माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 154 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसके सिवाय हमारी धार्मिक सम्प्रदायें हैं, इन सबके अपने ग्रन्थ हैं और सब धर्म
ग्रन्थ सच्चे और ईश्वर के वचन कहे जाते हैं। ईसाई कहते हैं केवल बाइबिल ही ईश्वर
का वचन (इल्हाम) सच है बाकी सब क्या शैतान रचित हैं? यह तो न्याय संगत बात नहीं
प्रतीत होती? पर जो लोग अपने ग्रन्थ को ईश्वर रचित कहते हैं उनके, अपने ही
धार्मिक सम्प्रदाय के लोग अपने ग्रन्थ को सब से श्रेष्ठ कह लें! पर यथार्थतः मनुष्य
को केवल एक ग्रन्थ मिल सकता
केवल एक ही, जो सृष्टि के आरम्भिक काल में सर्वशक्तिमान् प्रभु ने
सब मनुष्यों के लिये दिया था और वह सब मनुष्य मात्र के लिये है, न किसी एक
देश तक बन्द रहा न किसी एक जाति तक-सत्य का प्रकाशक प्रत्यक्ष के रूप में
केवल वह पुस्तक ही हो सकती है जो सब से पूर्व संसार में फैली हो और जो
ऋग्-यजुः साम और अथर्व चतुष्टय संहिताएं ऋग्वेद, यजुर्वेद सामवेद, अथर्व इन
को वेद कहते
वेद केवल आर्यों के ग्रन्थ हैं सर्वसाधारणके नहीं, यह एक भ्रान्त
बात कही जाती है। सब से पूर्व तो आर्य कोई जाति नहीं
थी सब ही मनुष्य आर्य थे, सब ही मनुष्य श्रेष्ठ थे सब के लिये वेद था।
पश्चात् जो बुरे थे वह दस्यु कहलाए श्रेष्ठ जन आर्य रहे।
वेद तो समस्त मानव मात्र के लिये है, सब ही उस शब्द को ले सकते हैं।
सर्वसाधारणके लिये नहीं, यह बात हो सकती? जब ईश्वर तो सब का और
सब ही उस ईश्वर के जीव हैं तो कोई भी मनुष्य क्यों न उस पिता के, शब्द को ले
या पढ़ या सुने।
वेद तो सब के लिये है जो इस बात को नहीं मानते वे भूल, अन्याय करते हैं।
वेद तो उस, सब के प्रभु पिता का दिया ज्ञान है।
आश्चर्य है, जो पिता का दिया है? वह तो सब बच्चों को मिलना ही चाहिये
न?
बात यह है, सब सम्प्रदाय वाले यह कहते हैं कि, सब को हमारा ग्रन्थ
पढ़े।
आर्यजन कहें, कि वेद सब के लिये है? सम्प्रदाय तो एक पुस्तक को सब
पर लाद देना चाहते हैं?
यह सर्वसाधारणका तो अपना रूप ही बदला हुआ है। पर आर्य तो
समस्त सम्प्रदायों के मूल को एक ही ईश्वर का वचन ही बतला रहे हैं और यह
सब के लिये प्रथम पुस्तक के रूप में; जिस से ज्ञान का उदय सब और हुआ
सम्प्रदायें सब एक ही उस उपदेशक के ग्रन्थ से ज्ञान लेकर ही, अपने नये रूपमें
खड़ी हो गई।
यह उचित नहीं है, कि संसार के सर्वसाधारण मनुष्य सब ही
सम्प्रदायों को छोड़ कर केवल आर्य बनें या वेद-ज्ञानको ग्रहण करें।
यह बात सत्य-युग में तो थी सब लोग एक ही मत के थे पर अब तो नाना रूपी
विचार सब में हैं फिर उन को एक रूप में सर्वसाधारण कैसे किया जा
सकता है? न किसी सम्प्रदाय को नष्ट किया जा सकता, यह तो सम्भव
नहीं, पर विचार करने की तो है, मानव एक पिता परमात्मा की सन्तान होने से,
मानव समाज का सम्प्रदाय तो, पिता और पुत्र के नाते से सब को वेदज्ञान ही
का आश्रय लेना ही है, चाहे ईसाई, चाहे बौद्ध, चाहे कोई भी धर्म होवे, मानव रूप
मात्र को वेद पुस्तक का पठन पाठन करना ही होगा।
यह बात सच है, कि संसार में सर्वसाधारण लोग अपने सम्प्रदाय छोड़ कर,
आर्यसमाजके मतको नहीं ग्रहण कर रहे हैं या करेंगे, पर वर्तमान के मुख्य
सम्प्रदायों सम्प्रदाय के सब अनुयायी तो अपने पिता ईश्वरके बनाये हुए वेद
रूपी एक उस सर्वसाधारणके उपदेश को पढ़ लें, जिससे कि सत्य रूप का बोध
सब को परमात्माके दिये हुए इस धर्म ग्रन्थमें हो जायगा तो, क्या यह असम्भव
हो सके, सब ही ग्रन्थों को वेद ज्ञान रूपी सूर्य से प्रकाश क्या नहीं मिलेगा? अवश्य
ही वेद, अपने सत्य प्रकाश से सब ग्रन्थों को प्रकाशित करेगा।
प्रत्येक सम्प्रदायवाले को अपने धर्म का तो बोध होना ही चाहिये परन्तु वेद
ग्रन्थ का अध्ययन भी, सब धर्म का सार जान कर, जो सब सम्प्रदायोंके ग्रन्थों
का आदि रूप तथा मानव का धर्म है उसका, सब ही ध्यान धर कर अध्ययन करें, तो
सब सम्प्रदाय अपने यथार्थ रूप में रहकर परस्पर एक दूसरे मिल कर ही रहेंगे।
73