्य
अयोध्यावासियों को बहुत दुःखी करने वाला था। पर विश्वामित्र जी इस बात को भी न समझ सके,
अथवा समझ कर भी उपेक्षा कर गये। इन सब बातों से प्रतीत होता था कि विश्वामित्र जी
ने जो कुछ भी किया वह सब विचार पूर्वक ही किया था। पर अयोध्यावासियों के लिये, विशेष
रूप से दशरथ जी के लिये विश्वामित्र जी की यह माँग बहुत ही दुःखदायी सिद्ध हुई।
विश्वामित्र जी के जाने के बाद दशरथ जी के मन में अनेक प्रकार के विचार उठे।
वे सोचने लगे कि विश्वामित्र जी ने राम को माँग कर बहुत बड़ा अन्याय किया है। राम
अभी बालक हैं, उन्होंने धनुष-बाण चलाना सीखा ही है, युद्ध का उनको कोई अनुभव नहीं
है। ऐसे बालक को राक्षसों के सामने युद्ध के लिये भेजना, निश्चय ही मृत्यु के मुख में धकेलना है।
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