माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज श्री बाबा जू--महाराज इस बात सुनो, संसार महा गम्भीर सागर, ताको पार
पायो नाहिं, तब बाबा जी आज्ञा करी के तुम ठाकुर सिधार के सेवा करो
सम्प्रदाय की, प्रथम गुरु ते दीक्षा ले, तब ठाकुर जी को पद सम्हारे
मन्दिर महल के भीतर रहत महा दुख पाइयो हो, जो आज्ञा शिर पर धरी तब
से सब संत जन को घर पर ही रख सेवा करते रहे ओ सेवा नित्य नित्य ही हो रही
पर मन थिर नाहिं था सदा सोच विचार में ही रहे के कब साधु संग मिले
तब ऐसा समय आया, के जो मन चाहा सो पाया संत के संग से ही, जो सोच था
सो सब मिट गया तब से सदा ही सेवा में ही लगे रहे जिस चित्त सदा ही रहे, दो
चार ही रोज सब संप्रदाय के संत महापुरुष एकत्र भए।
भक्त संग भगवान् के संग ही समान जानत हैं ओ सेवा संप्रदाय की ही
सबसे बढ़ के सेवा जान कही॥
सो संप्रदाय का स्वरूप यह, संप्रदाय की परम्परा से साँच उपजा जान सो
सेवा की सार सब संप्रदाय जान, वैष्णव के चरण रज सीस धार, साधु ही आधार
दो हाथ सिर नवावत सदा, 5 प्रकार सदा भक्त रूप जान, 5 प्रकार सदा
विभूति सदा भगवत् स्वरूप, प्रथम साक्षात् संत, दूजा चरणामृत, तीजा
चरणोदक जान--इन सब को एक भाव जान के हृदय में जो धार सो ही
महापुरुषन के सब तन मन धन से लग सेवा में ही सदा भाव रख, ऐसा जो
भक्त ताके पद कमल में वन्दन सो बार बार बार कहि कहि॥
ऐसी सेवा भक्त के चरण सेवा साक्षात् प्रभु सेवा जान कीजै जो संत के
पग की रज सम और कछु नाहिं जो चरण सेवा नित्य करे सो निश्चय सुख को पावे जो
रस सदा संत सेवा में पावत सोई, सेवा भाव सब तन मन धन से समर्पण हो
जाय सब संप्रदाय के चरण कमल में वन्दन
परम्परा से दीक्षा ले परम्परा के सत ज्ञान से चित्त को शुद्ध करत जावे,
ज्ञान परम साक्षात्, जो ज्ञान संप्रदाय, ताके चरण में सदा ही समर्पण हो
जो पर निंदक जन के पास न बैठ संप्रदाय जन के पद चरण में बैठ रहत, सो
नर सदा सुखी, जो ऐसा नियम चित्त में धारत सो सब दुख से पार होइ
जात है नाम जाप से ही सब पाप कटत, संत परम्परा कीजै, साधु
सेवक जान, सेवक मन पावै, चरण रज सीस धारिबे को ध्यान कर मन
के विकारों को दूर कर नाम जप ध्यान में लीन रहे सो भक्तन
सेवा को ही सार जन के हृदय में बिचारै, संत शरण ही परम्परा
जान तन मन से शरण हो जान सो ही सदा सुखी, सो वैष्णव
परम्परा है॥
अब जो संप्रदाय की चरण रज आराधत सो सब काल में वन्दन के
योग्य है, गुरु-मुख जान सब ज्ञान सार जानि संप्रदाय के चरण लाग
रहे, वैष्णव-स्वरूप संप्रदाय के सब तन मन चित्त से ही सदा जान सेवा
कर, 5 प्रकार से ही सदा जान प्रभु को साक्षात् ही हृदय भीतर
निवास जान सेवा में ही तन मन को लीन कर--ऐसा जो स्वरूप प्रभु
का जान जो सब तन मन चित्त से ही परम्परा को जाने सो--सच्चा,
परमहंस, साधु संग ही संप्रदाय॥
दो प्रकार रूप, प्रथम तो स्वरूप के ज्ञान से ही संशय को दूर करि ले
दूजे रूप में संप्रदाय के स्वरूप जान सदा सत्संग करै सो भक्तन
भक्त कह सब संप्रदाय रूप ही स्वरूप जान, जो जो सब भाव मन भीतर
ही धारै सो ज्ञान रूप तन मन को, हृदय से साधन ही उत्तम जान सब रूप 5
प्रकार रूप को सब भगवत् रूप जान संप्रदाय जान रहै, ऐसा भक्त जन,
भक्त रूप जन के, संप्रदाय रूप ही के सब, भक्तन सेवा ही को संप्रदाय का रूप
जान सो भक्त सो सदा साक्षात् ही प्रभु के चरण में लीन रहैगा ऐसा भक्त
साक्षात् ही प्रभु का ही स्वरूप जान सो सब प्रकार सम्मुख ही हो संप्रदाय
भक्त जन को ज्ञान रूप ही हो जावे, जो जो सब प्रकार से सेवा भाव करैगा सोई
साक्षात् रूप संप्रदाय का ही स्वरूप जान, सो ऐसा जो संप्रदाय स्वरूप को
प्रकार से जाने संप्रदाय को सो पर प्रगट?
सो सब को संशय रूप को दूर करि संशय मिटावै? सो जो जन सो संप्रदाय
स्वरूप सदा जानत सब के संशय मिटा 5 रूप, सो भक्त वैष्णव सो सब संत
जनन को संप्रदाय के स्वरूप जान तन मन चित्त से सदा जान सदा वन्दन करै॥
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